भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 211

प्रकृतिखण्ड २०१


सावित्री-धर्मराजके प्रश्नोत्तर तथा सावित्रीके द्वारा धर्मराजको प्रणाम-निवेदन

**सावित्रीने कहा—**धर्मराज ! जिस कर्मके प्रभावसे पुण्यात्मा मनुष्य स्वर्ग अथवा अन्य लोकमें जाते हैं, वह मुझे बतानेकी कृपा करें।

**धर्मराज बोले—**पतिव्रते ! ब्राह्मणको अन्न दान करनेवाला पुरुष इन्द्रलोकमें जाता है और दान किये हुए अन्नमें जितने दाने होते हैं उतने वर्षोंतक वह वहाँ निवास पाता है। अन्नदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान न हुआ है और न होगा। इसमें न कभी पात्रकी परीक्षाकी आवश्यकता होती है और न समयकी*। साध्वि ! यदि ब्राह्मणों अथवा देवताओंको आसन दान किया जाय तो हजारों वर्षोंतक अग्निदेवके लोकमें रहनेकी सुविधा प्राप्त हो जाती है। जो पुरुष ब्राह्मणको दूध देनेवाली गौ दान करता है, वह गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक वैकुण्ठलोकमें प्रतिष्ठित रहता है। यह गोदान साधारण दिनोंकी अपेक्षा पर्वके समय चौगुना, तीर्थमें सौगुना और नारायणक्षेत्रमें कोटिगुना फल देनेवाला होता है। जो मानव भारतवर्षमें रहकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको गौ प्रदान करता है, वह हजारों वर्षोंतक चन्द्रलोकमें रहनेका अधिकारी बन जाता है। दुग्धवती गौ ब्राह्मणको देनेवाला पुरुष उसके रोमपर्यन्त वर्षोंतक विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो ब्राह्मणको वस्त्रसहित शालग्राम-शिलाका दान करता है, वह चन्द्रमा और सूर्यके स्थितिकालतक वैकुण्ठमें सम्मानपूर्वक रहता है। ब्राह्मणको सुन्दर स्वच्छ छत्र दान करनेवाला व्यक्ति हजारों वर्षोंतक वरुणके लोकमें आनन्द करता है। साध्वि ! जो ब्राह्मणको दो पादुकाएँ प्रदान करता है, उसे दस हजार वर्षतक वायुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। मनोहर दिव्य शय्या ब्राह्मणको देनेसे दीर्घकालतक चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा होती है। जो देवताओं अथवा ब्राह्मणोंको दीप-दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें वास करता है। उस पुण्यसे उसके नेत्रोंमें ज्योति बनी रहती है तथा वह यमलोकमें नहीं जाता। भारतवर्षमें जो मनुष्य ब्राह्मणको हाथी दान करता है, वह इन्द्रकी आयुपर्यन्त उनके आधे आसनपर विराजमान होता है। ब्राह्मणको घोड़ा देनेवाला भारतवासी मनुष्य वरुणलोकमें आनन्द करता है। ब्राह्मणको उत्तम शिविका—पालकी प्रदान करनेवाला विष्णुलोकमें जाता है। जो ब्राह्मणको पंखा तथा सफेद चँवर अर्पण करता है, वह वायुलोकमें सम्मान पाता है। जो भारतवर्षमें ब्राह्मणको धानका पर्वत देता है, वह धानके दानोंके बराबर वर्षोंतक विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। दाता और प्रतिगृहीता दोनों ही वैकुण्ठलोकमें चले जाते हैं।

जो भारतवर्षमें निरन्तर भगवान् श्रीहरिके नामका कीर्तन करता है, उस चिरञ्जीवी मनुष्यको देखते ही मृत्यु भाग जाती है। भारतवर्षमें जो विद्वान् मनुष्य पूर्णिमाको रातभर दोलोत्सव मनानेका प्रबन्ध करता है, वह जीवन्मुक्त है। इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें वह भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त होता है। उत्तराफाल्गुनीमें उत्सव मनानेसे इससे दुगुना फल मिलता है। जो भारतवर्षमें ब्राह्मणको तिलदान करता है, वह तिलके बराबर वर्षोंतक विष्णुधाममें सम्मान पाता है। उसके बाद उत्तम योनिमें जन्म पाकर चिरजीवी हो सुख भोगता है। ताँबेके पात्रमें तिल रखकर दान करनेसे दूना फल मिलता है। जो मनुष्य ब्राह्मणको फलयुक्त वृक्ष प्रदान करता है, वह फलके बराबर वर्षोंतक इन्द्रलोकमें सम्मान पाता है। फिर उत्तम योनिमें जन्म पाकर वह सुयोग्य पुत्र प्राप्त करता है। फलवाले वृक्षोंके दानकी महिमा इससे हजारगुना अधिक बतायी


* अन्नदानात् परं दानं न भूतं न भविष्यति। नात्र पात्रपरीक्षा स्यान्न कालनियमः क्वचित्॥
(प्रकृतिखण्ड २७।३)