ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 203, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड १९३
[अनुलेपन-मन्त्र]
मलयाचलसम्भूतं देहशोभाविवर्द्धनम्।
सुगन्धियुक्तं सुखदं मया तुभ्यं निवेदितम्॥ ५९॥
देवेश्वरि! यह मलयपर्वतसे उत्पन्न, सुगन्धयुक्त सुखद चन्दन, जो देहकी शोभाको बढ़ानेवाला है, मैंने अनुलेपनके रूपमें आपको अर्पित किया है॥ ५९॥
[धूप-समर्पण-मन्त्र]
गन्धद्रव्योद्भवः पुण्यः प्रीतिदो दिव्यगन्धदः।
मया निवेदितो भक्त्या धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥ ६०॥
देवि! जो सुगन्धित द्रव्योंसे बना हुआ, पवित्र, प्रीतिदायक तथा दिव्य सुगन्ध प्रकट करनेवाला है, ऐसा यह धूप मैंने भक्तिभावसे आपको अर्पित किया है। आप इसे ग्रहण करें॥ ६०॥
[दीप-समर्पण-मन्त्र]
जगतां दर्शनीयं च दर्शनं दीप्तिकारणम्।
अन्धकारध्वंसबीजं मया तुभ्यं निवेदितम्॥ ६१॥
देवेश्वरि! जो जगत्के लिये दर्शनीय, दृष्टिका सहायक तथा दीप्ति (प्रकाश)-का कारण है, जिसे अन्धकारके विनाशका बीज कहा गया है, वह दिव्य दीप मेरे द्वारा आपकी सेवामें निवेदन किया गया है॥ ६१॥
[नैवेद्य-समर्पण-मन्त्र]
तुष्टिदं पुष्टिदं चैव प्रीतिदं क्षुद्विनाशनम्।
पुण्यदं स्वादुरूपं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥ ६२॥
देवि! जो तुष्टि, पुष्टि, प्रीति तथा पुण्य प्रदान करनेवाला तथा भूख मिटानेमें समर्थ है, ऐसा सुस्वादु नैवेद्य आपके समक्ष प्रस्तुत है, आप इसे स्वीकार करें॥ ६२॥
[ताम्बूल-समर्पण-मन्त्र]
ताम्बूलं च वरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम्।
तुष्टिदं पुष्टिदं चैव मया भक्त्या निवेदितम्॥ ६३॥
देवेश्वरि! यह सुन्दर, रमणीय, सन्तोषप्रद, पुष्टिकारक एवं कर्पूर आदिसे सुवासित ताम्बूल मैंने भक्तिभावसे अर्पित किया है। कृपया ग्रहण करें॥ ६३॥
[शीतल जल-समर्पण-मन्त्र]
सुशीतलं वासितं च पिपासानाशकारणम्।
जगतां जीवरूपं च जीवनं प्रतिगृह्यताम्॥ ६४॥
हे देवि! यह प्यास मिटानेमें समर्थ तथा सम्पूर्ण जगत्का जीवनरूप सुवासित एवं सुशीतल जल अर्पित है, इसे स्वीकार करें॥ ६४॥
[वस्त्र-समर्पण-मन्त्र]
देहशोभास्वरूपं च सभाशोभाविवर्द्धनम्।
कार्पासजं च कृमिजं वसनं प्रतिगृह्यताम्॥ ६५॥
देवेश्वरि! यह सूती और रेशमी वस्त्र देहकी शोभाका तो स्वरूप ही है, सभामें शरीरकी विशेष शोभाकी वृद्धि करनेवाला है। अतः इसे ग्रहण करें॥ ६५॥
[भूषण-समर्पण-मन्त्र]
काञ्चनादिविनिर्माणं श्रीयुक्तं श्रीकरं सदा।
सुखदं पुण्यदं चैव भूषणं प्रतिगृह्यताम्॥ ६६॥
देवि! सुवर्ण आदिका बना हुआ यह आभूषण सेवामें अर्पित है। यह स्वयं तो सुन्दर है ही; जो इसे धारण करता है, उसकी शोभाको भी यह सदा बढ़ाता रहता है। इससे सुख और पुण्यकी प्राप्ति होती है, अतः आप कृपापूर्वक इसे स्वीकार करें॥ ६६॥
[माल्य-समर्पण-मन्त्र]
नानापुष्पविनिर्माणं बहुभाससमन्वितम्।
प्रीतिदं पुण्यदं चैव माल्यं च प्रतिगृह्यताम्॥ ६७॥
देवेश्वरि! नाना प्रकारके फूलोंका बना हुआ यह सुन्दर हार अत्यन्त प्रकाशमान है। इससे आपको प्रसन्नता प्राप्त होगी। अतः कृपया इस पुण्यदायक हारको आप ग्रहण करें॥ ६७॥
[गन्ध-समर्पण-मन्त्र]
सर्वमङ्गलस्वरूपश्च सर्वमङ्गलदो वरः।
पुण्यप्रदश्च गन्धाढ्यो गन्धश्च प्रतिगृह्यताम्॥ ६८॥
देवि! यह सर्वमङ्गलस्वरूप एवं सर्वमङ्गलदायक, श्रेष्ठ, पुण्यप्रद तथा सुगन्धित गन्ध आपकी सेवामें समर्पित है, इसे स्वीकार कीजिये॥ ६८॥