भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ब्रह्माके भवनपर पधारें तथा पूर्ण अंशसे स्वयं मेरे पास रहें। ऐसे ही ये गङ्गा भगीरथके सत्प्रयत्नसे अपने कलांशसे त्रिलोकीको पवित्र करनेके लिये भारतवर्षमें जायँ और स्वयं पूर्ण अंशसे मेरे पास भवनपर रहें। वहाँ इन्हें शंकरके मस्तकपर रहनेका दुर्लभ अवसर भी प्राप्त होगा। ये स्वभावतः पवित्र तो हैं ही, किंतु वहाँ जानेपर इनकी पवित्रता और भी बढ़ जायगी। वामलोचने! तुम अपनी कलाके अंशांशसे भारतवर्षमें चलो। वहाँ तुम्हें 'पद्मावती' नदी और 'तुलसी' वृक्षके रूपसे विराजना होगा। कलिके पाँच हजार वर्ष व्यतीत हो जानेपर तुम नदीरूपिणी देवियोंका उद्धार हो जायगा। तदनन्तर तुमलोग मेरे भवनपर लौट आओगी। पद्मभवे! सम्पूर्ण प्राणियोंके पास जो सम्पत्ति और विपत्ति आती है—इसमें कोई-न-कोई हेतु छिपा रहता है। बिना विपत्ति सहे किन्हींको भी गौरव प्राप्त नहीं हो सकता। अब तुम्हारे शुद्ध होनेका उपाय बताता हूँ। मेरे मन्त्रोंकी उपासना करनेवाले बहुत-से संत पुरुष भी तुम्हारे जलमें नहाने-धोनेके लिये पधारेंगे। उस समय तुम उनके दर्शन और स्पर्श प्राप्त करके सब पापोंसे छुटकारा पा जाओगी। सुन्दरि! इतना ही नहीं; किंतु भूमण्डलपर जितने असंख्य तीर्थ हैं, वे सभी मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्श पाकर परम पावन बन जायँगे। भारतवर्षकी भूमि अत्यन्त पवित्र है। मेरे मन्त्रोंके उपासक अनगिनत भक्त वहाँ वास करते हैं। प्राणियोंको पवित्र करना और तारना ही उनका प्रधान उद्देश्य है। मेरे भक्त जहाँ रहते और अपने पैर धोते हैं, वह स्थान महान् तीर्थ एवं परम पवित्र बन जाता है—यह बिलकुल निश्चित है*। घोर पापी भी मेरे भक्तके दर्शन और स्पर्शके प्रभावसे पवित्र होकर जीवन्मुक्त हो सकता है। नास्तिक व्यक्ति भी मेरे भक्तके दर्शन और स्पर्शसे पवित्र हो सकता है।

जो कमरमें तलवार बाँधकर द्वारपालकी हैसियतसे जीविका चलाते हैं, मुनीमीमात्र जिनकी जीविकाका साधन है, जो इधर-उधर चिट्ठी-पत्री पहुँचाकर अपना भरण-पोषण करते हैं तथा गाँव-गाँव घूमकर भीख माँगना ही जिनका व्यवसाय है एवं जो बैलोंको जोतते हैं, ऐसे ब्राह्मणको अधम कहा जाता है; किंतु मेरे भक्तके दर्शन और स्पर्श उन्हें पवित्र कर देते हैं। विश्वासघाती, मित्रघाती, झूठी गवाही देनेवाले तथा धरोहर हड़पनेवाले नीच व्यक्ति भी मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्शसे शुद्ध हो सकते हैं। मेरे भक्तके दर्शन एवं स्पर्शमें ऐसी अद्भुत शक्ति है कि उसके प्रभावसे महापातकी व्यक्तितक पवित्र हो सकता है। सुन्दरि! पिता, माता, स्त्री, छोटा भाई, पुत्र, पुत्री, बहन, गुरुकुल, नेत्रहीन बान्धव, सासु और श्वशुर—जो पुरुष इनके भरण-पोषणकी व्यवस्था नहीं करता, उसे महान् पातकी कहते हैं; किंतु मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्श करनेसे वह भी शुद्ध हो जाता है। पीपलके वृक्षको काटनेवाले, मेरे भक्तोंके निन्दक तथा नीच ब्राह्मणको भी मेरे भक्तका दर्शन और स्पर्श पवित्र बना देता है। घोर पातकी मनुष्य भी मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्शसे पवित्र हो सकते हैं।

**श्रीमहालक्ष्मीने कहा—**भक्तोंपर कृपा करनेके लिये आतुर रहनेवाले प्रभो! अब आप उन अपने भक्तोंके लक्षण बतलाइये, जिनके दर्शन और स्पर्शसे हरिभक्तिहीन, अत्यन्त अहंकारी, अपने मुँह अपनी बड़ाई करनेवाले, धूर्त, शठ एवं साधुनिन्दक अत्यन्त अधम मानवतक तुरंत पवित्र हो जाते हैं तथा जिनके नहाने-धोनेसे सम्पूर्ण


* मद्भक्ता यत्र तिष्ठन्ति पादं प्रक्षालयन्ति च। तत्स्थानं च महातीर्थं सुपवित्रं भवेद् ध्रुवम्॥
(प्रकृतिखण्ड ६। ९४)