भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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२००संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

है। अपने घरपर दान करनेकी अपेक्षा देवमन्दिरमें दान करनेसे चौगुना, पूर्तकर्म (वापी, कूप, तड़ाग आदिके निर्माण)-के अवसरपर करनेसे सौगुना तथा किसी श्रेष्ठ तीर्थस्थानमें करनेसे आठगुना फल होता है—यह ब्रह्माजीका वचन है।

समस्त प्राणियोंके उपकारके लिये तड़ागका दान करनेवाला दस हजार वर्षोंकी अवधि लेकर जनलोकमें जाता है। बावलीका दान करनेसे मनुष्यको सदा सौगुना फल मिलता है। वह सेतु (पुल)-का दान करनेपर तड़ागके दानका भी पुण्यफल प्राप्त कर लेता है। तड़ागका प्रमाण चार हजार धनुष* चौड़ा और उतना ही लंबा निश्चित किया गया है। इससे जो लघु प्रमाणमें है, वह वापी कही जाती है। सत्पात्रको दी हुई कन्या दस वापीके समान पुण्यप्रदा होती है। यदि उस कन्याको अलंकृत करके दान किया जाय तो दुगुना फल मिलता है। तड़ागके दानसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, वही उसके भीतरसे कीचड़ और मिट्टी निकालनेसे सुलभ हो जाता है। वापीके कीचड़को दूर करानेसे उसके निर्माण कराने-जितना फल होता है। पतिव्रते ! जो पुरुष पीपलका वृक्ष लगाकर उसकी प्रतिष्ठा करता है, वह हजारों वर्षोंके लिये भगवान् विष्णुके तपोलोकमें जाता है। सावित्री ! जो सबकी भलाईके लिये पुष्पोद्यान लगाता है, वह दस हजार वर्षोंतक ध्रुवलोकमें स्थान पाता है। पतिव्रते ! विष्णुके उद्देश्यसे विमानका दान करनेवाला मानव एक मन्वन्तरतक विष्णुलोकमें वास करता है। यदि वह विमान विशाल और चित्रोंसे सुसज्जित किया गया हो तो उसके दानसे चौगुना फल प्राप्त होता है। शिविका-दानमें उससे आधा फल होना निश्चित है। जो पुरुष भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीहरिके उद्देश्यसे मन्दिराकार झूला दान करता है, वह अति दीर्घकालतक भगवान् विष्णुके लोकमें वास करता है। पतिव्रते ! जो सड़क बनवाता और उसके किनारे लोगोंके ठहरनेके लिये महल (धर्मशाला) बनवा देता है, वह सत्पुरुष हजारों वर्षोंतक इन्द्रके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। ब्राह्मणों अथवा देवताओंको दिया हुआ दान समान फल प्रदान करता है। जो पूर्वजन्ममें दिया गया है, वही जन्मान्तरमें प्राप्त होता है। जो नहीं दिया गया है, वह कैसे प्राप्त हो सकता है? पुण्यवान् पुरुष स्वर्गीय सुख भोगकर भारतवर्षमें जन्म पाता है। उसे क्रमशः उत्तम-से-उत्तम ब्राह्मण-कुलमें जन्म लेनेका सौभाग्य प्राप्त होता है। पुण्यवान् ब्राह्मण स्वर्गसुख भोगनेके अनन्तर पुनः ब्राह्मण ही होता है। यही नियम क्षत्रिय आदिके लिये भी है। क्षत्रिय अथवा वैश्य तपस्याके प्रभावसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है—ऐसी बात श्रुतिमें सुनी जाती है। धर्मरहित ब्राह्मण नाना योनियोंमें भटकते हैं और कर्मभोगके पश्चात् फिर ब्राह्मणकुलमें ही जन्म पाते हैं। कितना ही काल क्यों न बीत जाय, बिना भोग किये कर्म क्षीण नहीं हो सकते। अपने किये हुए शुभ और अशुभ कर्मोंका फल प्राणियोंको अवश्य भोगना पड़ता है। देवता और तीर्थकी सहायता तथा कायव्यूहसे प्राणी शुद्ध हो जाता है।

साध्वि ! ये कुछ बातें तो तुम्हें बतला दीं, अब आगे और क्या सुनना चाहती हो?

(अध्याय २६)


* चार हाथकी लंबाईको धनुषका प्रमाण कहते हैं।