भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

प्रकृतिखण्ड २०७

जो संयमनीपुरीमें स्थित हैं। इनके अतिरिक्त कुछ अप्रसिद्ध भी हैं। साध्वि! उन प्रसिद्ध कुण्डोंके नाम बतलाता हूँ, सुनो। वह्निकुण्ड, तप्तकुण्ड, भयानक क्षारकुण्ड, विट्कुण्ड, मूत्रकुण्ड, दुःसह श्लेष्मकुण्ड, गरकुण्ड, दूषिकाकुण्ड, वसाकुण्ड, शुक्रकुण्ड, असृक्कुण्ड, कुत्सित अश्रुकुण्ड, गात्रमलकुण्ड, कर्णविट्कुण्ड, मज्जाकुण्ड, मांसकुण्ड, दुस्तर नखकुण्ड, लोमकुण्ड, केशकुण्ड, दुःखद अस्थिकुण्ड, ताम्रकुण्ड, महान् क्लेशदायक प्रतप्तलौहकुण्ड, तीक्ष्ण कण्टककुण्ड, विघ्नप्रद विषकुण्ड, घर्मकुण्ड, तप्तसुराकुण्ड, प्रतप्ततैलकुण्ड, दुर्वहदन्तकुण्ड, कृमिकुण्ड, पूयकुण्ड, दुरन्त सर्पकुण्ड, मशकुण्ड, दंशकुण्ड, भयंकर गरलकुण्ड, वज्रदंष्ट्रकुण्ड, वृश्चिककुण्ड, शरकुण्ड, शूलकुण्ड, भयंकर खड्गकुण्ड, गोलकुण्ड, नक्रकुण्ड, शोकास्पद काककुण्ड, सञ्चालकुण्ड, बाजकुण्ड, दुस्तर वन्धकुण्ड, तप्तपाषाणकुण्ड, तीक्ष्ण पाषाणकुण्ड, लालाकुण्ड, मसीकुण्ड, सुदारुण चूर्णकुण्ड, चक्रकुण्ड, वज्रकुण्ड, अत्यन्त दुःसह कूर्मकुण्ड, ज्वालाकुण्ड, भस्मकुण्ड, पूतिकुण्ड, तप्तसूर्मिकुण्ड, असिपत्रकुण्ड, क्षुरधारकुण्ड, सूचीमुखकुण्ड, गोधामुखकुण्ड, नक्रमुखकुण्ड, गजदंशकुण्ड, गोमुखकुण्ड तथा कुम्भीपाक, कालसूत्र, अवटोद, अरुन्तुद, पांशुभोज, पाशवेष्ट, शूलप्रोत, प्रकम्पन, उल्कामुख, अन्धकूप, वेधन, दण्डताडन, जालबन्ध, देहचूर्ण, दलन, शोषणकरं, सर्पमुख, ज्वालामुख, जिम्भ, धूमान्ध तथा नागवेष्टनकुण्ड हैं। सावित्री! ये सभी कुण्ड पापियोंको क्लेश देनेके लिये निर्मित हैं। दस लाख किंकरगण सदा इनकी देख-रेखमें नियुक्त रहते हैं। उन किंकरोंके हाथोंमें दण्ड, शूल और पाश रहते हैं। वे भयंकर एवं मदाभिमानी किंकर हाथोंमें भयावह गदा और शक्ति लिये रहते हैं। उनमें दयाका नामतक नहीं रहता। उन्हें कोई किसी प्रकार भी रोक नहीं सकता। उन तेजस्वी एवं निर्भीक अनुचरोंकी ताँबेके सदृश रक्तवर्णकी आँखें कुछ-कुछ पीले रंगकी हैं। योगसिद्धिसे सम्पन्न होनेके कारण वे नाना प्रकारके रूप धारण कर लिया करते हैं। मृत्युकाल उपस्थित होनेपर समस्त पापी जीवोंको वे स्वयं दिखायी पड़ते हैं। शिव, देवी, सूर्य और गणपतिके उपासक तथा अपने कर्मोंमें निरत रहनेवाले सिद्ध एवं योगी पुरुषोंको अपने पुण्य-प्रभावसे उनके सम्मुख नहीं जाना पड़ता। जो अपने धर्ममें सदा निरत रहते हैं, जिनका हृदय विशाल है तथा जो पूर्ण स्वतन्त्र हैं, जिन्हें स्वप्नमें भी कहीं भी इष्टदेवका दर्शन प्राप्त हो सका है, ऐसे वैष्णव पुरुषोंको वे बलवान् एवं निश्शङ्क यम-किंकर कभी दिखायी नहीं देते।

साध्वि! इन कुण्डोंकी संख्याका निरूपण तो कर चुका, अब किन पापियोंको किन कुण्डोंमें जाना पड़ता है, उन्हें बताता हूँ, सुनो।

साध्वि! भगवान् श्रीहरिकी सेवामें संलग्न रहनेवाले पुण्यात्मा, योगी, सिद्ध, व्रती, तपस्वी और ब्रह्मचारी पुरुष नरकमें नहीं जाते, यह ध्रुव सत्य है। जो शक्तिशाली मनुष्य बलके अभिमानमें आकर खलताके कारण अपने कटुवचनोंके द्वारा बान्धवोंको दग्ध करता है, वह अग्निकुण्ड नामक नरकमें जाता है। उसके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने वर्षोंतक उसे उस नरकमें वास करना पड़ता है। फिर वह तीन बार पशु-योनिमें जन्म पाता है। जो मूर्ख मानव घरपर आये हुए भूखे और प्यासे दुःखी ब्राह्मणको भोजन नहीं देता, वह तप्तकुण्ड नामक नरकमें जाता है। अपने रोमके बराबर वर्षोंतक उस दुःखप्रद नरकमें वास करनेके पश्चात् सात जन्मोंतक वह पक्षी होता है। जो मनुष्य रविवार, सूर्यसंक्रान्ति, अमावास्या और श्राद्धके दिन वस्त्रोंको क्षार पदार्थसे धोता है, उसे सूतके बराबर वर्षोंतक क्षारकुण्डमें रहना पड़ता है। फिर सात जन्मोंतक वह धोबी होता है। जो अपने अथवा दूसरेके द्वारा दी हुई ब्राह्मण और देवताओंकी वृत्तिको छीन लेता है, वह साठ