ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड १५७
पतिरूपसे प्राप्त हुए? क्योंकि ये परम प्रभु तो बिलकुल निःस्पृह हैं। दूसरा प्रश्न यह है कि ऐसी सुयोग्या देवीको वृक्ष क्यों होना पड़ा और यह परम तपस्विनी देवी कैसे असुरके चंगुलमें फँस गयी? सम्पूर्ण संदेहोंको दूर करनेवाले प्रभो! आप मेरे इस संशयको मिटानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण कहते हैं— नारद! दक्षसावर्णि नामसे प्रसिद्ध एक पुण्यात्मा मनु हो गये हैं। भगवान् विष्णुके अंशसे प्रकट ये मनु परम पवित्र, यशस्वी, विशद कीर्तिसे सम्पन्न तथा श्रीहरिके प्रति अटूट श्रद्धा रखनेवाले थे। इनके पुत्रका नाम था ब्रह्मसावर्णि। उनका भी अन्तःकरण स्वच्छ था। उनके मनमें धार्मिक भावना थी और भगवान् श्रीहरिपर वे श्रद्धा रखते थे। ब्रह्मसावर्णिके पुत्र धर्मसावर्णि नामसे प्रसिद्ध हुए, जिनकी इन्द्रियाँ सदा वशमें रहती थीं और मन श्रीहरिकी उपासनामें निरत रहता था। धर्मसावर्णिसे इन्द्रियनिग्रही एवं परम भक्त रुद्रसावर्णि पुत्ररूपमें प्रकट हुए। इन रुद्रसावर्णिके पुत्रका नाम देवसावर्णि हुआ। ये भी परम वैष्णव थे। देवसावर्णिके पुत्रका नाम इन्द्रसावर्णि था। फिर भगवान् विष्णुके अनन्य उपासक इन इन्द्रसावर्णिसे वृषध्वजका जन्म हुआ। भगवान् शंकरमें इस वृषध्वजकी असीम श्रद्धा थी। स्वयं भगवान् शंकर इसके यहाँ बहुत कालतक ठहरे थे। इसके प्रति भगवान् शंकरका स्नेह पुत्रसे भी बढ़कर था। राजा वृषध्वजकी भगवान् नारायण, लक्ष्मी और सरस्वती—इनमें किसीके प्रति श्रद्धा नहीं थी। उसने सम्पूर्ण देवताओंका पूजन त्याग दिया था। अभिमानमें चूर होकर वह भाद्रपदमासमें महालक्ष्मीकी पूजामें विघ्न उपस्थित किया करता था। माघकी शुक्ल पञ्चमीके दिन समस्त देवता सरस्वतीकी विस्तृतरूपसे पूजा करते थे; परंतु वह नरेश उसमें सम्मिलित नहीं होता था। यज्ञ और विष्णु-पूजाकी निन्दा करना उसका मानो स्वभाव ही बन गया था। वह केवल भगवान् शिवमें ही श्रद्धा रखता था। ऐसे स्वभाववाले राजा वृषध्वजको देखकर सूर्यने उसे शाप दे दिया—‘राजन्! तेरी श्री नष्ट हो जाय!’
भक्तपर संकट देख आशुतोष भोलेनाथ भगवान् शंकर हाथमें त्रिशूल उठाकर सूर्यपर टूट पड़े। तब सूर्य अपने पिता कश्यपजीके साथ ब्रह्माजीकी शरणमें गये। शंकर त्रिशूल लिये ब्रह्मलोकको चल दिये। ब्रह्माको भी शंकरजीका भय था, अतएव उन्होंने सूर्यको आगे करके वैकुण्ठकी यात्रा की। उस समय ब्रह्मा, कश्यप और सूर्य तीनों भयभीत थे। उन तीनों महानुभावोंने सर्वेश भगवान् नारायणकी शरण ग्रहण की। तीनोंने मस्तक झुकाकर भगवान् श्रीहरिको प्रणाम किया, बारंबार प्रार्थना की और उनके सामने अपने भयका सम्पूर्ण कारण कह सुनाया। तब भगवान् नारायणने कृपापूर्वक उन सबको अभय प्रदान किया और कहा—‘भयभीत देवताओ! स्थिर हो जाओ। मेरे रहते तुम्हें कोई भय नहीं। विपत्तिके अवसरपर डरे हुए जो भी व्यक्ति जहाँ-कहीं भी मुझे याद करते हैं, मैं हाथमें चक्र लिये तुरंत वहीं पहुँचकर उनकी रक्षा करता हूँ*। देवो! मैं अखिल जगत्का कर्ता-भर्ता हूँ। मैं ही ब्रह्मरूपसे सदा संसारकी सृष्टि करता हूँ और शंकररूपसे संहार। मैं ही शिव हूँ। तुम भी मेरे ही रूप हो और ये शंकर भी मुझसे भिन्न नहीं हैं। मैं ही नाना रूप धारण करके सृष्टि और पालनकी व्यवस्था किया करता हूँ। देवताओ! तुम्हारा कल्याण हो; जाओ, अब तुम्हें भय नहीं होगा। मैं वचन देता हूँ, आजसे शंकरका भय तुम्हारे पास नहीं आ सकेगा। वे सर्वेश भगवान्
* स्मरन्ति ये यत्र तत्र मां विपत्तौ भयान्विताः। तांस्तत्र गत्वा रक्षामि चक्रहस्तस्त्वरान्वितः॥
(प्रकृतिखण्ड १३। २०)