ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'प्रकृतिखण्ड' १३१
गङ्गे! तुम शिवके पास जाओ और सरस्वती! तुम्हें ब्रह्माके स्थानपर चले जाना चाहिये। यहाँ मेरे भवनपर केवल सुशीला लक्ष्मीजी रह जायें; क्योंकि परम साध्वी, उत्तम आचरण करनेवाली एवं पतिव्रता स्त्रीका स्वामी इस लोकमें स्वर्गका सुख भोगता है और परलोकमें उसके लिये कैवल्यपद सुरक्षित है। जिसकी पत्नी पतिव्रता है, वह परम पवित्र, सुखी और मुक्त समझा जाता है।
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरि चुप हो गये। तब गङ्गा और लक्ष्मी तथा सरस्वती—तीनों देवियाँ परस्पर एक-दूसरेका आलिङ्गन करके रोने लगीं। शोक और भयने उनके शरीरको कँपा दिया था। उनकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे। उन सबको एकमात्र भगवान् ही शरण्य दृष्टिगोचर हुए। अतः वे क्रमशः उनसे प्रार्थना करने लगीं।
सरस्वतीने कहा—नाथ! मुझ दुष्टाको पाप, ताप और शापसे बचानेके लिये कोई प्रायश्चित्त बता दीजिये; जिससे मेरा जन्म और जीवन शुद्ध हो जाय। भला, आप-जैसे महान् सच्चरित्र स्वामीके परित्याग कर देनेपर कहाँ कौन स्त्रियाँ जीवित रह सकती हैं? प्रभो! मैं भारतवर्षमें योगसाधन करके इस शरीरका त्याग कर दूँगी—यह निश्चित है।
गङ्गा बोली—जगत्प्रभो! आप किस अपराधसे मुझे त्याग रहे हैं? मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।
लक्ष्मीने कहा—नाथ! आप सत्त्व-स्वरूप हैं। बड़े आश्चर्यकी बात है, आपको कैसे क्षोभ हो गया। आप अपनी इन पत्नियोंपर कृपा कीजिये। कारण, श्रेष्ठ स्वामीके लिये क्षमा ही उत्तम है। मैं सरस्वतीका शाप स्वीकार करके अपनी एक कलासे भारतवर्षमें जाऊँगी। परंतु प्रभो! मुझे कितने समयतक वहाँ रहना होगा और मैं पुनः कब आपके चरणोंके दर्शन प्राप्त कर सकूँगी। पापीजन मेरे जलमें स्नान और आचमन करके अपना पाप मुझपर लाद देंगे, तब उस पापसे मुक्त होकर आपके चरणोंमें आनेका अधिकार मुझे कैसे प्राप्त हो सकेगा? अच्युत! मैं अपनी एक कलासे धर्मध्वजकी पुत्री होकर जब 'तुलसी' (वृन्दा)-रूपमें स्थित हो जाऊँगी, तब मुझे पुनः कब आपके चरणकमल प्राप्त होंगे? कृपानिधे! यह तो बताइये कि जब मैं वृक्षरूपमें उसकी अधिदेवी बनकर रहने लगूँगी, तब कबतक आप मेरा उद्धार करेंगे? यदि ये गङ्गा सरस्वतीके शापसे भारतवर्षमें चली जायँगी, तब फिर किस समय शाप और पापसे छुटकारा पाकर आपको प्राप्त कर सकेंगी? गङ्गाके शापसे ये सरस्वती भी यदि भारतमें जायँगी तो कब शापसे मुक्त होकर पुनः आपके चरणकमलोंको पा सकेंगी? प्रभो! आप जो इन सरस्वतीसे कह रहे हैं कि तुम ब्रह्माके घर सिधारो अथवा गङ्गाको शिवके भवनपर जानेकी आज्ञा दे रहे हैं—आपके इन वचनोंके लिये मैं आपसे क्षमा चाहती हूँ। आप कृपा करके इन्हें ऐसा दण्ड न दें।
नारद! इस प्रकार कहकर भगवती लक्ष्मीने अपने स्वामी श्रीहरिके चरण पकड़ लिये, उन्हें प्रणाम किया और अपने केशसे भगवान्के चरणोंको आवेष्टित करके वे बारंबार रोने लगीं। भगवान् श्रीहरि सदा भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। प्रार्थना सुनकर उन्होंने देवी कमलाको हृदयसे चिपका लिया और प्रसन्नमुखसे मुस्कराते हुए कहा।
भगवान् विष्णु बोले—सुरेश्वरि! कमलेक्षणे! मैं तुम्हारी बात भी रखूँगा और अपने वचनकी भी रक्षा करूँगा। साथ ही तुम तीनोंमें समता कर दूँगा, अतः सुनो। ये सरस्वती कलाके एक अंशसे नदी बनकर भारतवर्षमें जायँ, आधे अंशसे