भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

गयी है अथवा ब्राह्मणको केवल फलका भी दान करनेवाला पुरुष दीर्घकालतक स्वर्गमें वास करके पुनः भारतवर्षमें जन्म पाता है।

भारतवर्षमें रहनेवाला जो पुरुष अनेक द्रव्योंसे सम्पन्न तथा भाँति-भाँतिके धान्योंसे भरे-पूरे विशाल भवन ब्राह्मणको दान करता है, वह उसके फलस्वरूप दीर्घकालतक कुबेरके लोकमें वास पाता है। तत्पश्चात् उत्तम योनिमें जन्म पाकर वह महान् धनवान् होता है। साध्वि! हरी-भरी खेतीसे युक्त सुन्दर भूमि भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको अर्पण करनेवाला पुरुष निश्चयपूर्वक वैकुण्ठधाममें प्रतिष्ठित होता है। जो मानव उत्तम गोशाला तथा गाँव ब्राह्मणको दान करता है, उसकी वैकुण्ठलोकमें प्रतिष्ठा होती है। फिर, जहाँकी उत्तम प्रजाएँ हों, जहाँकी भूमि पकी हुई खेतियोंसे लहलहा रही हो, अनेक प्रकारकी पुष्करिणियोंसे संयुक्त हो तथा फलवाले वृक्ष और लताएँ जिसकी शोभा बढ़ा रही हों, ऐसा श्रेष्ठ नगर जो पुरुष भारतवर्षमें ब्राह्मणको दान करता है, वह बहुत लंबे समयपर्यन्त वैकुण्ठधाममें सुप्रतिष्ठित होता है। फिर भारतवर्षमें उत्तम जन्म पाकर राजेश्वर होता है। उसे लाखों नगरोंका प्रभुत्व प्राप्त होता है। इसमें संशय नहीं है। निश्चितरूपसे सम्पूर्ण ऐश्वर्य भूमण्डलपर उसके पास विराजमान रहते हैं।

अत्यन्त उत्तम अथवा मध्यम श्रेणीका भी नगर प्रजाओंसे सम्पन्न हो, वापी, तड़ाग तथा भाँति-भाँतिके वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हों, ऐसे सौ नगर ब्राह्मणको दान करनेवाला पुण्यात्मा वैकुण्ठलोकमें सुप्रतिष्ठित होता है। जैसे इन्द्र सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न होकर स्वर्गलोकमें शोभा पाते हैं, वैसे ही भूमण्डलपर उस पुरुषकी शोभा होती है। दीर्घ कालतक पृथ्वी उसका साथ नहीं छोड़ती। वह महान् सम्राट् होता है। अपना सम्पूर्ण अधिकार ब्राह्मणको देनेवाला पुरुष चौगुने फलका भागी होता है; इसमें संशय नहीं है।

पतिव्रते! जो पुरुष ब्राह्मणको जम्बूद्वीपका दान करता है, उसे निश्चितरूपसे सौगुने फल प्राप्त होते हैं। जो सातों द्वीपोंकी पृथ्वीका दान करनेवाले, सम्पूर्ण तीर्थोंमें निवास करनेवाले, समस्त तपस्याओंमें संलग्न, सम्पूर्ण उपवास-व्रतके पालक, सर्वस्व दान करनेवाले तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंके पारङ्गत तथा श्रीहरिके भक्त हैं, उन्हें पुनः जगत्में जन्म धारण करना नहीं पड़ता। उनके सामने असंख्य ब्रह्माओंका पतन हो जाता है, परंतु वे श्रीहरिके गोलोक या वैकुण्ठधाममें निवास करते रहते हैं। विष्णु-मन्त्रकी उपासना करनेवाले पुरुष अपने मानवशरीरका त्याग करनेके पश्चात् जन्म, मृत्यु एवं जरासे रहित दिव्य रूप धारण करके श्रीहरिका सारूप्य पाकर उनकी सेवामें संलग्न हो जाते हैं। देवता, सिद्ध तथा अखिल विश्व—ये सब-के-सब समयानुसार नष्ट हो जाते हैं, किंतु श्रीकृष्णभक्तोंका कभी नाश नहीं होता। जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था उनके निकट नहीं आ सकती।

जो पुरुष कार्तिकमासमें श्रीहरिको तुलसी अर्पण करता है, वह पत्र-संख्याके बराबर युगोंतक भगवान्के धाममें विराजमान होता है। फिर उत्तम कुलमें उसका जन्म होता और निश्चितरूपसे भगवान्के प्रति उसके मनमें भक्ति उत्पन्न होती है, वह भारतमें सुखी एवं चिरञ्जीवी होता है। जो कार्तिकमें श्रीहरिको घीका दीप देता है, वह जितने पल दीपक जलता है, उतने वर्षोंतक हरिधाममें आनन्द भोगता है। फिर अपनी योनिमें आकर विष्णुभक्ति पाता है; महाधनवान् नेत्रकी ज्योतिसे युक्त तथा दीप्तिमान् होता है। जो पुरुष माघमें अरुणोदयके समय प्रयागकी गङ्गामें स्नान करता है, उसे दीर्घकालतक भगवान् श्रीहरिके मन्दिरमें आनन्द लाभ करनेका सुअवसर मिलता है। फिर वह उत्तम योनिमें आकर भगवान् श्रीहरिकी भक्ति एवं मन्त्र पाता है; भारतमें