ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १९२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशीके दिन संयमपूर्वक रहकर चतुर्दशीके दिन व्रत करके शुद्ध समयमें भक्तिके साथ भगवती सावित्रीकी पूजा करनी चाहिये। यह चौदह वर्षका व्रत है। इसमें चौदह फल और चौदह नैवेद्य अर्पण किये जाते हैं। पुष्प एवं धूप, वस्त्र तथा यज्ञोपवीत आदिसे विधिपूर्वक पूजन करके नैवेद्य अर्पण करनेका विधान है। एक मङ्गल-कलश स्थापित करके उसपर फल और पल्लव रख दे। द्विजको चाहिये कि गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और पार्वतीकी पूजा करके आवाहित कलशपर अपनी इष्टदेवी सावित्रीका पूजन करे। देवी सावित्रीका ध्यान सुनो। यजुर्वेदकी माध्यन्दिनी शाखामें इसका प्रतिपादन हुआ है। स्तोत्र, पूजा-विधान तथा समस्त कामप्रद मन्त्र भी बतलाता हूँ। ध्यान यह है—
'भगवती सावित्रीका वर्ण तपाये हुए सुवर्णके समान है। ये सदा ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान रहती हैं। इनकी प्रभा ऐसी है, मानो ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सहस्रों सूर्य हों। इनके प्रसन्न मुखपर मुस्कान छायी रहती है। रत्नमय भूषण इन्हें अलंकृत किये हुए हैं। दो अग्निशुद्ध वस्त्रोंको इन्होंने धारण कर रखा है। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही ये साकाररूपसे प्रकट हुई हैं। जगद्धाता प्रभुकी इन प्राणप्रियाको 'सुखदा', 'मुक्तिदा', 'शान्ता', 'सर्वसम्पत्स्वरूपा' तथा 'सर्वसम्पत्प्रदात्री' कहते हैं। ये वेदोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं (वेद-शास्त्र इनके स्वरूप हैं। मैं ऐसी वेदबीजस्वरूपा वेदमाता आप भगवती सावित्रीकी उपासना करता हूँ।' इस प्रकार ध्यान करके अपने मस्तकपर पुष्प रखे। फिर श्रद्धाके साथ ध्यानपूर्वक कलशके ऊपर भगवती सावित्रीका आवाहन करे। वेदोक्त मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए सोलह प्रकारके उपचारोंसे व्रती पुरुष भगवतीकी पूजा करे। विधिपूर्वक पूजा और स्तुति सम्पन्न हो जानेपर देवेश्वरी सावित्रीको प्रणाम करे। आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अनुलेपन, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, शीतल जल, वस्त्र, भूषण, माला, गन्ध, आचमन और मनोहर शय्या—ये देने योग्य षोडश उपचार हैं।
[आसन-समर्पण-मन्त्र]
दारुसारविकारं च हेमादिनिर्मितं च वा।
देवाधारं पुण्यदं च मया तुभ्यं निवेदितम्॥ ५५॥
देवि! यह आसन उत्तम काष्ठके सारतत्त्वसे बना हुआ है। साथ ही सुवर्ण आदिका बना हुआ आसन भी प्रस्तुत है। देवताओंके बैठनेयोग्य यह पुण्यप्रद आसन मैंने सदाके लिये आपकी सेवामें समर्पित कर दिया है॥ ५५॥
[पाद्य-मन्त्र]
तीर्थोदकं च पाद्यं च पुण्यदं प्रीतिदं महत्।
पूजाङ्गभूतं शुद्धं च मया भक्त्या निवेदितम्॥ ५६॥
देवेश्वरि! यह तीर्थका पवित्र जल आपके लिये पाद्यके रूपमें प्रस्तुत है, जो अत्यन्त प्रीतिदायक तथा पुण्यप्रद है। पूजाका अङ्गभूत यह शुद्ध पाद्य मैंने भक्तिभावसे आपके चरणोंमें अर्पित किया है॥ ५६॥
[अर्घ्य-मन्त्र]
पवित्ररूपमर्घ्यं च दूर्वापुष्पाक्षतान्वितम्।
पुण्यदं शङ्खतोयाक्तं मया तुभ्यं निवेदितम्॥ ५७॥
देवि! यह शङ्खके जलसे युक्त तथा दूर्वा, पुष्प और अक्षतसे सम्पन्न परम पवित्र पुण्यदायक अर्घ्य मेरे द्वारा आपकी सेवामें निवेदन किया गया है॥ ५७॥
[स्नानीय-मन्त्र]
सुगन्धिधात्रीतैलं च देहसौन्दर्यकारणम्।
मया निवेदितं भक्त्या स्नानीयं प्रतिगृह्यताम्॥ ५८॥
देवि! जो शरीरके सौन्दर्यको बढ़ानेमें कारण है, वह सुगन्धित आँवलेका तैल और स्नानके लिये जल मैंने भक्तिभावसे सेवामें निवेदित किया है। आप यह सब स्वीकार करें॥ ५८॥