भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

प्राणियोंका अन्त करते हैं, उन भगवान् कृतान्तको मैं प्रणाम करती हूँ। जो पापीजनोंको शुद्ध करनेके निमित्त दण्डनीयके लिये ही हाथमें दण्ड धारण करते हैं तथा जो समस्त कर्मोंके उपदेशक हैं, उन भगवान् दण्डधरको मेरा प्रणाम है। जो विश्वके सम्पूर्ण प्राणियोंका तथा उनकी समूची आयुका निरन्तर परिगणन करते रहते हैं, जिनकी गतिको रोक देना अत्यन्त कठिन है, उन भगवान् कालको मैं प्रणाम करती हूँ। जो तपस्वी, वैष्णव, धर्मात्मा, संयमी, जितेन्द्रिय और जीवोंके लिये कर्मफल देनेको उद्यत हैं, उन भगवान् यमको मैं प्रणाम करती हूँ। जो अपनी आत्मामें रमण करनेवाले, सर्वज्ञ, पुण्यात्मा पुरुषोंके मित्र तथा पापियोंके लिये कष्टप्रद हैं, उन 'पुण्यमित्र' नामसे प्रसिद्ध भगवान् धर्मराजको मैं प्रणाम करती हूँ। जिनका जन्म ब्रह्माजीके वंशमें हुआ है तथा जो ब्रह्मतेजसे सदा प्रज्वलित रहते हैं एवं जिनके द्वारा परब्रह्मका सतत ध्यान होता रहता है, उन ब्रह्मवंशी भगवान् धर्मराजको मेरा प्रणाम है।*

मुने! इस प्रकार प्रार्थना करके सावित्रीने धर्मराजको प्रणाम किया। तब धर्मराजने सावित्रीको विष्णु-भजन तथा कर्मके विपाकका प्रसङ्ग सुनाया। जो मनुष्य प्रातः उठकर निरन्तर इस 'यमाष्टक' का पाठ करता है, उसे यमराजसे भय नहीं होता और उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। यदि महान् पापी व्यक्ति भी भक्तिसे सम्पन्न होकर निरन्तर इसका पाठ करता है तो यमराज अपने कायव्यूहसे निश्चित ही उसकी शुद्धि कर देते हैं। (अध्याय २७-२८)


नरक-कुण्डों और उनमें जानेवाले पापियों तथा पापोंका वर्णन

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! रविनन्दन धर्मराजने सावित्रीको विधिपूर्वक विष्णुका महामन्त्र देकर 'अशुभकर्मका विपाक' कहना आरम्भ किया।

धर्मराजने कहा—पतिव्रते! मानव शुभकर्मके विपाकसे नरकमें नहीं जा सकता। नरकमें जानेमें कारण है—अशुभकर्मका विपाक। अतएव अब मैं अशुभकर्मका विपाक बतलाता हूँ, सुनो। नाना प्रकारके स्वर्ग हैं। प्राणी अपने-अपने कर्मोंके प्रभावसे उन स्वर्गोंमें जाते हैं। नरकोंमें जाना कोई मनुष्य नहीं चाहते, परंतु अशुभकर्म-विपाक उन्हें नरकमें जानेके लिये विवश कर देते हैं। नरकोंके नाना प्रकारके कुण्ड हैं। विभिन्न पुराणोंके भेदसे इनके नामोंके भी भेद हो गये हैं। ये सभी कुण्ड बड़े ही विस्तृत हैं। पापियोंको दुःखका भोग कराना ही इन कुण्डोंका प्रयोजन है। वत्से! ये भयंकर कुण्ड अत्यन्त भयावह तथा कुत्सित हैं। इनमें छियासी कुण्ड तो प्रसिद्ध हैं,


* तपसा धर्ममाराध्य पुष्करे भास्करः पुरा। धर्मांशं यं सुतं प्राप धर्मराजं नमाम्यहम्॥
समता सर्वभूतेषु यस्य सर्वस्य साक्षिणः। अतो यन्नाम शमन इति तं प्रणमाम्यहम्॥
येनान्तश्च कृतो विश्वे सर्वेषां जीविनां परम्। कर्मानुरूपकालेन तं कृतान्तं नमाम्यहम्॥
बिभर्ति दण्डं दण्डाय पापिनां शुद्धिहेतवे। नमामि तं दण्डधरं यः शास्ता सर्वकर्मणाम्॥
विश्वं यः कलयत्येव सर्वायुश्चापि सन्ततम्। अतीव दुर्निवार्यं च तं कालं प्रणमाम्यहम्॥
तपस्वी वैष्णवो धर्मी संयमी संजितेन्द्रियः। जीविनां कर्मफलदं तं यमं प्रणमाम्यहम्॥
स्वात्मारामश्च सर्वज्ञो मित्रं पुण्यकृतां भवेत्। पापिनां क्लेशदो यश्च पुण्यमित्रं नमाम्यहम्॥
यज्जन्म ब्रह्मणो वंशे ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा। यो ध्यायति परं ब्रह्म ब्रह्मवंशं नमाम्यहम्॥
(प्रकृतिखण्ड २८। ८—१५)

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