भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

प्रकृतिखण्ड

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जितेन्द्रियशिरोमणि होता है। पुनः यथासमय मानव-शरीरको त्यागकर 'भगवद्धाम' में जाता है। वहाँसे पुनः पृथ्वीतलपर आनेकी स्थिति उसके सामने नहीं आती। भगवान्‌का सारूप्य प्राप्तकर वह उन्हींकी सेवामें सदा लगा रहता है। गङ्गामें सर्वदा स्नान करनेवाला पुरुष सूर्यकी भाँति भूमण्डलपर पवित्र माना जाता है। उसे पद-पदपर अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है, यह निश्चित है। उसकी चरण-रजसे पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। वह वैकुण्ठलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है। उस तेजस्वी पुरुषको जीवन्मुक्त कहना चाहिये। सम्पूर्ण तपस्वी उसका आदर करते हैं। जो पुरुष मीन और कर्कके मध्यवर्तीकालमें भारतवर्षमें सुवासित जलका दान करता है, वह वैकुण्ठमें आनन्द भोगता रहता है। फिर उत्तम योनिमें जन्म पाकर रूपवान्, सुखी, शिवभक्त, तेजस्वी तथा वेद और वेदाङ्गका पारगामी विद्वान् होता है। वैशाखमासमें ब्राह्मणको सत्तू दान करनेवाला पुरुष सत्तूकणके बराबर वर्षोंतक विष्णुमन्दिरमें प्रतिष्ठित होता है। भारतवर्षमें रहनेवाला जो प्राणी श्रीकृष्णजन्माष्टमीका व्रत करता है, वह सौ जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसमें संशय नहीं है। वह दीर्घकालतक वैकुण्ठलोकमें आनन्द भोगता है। फिर उत्तम योनिमें जन्म लेनेपर उसे भगवान् श्रीकृष्णके प्रति भक्ति उत्पन्न हो जाती है—यह निश्चित है। इस भारतवर्षमें ही शिवरात्रिका व्रत करनेवाला पुरुष दीर्घकालतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो शिवरात्रिके दिन भगवान् शंकरको बिल्वपत्र चढ़ाता है, वह पत्र-संख्याके बराबर युगोंतक कैलासमें सुखपूर्वक वास करता है। पुनः श्रेष्ठ योनिमें जन्म लेकर भगवान् शिवका परम भक्त होता है। विद्या, पुत्र, सम्पत्ति, प्रजा और भूमि—ये सभी उसके लिये सुलभ रहते हैं।

जो व्रती पुरुष चैत्र अथवा माघमासमें शंकरकी पूजा करता है तथा बेंत लेकर उनके सम्मुख रात-दिन भक्तिपूर्वक नृत्य करनेमें तत्पर रहता है, वह चाहे एक मास, आधा मास, दस दिन, सात दिन अथवा दो ही दिन या एक ही दिन ऐसा क्यों न करे, उसे दिनकी संख्याके बराबर युगोंतक भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है।

साध्वि! जो मनुष्य भारतवर्षमें रामनवमीका व्रत करता है, वह सात मन्वन्तरोंतक विष्णुधाममें आनन्दका अनुभव करता है, फिर अपनी योनिमें आकर रामभक्ति पाता और जितेन्द्रियशिरोमणि होता है। जो पुरुष भगवतीकी शरत्कालीन महापूजा करता है; साथ ही नृत्य, गीत तथा वाद्य आदिके द्वारा नाना प्रकारके उत्सव मनाता है, वह पुरुष भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। फिर श्रेष्ठ योनिमें जन्म पाकर वह निर्मल बुद्धि पाता है। अतुल सम्पत्ति, पुत्र-पौत्रोंकी अभिवृद्धि, महान् प्रभाव तथा हाथी-घोड़े आदि वाहन—ये सभी उसे प्राप्त हो जाते हैं। वह राजराजेश्वर भी होता है। इसमें कोई संशय नहीं है। जो पुरुष पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें रहकर भाद्रपदमासकी शुक्लाष्टमीके अवसरपर एक पक्षतक नित्य भक्ति-भावसे महालक्ष्मीकी उपासना करता है, सोलह प्रकारके उत्तम उपचारोंसे भलीभाँति पूजा करनेमें संलग्न रहता है, वह वैकुण्ठधाममें रहनेका अधिकारी होता है।

भारतवर्षमें कार्तिककी पूर्णिमाके अवसरपर सैकड़ों गोप एवं गोपियोंको साथ लेकर रासमण्डल-सम्बन्धी उत्सव मनानेकी बड़ी महिमा है। उस दिन पाषाणमयी प्रतिमामें सोलह प्रकारके उपचारोंद्वारा श्रीराधा-कृष्णकी पूजा करे। इस पुण्यमय कार्यको सम्पन्न करनेवाला पुरुष गोलोकमें वास करता है और भगवान् श्रीकृष्णका परम भक्त बनता है। उसकी भक्ति क्रमशः वृद्धिको प्राप्त होती है। वह सदा भगवान् श्रीहरिका मन्त्र जपता है। वहाँ