भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 810 में से

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पृष्ठ 220
२१०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अङ्गहीन मानव होते हैं। जो दण्ड न देने योग्य व्यक्तिको अथवा ब्राह्मणको दण्ड देता है, वह वज्रदंष्ट्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है। उसमें कीड़े-ही-कीड़े रहते हैं। उसे कीड़े खाते हैं और वह हाहाकार मचाया करता है। जो मूढ़ भूपाल धनके लोभसे प्रजाको सताता है, वह वृश्चिककुण्ड नामक नरकमें स्थान पाता है। पुनः सात जन्मोंतक बिच्छू होता है। तत्पश्चात् मनुष्यकी योनिमें उसकी उत्पत्ति होती है। वह अङ्गहीन और रोगी होकर जीवन व्यतीत करता है। जो ब्राह्मण होकर जीवोंके वधके लिये हथियार उठाता है, वह दूसरोंका धावन बनकर इधर-उधर जाता है। जो कभी संध्या नहीं करता तथा भगवान् श्रीहरिकी भक्तिसे विमुख रहता है, वह शर आदिके कुण्डमें जाता है। बाण आदिसे उसके अङ्ग निरन्तर छिदते रहते हैं। मदके अभिमानमें चूर रहनेवाला जो राजा थोड़े-से अपराधके कारण अन्धकारपूर्ण कारागारमें प्रजाओंको मारता है, उसे अपने दोषके फलस्वरूप गोलकुण्ड नामक नरकमें जाना पड़ता है। वह नरक बड़ा ही भयंकर है। उसमें खौलता हुआ जल भरा रहता है। अन्धकार छाया रहता है। तीखे दाँतवाले कीड़े सर्वत्र फैले रहते हैं। ऐसे दारुण नरकमें वह पड़ा रहता है। तत्पश्चात् मनुष्य होकर उन प्रजाओंका भृत्य बनता है। सरोवरसे निकले हुए नक्र आदि जलचर जीवोंको जो मारता है, वह नक्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है। जो मनुष्य पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें आकर कामभावसे परस्त्रीके वक्षःस्थल, श्रोणी, स्तन एवं मुख देखता है, वह काकतुण्ड नामक नरकमें वास करता है। जो मूढ़ मानव भारतवर्षमें जन्म पाकर ताँबा और लोहा चुराता है, वह बाजकुण्ड नामक नरकमें स्थान पाता है। मेरे दूत बाणोंसे उसकी आँख फोड़ देते और उसे डंडोंसे पीटते हैं। इसके बाद वह तीन जन्मोंमें नेत्रहीन तथा सात जन्मोंमें दरिद्री होता है।

भारतवर्षमें जन्म पाकर देवताओंकी प्रतिमा तथा देवसम्बन्धी द्रव्यकी चोरी करनेवाला मानव दुस्तर वन्थकुण्ड नामक नरकमें निश्चितरूपसे वास करता है। तीखे वज्रोंसे उसका शरीर दग्ध-सा होता रहता है। देवता और ब्राह्मणके रजत, गव्य (दूध-दही आदि) पदार्थ तथा वस्त्रकी चोरी करनेवाला व्यक्ति तप्तपाषाणकुण्डनामक नरकमें स्थान पाता है—यह निश्चित है। फिर तीन जन्मोंतक बगुला, तीन जन्मोंतक श्वेत हंस, एक जन्ममें सफेद चील, फिर अन्यान्य श्वेत पक्षी, इसके बाद अल्पायु मानव होता है। रक्त-विकार और शूलरोगसे उसे असह्य पीड़ा सहनी पड़ती है। जो ब्राह्मण और देवताके पीतल तथा काँसेके पात्रका अपहरण करता है, वह तीक्ष्ण पाषाणकुण्डमें अपनी रोमकी संख्याके बराबर वर्षोंतक निश्चय ही निवास करता है। जो पुंश्चलीका अन्न खाता तथा उसकी कमाईसे जीविका चलाता है, वह लालाकुण्ड नामक नरकमें वास करता है। जिसमें लार-ही-लार भरी रहती है, वहाँका दुःख भोगनेके पश्चात् मानव बनकर नेत्ररोग और शूलरोगसे कष्ट पाता है।

साध्वि! जो ब्राह्मण तथा देवताओंके धान्य आदिसे सम्पन्न खेती, ताम्बूल, आसन एवं शय्याका अपहरण करता है, वह पापी मानव चूर्णकुण्ड नामक नरकमें जाता है। जो मनुष्य ब्राह्मणका धन चुराकर उससे चक्र (पहिया अथवा तेल पेरनेका कोल्हू) बनवाता है, वह चक्रकुण्ड नामक नरकमें वास करता है। उसे वहाँ सैकड़ों वर्षोंतक डंडोंकी मार सहनी पड़ती है। फिर तीन जन्मोंतक वह तेली, रोगी और निःसंतान होता है। भाई-बन्धुओं और ब्राह्मणोंके प्रति क्रूर दृष्टि रखनेवाला मानव दीर्घकालतक वक्रकुण्ड नामक नरकमें रहता है। तत्पश्चात् सात जन्मोंतक टेढ़े शरीरवाला तथा अङ्गहीन बनता है। दरिद्रता उसे घेरे रहती है। देवता और ब्राह्मणोंके घृत तथा तेलका अपहरण करनेवाला पातकी ज्वालाकुण्ड

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