भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 201

प्रकृतिखण्ड १९१

मुक्त कर देता है। द्विजको चाहिये कि वह पूर्वाभिमुख होकर बैठे। हाथको सर्पकी फणके समान कर ले। वह हाथ ऊर्ध्वमुख हो और ऊपरकी ओरसे कुछ-कुछ मुद्रित (मुँदा-सा) रहे। उसे किञ्चित् झुकाये हुए स्थिर रखे। अनामिकाके बिचले पर्वसे आरम्भ करके नीचे और बायें होते हुए तर्जनीके मूलभागतक अँगूठेसे स्पर्शपूर्वक जप करे। हाथमें जप करनेका यही क्रम है।* राजन्! श्वेत कमलके बीजोंकी अथवा स्फटिक मणिकी माला बनाकर उसका संस्कार कर लेना चाहिये। इन्हीं वस्तुओंकी माला बनाकर तीर्थमें अथवा किसी देवताके मन्दिरमें जप करे। पीपलके सात पत्तोंपर संयमपूर्वक मालाको रखकर गोरोचनसे अनुलिप्त करे। फिर गायत्री-जपपूर्वक विद्वान् पुरुष उस मालाको स्नान करावे। तत्पश्चात् उसी मालापर विधिपूर्वक गायत्रीके सौ मन्त्रोंका जप करना चाहिये। अथवा पञ्चगव्य या गङ्गाजलसे स्नान करा देनेपर भी मालाका संस्कार हो जाता है। इस तरह शुद्ध की हुई मालासे जप करना चाहिये।

राजर्षे! तुम इस क्रमसे दस लाख गायत्रीका जप करो। इससे तुम्हारे तीन जन्मोंके पाप क्षीण हो जायँगे। तत्पश्चात् तुम भगवती सावित्रीका साक्षात् दर्शन कर सकोगे। राजन्! तुम प्रतिदिन मध्याह्न, सायं एवं प्रातःकालकी संध्या पवित्र होकर करना; क्योंकि संध्या न करनेवाला अपवित्र व्यक्ति सम्पूर्ण कर्मोंके लिये सदा अनधिकारी हो जाता है। वह दिनमें जो कुछ सत्कर्म करता है, उसके फलसे वञ्चित रहता है। जो प्रातः एवं सायंकालकी संध्या नहीं करता है, वह ब्राह्मण सम्पूर्ण ब्राह्मणोचित कर्मोंसे बहिष्कृत माना जाता है। जो प्रातः और सायंकालकी संध्योपासना नहीं करता है, वह शूद्रकी भाँति समस्त द्विजोचित कर्मोंसे बहिष्कृत कर देने योग्य हो जाता है। जीवनपर्यन्त त्रिकाल-संध्या करनेवाले ब्राह्मणमें तेज अथवा तपके प्रभावसे सूर्यके समान तेजस्विता आ जाती है। ऐसे ब्राह्मणकी चरणरजसे पृथ्वी पवित्र हो जाती है। जिस ब्राह्मणके हृदयमें संध्याके प्रभावसे पाप स्थान नहीं पा सके हों, वह तेजस्वी द्विज जीवन्मुक्त ही है। उसके स्पर्शमात्रसे सम्पूर्ण तीर्थ पवित्र हो जाते हैं। पाप उसे छोड़कर वैसे ही भाग जाते हैं; जैसे गरुड़को देखकर सर्पोंमें भगदड़ मच जाती है। त्रिकाल संध्या न करनेवाले द्विजके दिये हुए पिण्ड और तर्पणको उसके पितर इच्छापूर्वक ग्रहण नहीं करते तथा देवगण भी स्वतन्त्रतासे उसे लेना नहीं चाहते।

मुने! इस प्रकार कहकर मुनिवर पराशरने राजा अश्वपतिको सावित्रीकी पूजाके सम्पूर्ण विधान तथा ध्यान आदि अभिलषित प्रयोग बतला दिये। उन महाराजको उपदेश देकर मुनिवर अपने स्थानको चले गये; फिर राजाने सावित्रीकी उपासना की। उन्हें उनके दर्शन प्राप्त हुए और अभीष्ट वर भी प्राप्त हो गया।

नारदने पूछा— भगवन्! मुनिवर पराशरने सावित्रीके किस ध्यान, किस पूजा-विधान, किस स्तोत्र और किस मन्त्रका उपदेश दिया था तथा राजाने किस विधिसे श्रुति-जननी सावित्रीकी पूजा करके किस वरको प्राप्त किया? किस विधानसे भगवती उनसे सुपूजित हुईं? मैं ये सभी प्रसङ्ग सुनना चाहता हूँ। सावित्रीकी श्रेष्ठ महिमा अत्यन्त रहस्यमयी है। कृपया मुझे सुनाइये।


* करं सर्पफणाकारं कृत्वा तं तूर्ध्वमुद्रितम् ॥
आनम्रमूर्ध्वमचलं प्रजपेत् प्राङ्मुखो द्विजः। अनामिकामध्यदेशादधो वामक्रमेण च॥
तर्जनीमूलपर्यन्तं जपस्यैष क्रमः करे।
(प्रकृतिखण्ड २३। १७—१९)

ब्रह्मवैवर्त पुराण · पृष्ठ 201, कुल 810 में से · BharatKosha