ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २०९
उससे छूते हुए रक्तकी धारा चाटता है। तदनन्तर वह पापी भारतमें जन्म पाकर कन्याकी विष्ठाका कीड़ा होता है। फिर सात जन्मोंतक वधिक होता है। उसके बाद उसे तीन जन्म तक सूअर और सात जन्मोंतक कुत्तेकी योनि मिलती है। फिर सात-सात जन्मोंतक मेंढक, जोंक और कौएकी योनि प्राप्त होती है। तत्पश्चात् वह शुद्ध हो जाता है।
जो मनुष्य व्रतों, श्राद्धों और उपवासके लिये संयमके दिन क्षौरकर्म कराता है, वह सम्पूर्ण कर्मोंके लिये अपवित्र माना जाता है। साध्वि! ऐसा करनेवाला व्यक्ति नखकुण्डमें स्थान पाता है। जो भारतमें केशयुक्त पार्थिव लिङ्गकी पूजा करता है, वह दीर्घकालतक केशकुण्डमें वास करता है। उसके बाद महादेवजीके कोपसे वह यवन होता है। फिर सौ वर्षके बाद उसकी शुद्धि होती है। जो मानव विष्णुपद नामक तीर्थमें पितरोंको पिण्ड नहीं देता है, वह अस्थिकुण्ड नामक नरकमें वास पाता है। फिर सात जन्मोंतक मानव-शरीर पाकर वह लँगड़ा और अत्यन्त दरिद्र होता है। इस तरह दण्ड भोगनेके बाद उसकी शुद्धि होती है। जो महामूर्ख मानव अपनी गर्भवती स्त्रीका सेवन (उसके साथ समागम) करता है, वह तप्त ताम्रकुण्ड नामक नरकमें वास पाता है। अवीरा तथा सद्यःऋतुस्नाताका अन्न खानेवाला मनुष्य सौ वर्षोंतक तप्त लौहकुण्ड नामक नरकमें रहता है। इसके बाद उसे रजककी योनि और चर्मकारकी योनि प्राप्त होती है। जो चाम छूकर बिना हाथ धोये देवद्रव्यका स्पर्श करता है, वह घर्मकुण्ड नामक नरकमें वास करता है। जो बिना निमन्त्रण मिले शूद्रके घर जाकर उसका अन्न खाता है, वह ब्राह्मण तप्तसुराकुण्डमें स्थान पाता है। जो कठोर वचन कहकर सदा स्वामीको कष्ट पहुँचाता है, वह तीक्ष्णकण्टक नामक नरककुण्डमें कण्टकभोजी बनकर वास करता है। मेरे दूत उसे डंडेसे कष्ट पहुँचाते हैं। जो निर्दयी व्यक्ति प्राणीको विष देकर मार डालता है, वह हजार वर्षोंतक विषभोजी होकर विषकुण्डमें रहता है। फिर सात जन्मोंतक नरघाती अर्थात् जल्लाद होता है। सात जन्मोंतक कोढ़ी होता है। उसके प्रत्येक अङ्गमें फोड़े-फुंसियाँ कष्ट देती हैं। तत्पश्चात् उसकी शुद्धि होती है। जो पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें जन्म पाकर बैल जोतनेवाला व्यक्ति डंडेसे बैलको स्वयं मारता है अथवा भृत्यद्वारा मरवाता है, वह प्रतप्त तप्ततैल नामक नरककुण्डमें रहता है। उस बैलके जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक उसे बैल होकर कष्ट भोगना पड़ता है। साध्वि! जो निर्दयी व्यक्ति डंडेसे, लोहेसे अथवा बंसीसे प्राणीकी हिंसा करता है, वह युगोंतक दन्तकुण्ड नामक नरकमें स्थान पाता है। इसके बाद मानव-योनिमें जन्म पाकर उदररोगसे दुःखी होता है। जो ब्राह्मण मांस-मछली खाता तथा श्रीहरिके नैवेद्यकी वस्तु (उन्हें अर्पण किये बिना ही) चट कर जाता है, वह कृमिकुण्ड नामक नरकमें जाता है। उसे आहारके रूपमें मांस उपलब्ध होता है। तत्पश्चात् तीन जन्मोंतक उसे म्लेच्छकी योनि मिलती है। जो छोटे-बड़े अथवा क्रूर सर्पको मारता है, वह मानव सर्पकुण्ड नामक नरकका अधिकारी होता है, उसे वहाँ सर्प काटते हैं। सर्पका विट् उसे खाना पड़ता है। तत्पश्चात् वह सर्पकी योनि पाता है। इसके बाद थोड़ी आयुवाला मानव होता है। उसके शरीरमें दाद आदि चर्मरोग होते हैं। फिर वह साँपके काटनेपर बड़े क्लेशसे मृत्युको प्राप्त होता है।
ब्रह्माके विधानमें रक्तपान जिनकी जीविका ही निश्चित है, उन मच्छर आदि क्षुद्र जन्तुओंको जो मारते हैं, वे मृत जीवोंके मशकुण्ड और दंशकुण्ड नामक नरकोंमें निवास करते हैं। दिन-रात वे जन्तु उन्हें काटते रहते हैं। उन्हें खानेको कुछ मिलता नहीं। तदुपरान्त उस क्षुद्र जन्तुकी योनिमें उनका जन्म होता है। फिर वे