भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 215

प्रकृतिखण्ड २०५

इन्द्रके आधे आसनपर विराजमान रहता है। राजसूययज्ञ करनेसे मनुष्यको इससे चौगुना फल मिलता है।

सुन्दरि! सम्पूर्ण यज्ञोंसे भगवान् विष्णुका यज्ञ श्रेष्ठ कहा गया है। ब्रह्माने पूर्वकालमें बड़े समारोहके साथ इस यज्ञका अनुष्ठान किया था। पतिव्रते! उसी यज्ञमें दक्ष प्रजापति और शंकरमें कलह मच गया था। ब्राह्मणोंने क्रोधमें आकर नन्दीको शाप दिया था और नन्दीने ब्राह्मणोंको। यही कारण है कि भगवान् शंकरने दक्षके यज्ञको नष्ट कर डाला। पूर्वकालमें दक्ष, धर्म, कश्यप, शेषनाग, कर्दममुनि, स्वायम्भुवमनु, उनके पुत्र प्रियव्रत, शिव, सनत्कुमार, कपिल तथा ध्रुवने विष्णुयज्ञ किया था। उसके अनुष्ठानसे हजारों राजसूययज्ञोंका फल निश्चितरूपसे मिल जाता है। वह पुरुष अवश्य ही अनेक कल्पोंतक जीवन धारण करनेवाला तथा जीवन्मुक्त होता है।

भामिनि! जिस प्रकार देवताओंमें विष्णु, वैष्णवपुरुषोंमें शिव, शास्त्रोंमें वेद, वर्णोंमें ब्राह्मण, तीर्थोंमें गङ्गा, पुण्यात्मा पुरुषोंमें वैष्णव, व्रतोंमें एकादशी, पुष्पोंमें तुलसी, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, पक्षियोंमें गरुड़, स्त्रियोंमें भगवती मूलप्रकृति राधा, आधारोंमें वसुन्धरा, चञ्चल स्वभाववाली इन्द्रियोंमें मन, प्रजापतियोंमें ब्रह्मा, प्रजेश्वरोंमें प्रजापति, वनोंमें वृन्दावन, वर्षोंमें भारतवर्ष, श्रीमानोंमें लक्ष्मी, विद्वानोंमें सरस्वती, पतिव्रताओंमें भगवती दुर्गा और सौभाग्यवती श्रीकृष्णपत्नियोंमें श्रीराधा सर्वोपरि मानी जाती हैं; उसी प्रकार सम्पूर्ण यज्ञोंमें विष्णुयज्ञ श्रेष्ठ माना जाता है। सम्पूर्ण तीर्थोंका स्नान, अखिल यज्ञोंकी दीक्षा तथा व्रतों एवं तपस्याओं और चारों वेदोंके पाठका तथा पृथिवीकी प्रदक्षिणाका फल अन्तमें यही है कि भगवान् श्रीकृष्णकी मुक्तिदायिनी सेवा सुलभ हो। पुराणों, वेदों और इतिहासमें सर्वत्र श्रीकृष्णके चरण-कमलोंकी अर्चनाको ही सारभूत माना गया है। भगवान्‌के स्वरूपका वर्णन, उनका ध्यान, उनके नाम और गुणोंका कीर्तन, स्तोत्रोंका पाठ, नमस्कार, जप, उनका चरणोदक और नैवेद्य ग्रहण करना—यह नित्यका परम कर्तव्य है। साध्वि! इसे सभी चाहते हैं और सर्वसम्मतिसे यही सिद्ध भी है।

वत्से! अब तुम प्रकृतिसे पर तथा प्राकृत गुणोंसे रहित परब्रह्म श्रीकृष्णकी निरन्तर उपासना करो। मैं तुम्हारे पतिदेवको लौटा देता हूँ। इन्हें लो और सुखपूर्वक अपने घरको जाओ। मनुष्योंका यह मङ्गलमय कर्म-विपाक मैंने तुमको सुना दिया। यह प्रसङ्ग सर्वेप्सित, सर्वसम्मत तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करनेवाला है।

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! धर्मराजके मुखसे उपर्युक्त वर्णन सुनकर सावित्रीकी आँखोंमें आनन्दके आँसू छलक पड़े। उसका शरीर पुलकायमान हो गया। उसने पुनः धर्मराजसे कहा।

सावित्री बोली—धर्मराज! वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! मैं किस विधिसे प्रकृतिसे भी पर भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना करूँ, यह बताइये। भगवन्! मैं आपके द्वारा मनुष्योंके मनोहर शुभकर्मका विपाक सुन चुकी। अब आप मुझे अशुभकर्म-विपाककी व्याख्या सुनानेकी कृपा करें।

ब्रह्मन्! सती सावित्री इस प्रकार कहकर फिर भक्तिसे अत्यन्त नम्र हो वेदोक्त स्तुतिका पाठ करके धर्मराजकी स्तुति करने लगी।

सावित्रीने कहा—प्राचीनकालकी बात है, महाभाग सूर्यने पुष्करमें तपस्याके द्वारा धर्मकी आराधना की। तब धर्मके अंशभूत जिन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त किया, उन भगवान् धर्मराजको मैं प्रणाम करती हूँ। जो सबके साक्षी हैं, जिनकी सम्पूर्ण भूतोंमें समता है, अतएव जिनका नाम शमन है, उन भगवान् शमनको मैं प्रणाम करती हूँ। जो कर्मानुरूप कालके सहयोगसे विश्वके सम्पूर्ण