भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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प्रकृतिखण्ड १३३

तीर्थोंमें पवित्रता आ जाती है; जिनके चरणोंकी धूलिसे तथा चरणोदकसे पृथ्वीका कल्मष दूर हो जाता है तथा जिनका दर्शन एवं स्पर्श करनेके लिये भारतवर्षमें लोग लालायित रहते हैं; क्योंकि विष्णुभक्त पुरुषोंका समागम सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये परम लाभदायक है। जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं हैं और न मृण्मय एवं प्रस्तरमय देवता ही देवता हैं; क्योंकि वे दीर्घकालतक सेवा करनेपर ही पवित्र करते हैं। अहो! साक्षात् देवता तो विष्णु-भक्तोंको मानना चाहिये, जो क्षणभरमें पवित्र कर देते हैं।*

**सूतजी कहते हैं—**शौनक! महालक्ष्मीकी बात सुनकर उनके आराध्य स्वामी भगवान् श्रीहरिका मुखमण्डल मुस्कानसे खिल उठा। फिर वे अत्यन्त गूढ़ एवं श्रेष्ठ रहस्य कहनेके लिये प्रस्तुत हो गये।

**श्रीभगवान् बोले—**लक्ष्मी! भक्तोंके लक्षण श्रुति एवं पुराणोंमें छिपे हुए हैं। इन पुण्यमय लक्षणोंमें पापोंका नाश करने, सुख देने तथा भुक्ति-मुक्ति प्रदान करनेकी प्रचुर शक्ति है। जिसको सद्गुरुके द्वारा विष्णुका मन्त्र प्राप्त होता है (और जो सब कुछ छोड़कर केवल मुझको ही सर्वस्व मानता है), उसीको वेद-वेदाङ्ग पुण्यात्मा एवं श्रेष्ठ मनुष्य बतलाते हैं। ऐसे व्यक्तिके जन्म लेनेमात्रसे पूर्वके सौ पुरुष, चाहे वे स्वर्गमें हों अथवा नरकमें—तुरंत मुक्तिके अधिकारी हो जाते हैं। यदि उन पूर्वजोंमेंसे किन्हींका कहीं जन्म हो गया है तो उन्होंने जिस योनिमें जन्म पाया है, वहीं उनमें जीवन्मुक्तता आ जाती है और समयानुसार वे परमधाममें चले जाते हैं। मुझमें भक्ति रखनेवाला मानव मेरे गुणोंसे सम्पन्न होकर मुक्त हो जाता है। उसकी वृत्ति मेरे गुणका अनुसरण करनेमें ही लगी रहती है। वह सदा मेरी कथा-वार्तामें लगा रहता है। मेरा गुणानुवाद सुननेमात्रसे वह आनन्दमग्न हो उठता है। उसका शरीर पुलकित हो जाता है और वाणी गद्गद हो जाती है। उसकी आँखोंमें आँसू भर आते हैं और वह अपनी सुधि-बुधि खो बैठता है। मेरी पवित्र सेवामें नित्य नियुक्त रहनेके कारण सुख, चार प्रकारकी सालोक्यादि मुक्ति, ब्रह्माका पद अथवा अमरत्व—कुछ भी पानेकी अभिलाषा वह नहीं करता। मनु, इन्द्र एवं ब्रह्माकी उपाधि तथा स्वर्गके राज्यका सुख—ये सभी परम दुर्लभ हैं; किंतु मेरा भक्त स्वप्नमें भी इनकी इच्छा नहीं करता†। ऐसे मेरे बहुत-से भक्त भारतवर्षमें निवास करते हैं। उन भक्तोंके-जैसा जन्म सबके लिये सुलभ नहीं है। जो सदा मेरा गुणानुवाद सुनते और सुनने योग्य पद्योंको गाकर आनन्दसे विह्वल हो जाते हैं, वे बड़भागी भक्त अन्य साधारण मनुष्य, तीर्थ एवं मेरे परमधामको भी पवित्र करके धराधामपर पधारते हैं।

पद्मे! इस प्रकार मैंने तुम्हारे प्रश्नका समाधान कर दिया। अब तुम्हें जो उचित जान पड़े, वह करो। तदनन्तर वे सभी देवियाँ, भगवान् श्रीहरिने जो कुछ आज्ञा दी थी, उसीके अनुसार कार्य करनेमें संलग्न हो गयीं। स्वयं भगवान् अपने सुखदायी आसनपर विराजमान हो गये।

(अध्याय ६)


* न ह्यम्भ्यानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः । ते पुनन्त्यपि कालेन विष्णुभक्ताः क्षणादहो ॥
(प्रकृतिखण्ड ६। ११०)
† न वाञ्छन्ति सुखं मुक्तिं सालोक्यादिचतुष्टयम् । ब्रह्मत्वममरत्वं वा तद्वाञ्छा मम सेवने ॥
इन्द्रत्वं च मनुत्वं च ब्रह्मत्वं च सुदुर्लभम् । स्वर्गराज्यादिभोगं च स्वप्नेऽपि च न वाञ्छति ॥
(प्रकृतिखण्ड ६। ११९-१२०)