भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१३४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कलियुगके भावी चरित्रका, कालमानका तथा गोलोककी श्रीकृष्ण-लीलाका वर्णन

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर सरस्वती अपनी एक कलासे तो पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें पधारीं तथा पूर्ण अंशसे उन्हें भगवान् श्रीहरिके निकट रहनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। भारतमें पधारनेसे 'भारती', ब्रह्माकी प्रेमभाजन होनेसे 'ब्राह्मी' तथा वचनकी अधिष्ठात्री होनेसे वे 'वाणी' नामसे विख्यात हुईं। श्रीहरि सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त रहते हुए भी सागरके जल-स्रोतमें शयन करते देखे जाते हैं; अतः 'सरस्' से युक्त होनेके कारण उनका एक नाम 'सरस्वान्' है और उनकी प्रिया होनेसे इन देवीको 'सरस्वती' कहा जाता है। नदीरूपसे पधारकर ये सरस्वती परम पावन तीर्थ बन गयीं। पापीजनोंके पापरूपी ईंधनको भस्म करनेके लिये ये प्रज्वलित अग्निसुरूपा हैं।

नारद! तत्पश्चात् वाणीके शापसे गङ्गा अपनी कलासे धरातलपर आयीं। भगीरथके सत्प्रयत्नसे इनका शुभागमन हुआ। ये गङ्गा आ ही रही थीं कि शंकरने इन्हें अपने मस्तकपर धारण कर लिया। कारण, गङ्गाके वेगको केवल शंकर ही सँभाल सकते थे। अतएव उनके वेगको सहनेमें असमर्थ पृथ्वीकी प्रार्थनासे वे इस कार्यके लिये प्रस्तुत हो गये। फिर पद्मा अर्थात् लक्ष्मी अपनी एक कलासे भारतवर्षमें नदीरूपसे पधारीं। इनका नाम 'पद्मावती' हुआ। ये स्वयं पूर्ण अंशसे भगवान् श्रीहरिकी सेवामें उनके समीप ही रहीं। तदनन्तर अपनी एक-दूसरी कलासे वे भारतमें राजा धर्मध्वजके यहाँ पुत्रीरूपसे प्रकट हुईं। उस समय इनका नाम 'तुलसी' पड़ा। पहले सरस्वतीके शापसे और फिर श्रीहरिकी आज्ञासे इन विश्वपावनी देवीने अपनी कलाद्वारा वृक्षमयरूप धारण किया। कलिमें पाँच हजार वर्षोंतक भारतवर्षमें रहकर ये तीनों देवियाँ सरित्-रूपका परित्याग करके वैकुण्ठमें चली जायँगी। काशी तथा वृन्दावनके अतिरिक्त अन्य प्रायः सभी तीर्थ भगवान् श्रीहरिकी आज्ञासे उन देवियोंके साथ वैकुण्ठ चले जायँगे। शालग्राम, श्रीहरिकी मूर्ति पुरुषोत्तम भगवान् जगन्नाथ कलिके दस हजार वर्ष व्यतीत होनेपर भारतवर्षको छोड़कर अपने धामको पधारेंगे। इनके साथ ही साधु, पुराण, शङ्ख, श्राद्ध, तर्पण तथा वेदोक्त कर्म भी भारतवर्षसे उठ जायँगे। देवपूजा, देवनाम, देवताओंके गुणोंका कीर्तन, वेद, शास्त्र, पुराण, संत, सत्य, धर्म, ग्रामदेवता, व्रत, तप और उपवास—ये सब भी उनके साथ ही इस भारतसे चले जायँगे। (इनमें लोगोंकी श्रद्धा नहीं रह जायगी।)

प्रायः सभी लोग मद्य और मांसका सेवन करेंगे। झूठ और कपटसे किसीको घृणा न होगी। उपर्युक्त देवी एवं देवताओंके भारतवर्ष छोड़ देनेके पश्चात् शठ, क्रूर, दाम्भिक, अत्यन्त अहंकारी, चोर, हिंसक—ये सब संसारमें फैल जायँगे। पुरुषभेद (परस्पर मैत्रीका अभाव) होगा। अपने अथवा पुरुषका भेद, स्त्रीका भेद, विवाह, वाद-निर्णय, जाति या वर्णका निर्णय, अपने या पराये स्वामीका भेद तथा अपनी-परायी वस्तुओंका भेद भी आगे चलकर नहीं रहेगा। सभी पुरुष स्त्रियोंके अधीन होकर रहेंगे। घर-घरमें पुंश्चलियोंका निवास होगा। वे दुराचारिणी स्त्रियाँ सदा डाँट-फटकारकर अपने पतियोंको पीटेंगी। गृहिणी घरकी पूरी मालकिन बनी रहेगी, घरका स्वामी नौकरसे भी अधिक अधम समझा जायगा। घरमें जो बलवान् होंगे, उन्हींको कर्ता माना जायगा। भाई-बन्धु वे ही समझे जायँगे, जिनका सम्बन्ध योनि या जन्मको लेकर होगा, जैसे पुत्र, भाई आदि। (अर्थात् जरा भी दूरके सम्पर्कवालेको लोग भाई-बन्धु भी नहीं मानेंगे।) विद्याध्ययनसे सम्बन्ध रखनेवाले गुरु-