भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

हजार वर्षोंके लिये विट्कुण्ड नामक नरकमें जाता है। पुनः पृथ्वीपर आकर उतने ही वर्षोंतक वह विष्ठाके कीड़ेकी योनिमें रहता है। जो दूसरोंके तड़ागमें बिना उसकी आज्ञा लिये तड़ाग निर्माण कराता है (तड़ाग बनवानेका झूठा यश लेता है) तथा भाग्यदोषसे उसका विधिवत् उत्सर्ग करता है, ऐसा व्यक्ति उस दोषके कारण मूत्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है। उसे वहाँ वे ही मूत्रादि अपवित्र वस्तुएँ भोजनके लिये मिलती हैं। फिर सात जन्मोंतक भारतवर्षमें वह गोधा होकर रहता है। मधुर पदार्थको अकेले ही खा जानेवाला व्यक्ति श्लेष्मकुण्ड नामक नरकमें जाता है। तत्पश्चात् वह प्रेत बनता है। जो पिता-माता, गुरु, स्त्री, पुत्र-पुत्री अथवा अनाथका भरण-पोषण नहीं करता, वह गरल (विष)-कुण्ड नामक नरकमें जाता है और पूरे एक हजार वर्षोंतक उसे खानेके लिये विष ही मिलता है। तत्पश्चात् वह भूतयोनिमें जाता है। जो मनुष्य अतिथिको क्रोधभरे नेत्रोंसे देखता है, उस पापीके दिये हुए जलको पितर और देवता ग्रहण नहीं करते। उसको यहीं ब्रह्महत्या-जैसे घोर पापोंका फल मिल जाता है। अन्तमें इनके फलस्वरूप प्राणी दूषिकाकुण्ड नामक नरकमें जाता है। वहाँ पूरे सौ वर्षोंतक दूषित पदार्थ भोजन करके रहना पड़ता है। फिर भूतकी योनिमें रहनेके पश्चात् वह पवित्र होता है। यदि ब्राह्मणको दी हुई वस्तु फिर दूसरेको दे दी जाय तो उस दूषित कर्मके प्रभावसे दाताको सौ वर्षोंके लिये वसाकुण्ड नामक नरकमें जाना पड़ता है। तदनन्तर सात जन्मोंतक उसे भारतमें गिरगिट होना पड़ता है। जो स्त्री पर-पुरुषसे अथवा पुरुष परायी स्त्रीसे अवैध सम्बन्ध करता है या उसे शुक्रपान कराता है, वह शुक्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है और सौ वर्षोंतक वही खाता है। तत्पश्चात् सौ वर्षोंतक कीटयोनिमें रहकर वह शुद्ध होता है।

जो गुरु अथवा ब्राह्मणको मारकर उनके शरीरसे रक्त बहा देता है, उसे असृक्कुण्ड नामक नरककी प्राप्ति होती है। उसमें रहकर वह रक्तपान करता है। तदनन्तर सात जन्मोंतक वह व्याघ्र होता है। फिर क्रमशः मानवयोनिमें जन्म पाता है। जो श्रीकृष्ण-गुणगानके अवसरपर भक्तको आँसू बहाते तथा गद्गदवाणीसे हरिगुण गाते देखकर अनुचित रूपसे उसका उपहास करता है, वह मानव सौ वर्षोंतक अश्रुकुण्ड नामक नरकमें वास करता है। भोजनके लिये उसे अश्रु ही मिलते हैं। तत्पश्चात् तीन जन्मोंतक चाण्डालकी योनिमें उसका जन्म होता है, तब वह शुद्ध होता है। जो मनुष्य सुहृद्के साथ निरन्तर शठताका व्यवहार करता है, वह गात्रमलकुण्ड नामक नरकमें जाता है। इसके बाद उसे तीन जन्मोंतक गदहेकी तथा तीन जन्मोंतक शृगालकी योनि प्राप्त होती है। तत्पश्चात् वह शुद्ध होता है। जो बहरेको देखकर हँसता और अभिमानवश उसकी निन्दा करता है, उसका कर्णविट् नामक नरककुण्डमें वास होता है और वहाँ उसे कानोंकी मैल भोजनके लिये मिलती है। फिर परम दरिद्र होकर जन्म लेता है और उसके कानोंमें सुननेकी शक्ति नहीं रहती। जो मनुष्य लोभवश अपने भरण-पोषणके लिये प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह बहुत दीर्घकालतक मज्जाकुण्ड नामक नरकमें स्थान पाता है। वहाँ मज्जा ही उसे भोजनके लिये मिलती है। इसके बाद वह खरगोशकी योनिमें जन्म पाता है; फिर सात जन्मोंतक मछलीका शरीर पाता है। फिर कर्मोंके प्रभावसे उसे मृग आदि योनियाँ प्राप्त होती हैं। तदनन्तर वह शुद्ध होता है। जो अपनी कन्याको पाल-पोषकर उसे बेचता है, वह अर्थलोभी महान् मूर्ख मानव मांसकुण्ड नामक नरकमें जाता है। कन्याका मांस ही उसे भोजनके लिये मिलता है। मेरे अनुचर उसे डंडोंसे पीटते हैं। मांसका भार मस्तकपर उठाकर वह ढोता है और भूख लगनेपर