ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
ब्रह्माजीने कहा— भगवन्! श्रीराधा और श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुई ब्रह्मद्रवरूपिणी गङ्गा इस समय एक सुशीला देवीके रूपमें विराजमान है। दिव्य यौवनसे सम्पन्न होनेके कारण उसका शरीर परम मनोहर जान पड़ता है। शुद्ध एवं सत्त्वस्वरूपिणी उस देवीमें क्रोध और अहंकार लेशमात्रके लिये भी नहीं हैं। श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुई वह गङ्गा उन्हें छोड़ किसी दूसरेको पति नहीं बनाना चाहती। किंतु परम तेजस्विनी राधा ऐसा नहीं चाहती। वह मानिनी राधा इस गङ्गाको पी जाना चाहती थी, परंतु बड़ी बुद्धिमानीके साथ यह परमात्मा श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें प्रविष्ट हो गयी, इसीसे रक्षा हुई। उस समय सर्वत्र सूखे हुए ब्रह्माण्डगोलकको देखकर मैं गोलोकमें गया। सर्वान्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण वृत्तान्त जाननेके लिये वहाँ विराजमान थे। उन्होंने सबका अभिप्राय समझकर अपने चरणकमलके नखाग्रसे इसे बाहर निकाल दिया। तब मैंने इसे राधाकी पूजाके मन्त्र याद कराये। इसके जलसे ब्रह्माण्ड-गोलकको पूर्ण कराया। तदनन्तर राधा और श्रीकृष्णके चरणोंमें मस्तक झुकाकर इसे साथ लेकर यहाँ आया। प्रभो! आपसे मेरी प्रार्थना है कि इस सुरेश्वरी गङ्गाको आप अपनी पत्नी बना लीजिये। देवेश! आप पुरुषोंमें रत्न हैं। इस साध्वी देवीको स्त्रियोंमें रत्न माना जाता है। जिनमें सत्-असत्का पूर्ण ज्ञान है, वे पण्डितपुरुष भी इस प्रकृतिका अपमान नहीं करते। सभी पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न हुए हैं और स्त्रियाँ भी उसीकी कलाएँ हैं। केवल आप भगवान् श्रीहरि ही उस प्रकृतिसे परे निर्गुण प्रभु हैं। परिपूर्णतम श्रीकृष्ण स्वयं दो भागोंमें विभक्त हुए। आधेसे तो दो भुजाधारी श्रीकृष्ण बने रहे और उनका आधा अङ्ग आप चतुर्भुज श्रीहरिके रूपमें प्रकट हो गया। इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके वामाङ्गसे आविर्भूत श्रीराधा भी दो रूपोंमें परिणत हुईं। दाहिने अंशसे तो वे स्वयं रहीं और उनके वामांशसे लक्ष्मीका प्राकट्य हुआ। अतएव यह गङ्गा आपको ही वरण करना चाहती है; क्योंकि आपके श्रीविग्रहसे ही यह प्रकट है। प्रकृति और पुरुषकी भाँति स्त्री-पुरुष दोनों एक ही अङ्ग हैं।
मुने! इस प्रकार कहकर महाभाग ब्रह्माने भगवान् श्रीहरिके पास गङ्गाको बैठा दिया और वे वहाँसे चल पड़े। फिर तो स्वयं श्रीहरिने विवाहके नियमानुसार गङ्गाके पुष्प एवं चन्दनसे चर्चित कर-कमलको ग्रहण कर लिया और वे उसके प्रियतम पति बन गये। जो गङ्गा पृथ्वीपर पधार चुकी थी, वह भी समयानुसार अपने उस स्थानपर पुनः आ गयी। यों भगवान्के चरणकमलसे प्रकट होनेके कारण इस गङ्गाकी 'विष्णुपदी' नामसे प्रसिद्धि हुई। गङ्गाके प्रति सरस्वतीके मनमें जो डाह था, वह निरन्तर बना रहा। गङ्गा सरस्वतीसे कुछ द्वेष नहीं रखती थी। अन्तमें ऊबकर विष्णुप्रिया गङ्गाने सरस्वतीको भारतवर्षमें जानेका शाप दे दिया था। मुने! इस प्रकार लक्ष्मीपति भगवान् श्रीहरिकी गङ्गासहित तीन पत्नियाँ हैं। बादमें तुलसीको भी प्रिय पत्नी बननेका सौभाग्य प्राप्त हो गया। अतएव तुलसीसहित ये चार प्रेयसी पत्नियाँ कही गयी हैं। (अध्याय ११-१२)
तुलसीके कथा-प्रसङ्गमें राजा वृषध्वजका चरित्र-वर्णन
नारदजीने पूछा— प्रभो! साध्वी तुलसी भगवान् श्रीहरिकी पत्नी कैसे बनी? इसका जन्म कहाँ हुआ था और पूर्वजन्ममें यह कौन थी? इस साध्वी देवीने किसके कुलको पवित्र किया था तथा इसके माता-पिता कौन थे? किस तपस्याके प्रभावसे प्रकृतिके अधिष्ठाता भगवान् श्रीहरि इसे