भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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प्रकृतिखण्ड २१९

तथा भस्मकुण्ड नामक नरकका अधिकारी होता है। जो मानव देवता-ब्राह्मणके सुगन्धित तैल, आँवला तथा अन्य भी किसी उत्तम गन्धवाले द्रव्यका अपहरण करता है, वह पूतिकुण्डसंज्ञक नरकमें रहकर रात-दिन दुर्गन्धका अनुभव करता है। साध्वि! जो बलवान् व्यक्ति किसी दूसरेकी पैतृक भूमिको छल-बलसे अथवा उसे मारकर छीन लेता है, उसे तप्तसूर्मि नामक नरकमें स्थान मिलता है। जैसे खौलते हुए तेलमें कोई जीव जलता है, उसी तरह वह दग्ध होता हुआ निरन्तर उसके भीतर चक्कर लगाता रहता है, तथापि जलकर भस्म नहीं हो जाता; क्योंकि प्राणीका भोगदेह (यातना-शरीर) नष्ट नहीं होता। इसके बाद वह विष्ठाका कीड़ा होता है। फिर भूमिहीन एवं दरिद्र मानव होता है।

साध्वि! जो अत्यन्त दारुण एवं निर्दयी व्यक्ति तलवारसे जीवोंको काटता तथा धनके लोभसे नरघाती बनकर मानवकी हत्या करता है, वह असिपत्र नामक नरकमें स्थान पाता है। मेरे दूत तलवारसे निरन्तर उसके अङ्ग काटते हैं। जब वह भोजनके अभावमें चिल्लाता है, तब दूत उसे मारते हैं। फिर सौ-सौ जन्मोंतक भारतमें चाण्डाल, शूकर और कूकर होता है। इसके बाद सात-सात जन्मोंतक शृगाल और व्याघ्र होता है, तीन जन्मोंतक भेड़िया, सात जन्मोंतक गेंडा और तीन जन्मोंतक भैंसा होता है। पतिव्रते ! ग्रामों और नगरोंमें आग लगानेवाला पापी मानव क्षुरधारकुण्ड नामक नरकमें निवास करता है। तीन युगोंतक उसमें रहता है और यमदूत उसके अङ्गको काटते रहते हैं। फिर उसे प्रेतकी योनि मिल जाती है और मुँहसे आग उगलता हुआ वह जगत्में भ्रमण करता है। फिर सात-सात जन्मोंतक अमेध्य-भोजी, खद्योत, महान् शूलरोगी एवं गलितकुष्ठी मानव होता है। जो दूसरेके कानमें मुँह लगाकर परायी निन्दा करता है, दूसरेके दोष जाननेमें जिसकी विशेष स्पृहा रहती है तथा जो देवता एवं ब्राह्मणकी निन्दा किया करता है, वह तीन युगोंतक सूचीमुख नामक नरकमें स्थान पाता है। सूचीमें उसके सभी अङ्ग छिद जाते हैं। फिर बिच्छू, सर्प, वज्रकीट तथा आग फैलानेवाले कीड़ोंकी योनियोंमें सात-सात जन्मोंतक भटकता है। जो गृहस्थोंके घरमें सेंध लगाकर घुस जाता और भीतर पड़ी हुई वस्तुएँ चुरा लेता है तथा गाय, बकरे और भेड़ोंकी भी चोरी करता है, वह गोधामुख नामक नरकमें जाता है। मेरे दूतोंकी मार खाते हुए तीन युगोंतक उसे वहाँ रहना पड़ता है। साधारण वस्तु चुरानेवाला व्यक्ति नक्रमुख-संज्ञक नरकमें जाता है। मेरे दूतोंकी मार सहते हुए वह वहाँ रहता है। फिर उसकी शुद्धि हो जाती है। जो हाथियों, घोड़ों एवं गौओंको मारता है तथा वृक्षोंको काटता है, वह महान् पातकी व्यक्ति गजदंश नामक नरकमें दीर्घकालतक रहता है। मेरे दूत हाथीके दाँत लेकर उन्हींसे उसको निरन्तर पीटते हैं। फिर तीन-तीन जन्मोंतक वह हाथी, घोड़े, गौ एवं म्लेच्छ जातिकी योनिमें उत्पन्न होता है। प्यासी गौके जल पीते समय जो उसे दूर हटा देता है, वह पुरुष गोमुखकुण्ड नामक नरकमें पड़ता है। वहाँ सब ओर कीड़े और खौलता हुआ जल भरा रहता है। वह उसीमें जलता हुआ वास करता है। इसके बाद दीर्घरोगी एवं दरिद्र मानव होता है।

जो गौ, ब्राह्मण, स्त्री, भिक्षुक तथा गर्भकी प्रत्यक्ष अथवा आतिदेशिकी हत्या करता है एवं अगम्या स्त्रीके साथ गमन करता है, वह महान् नीच व्यक्ति कुम्भीपाककुण्ड नरकमें निवास करता है। मेरे दूत निरन्तर मारते हुए उसे चूर्ण-चूर्ण कर देते हैं। प्रज्वलित अग्नि, कण्टक और खौलते हुए तेलमें एवं गरम लोहे तथा आगसे संतप्त ताँबेपर वह क्षण-क्षणमें गिरता रहता है। फिर गीध, सूअर तथा कौवा और सर्प होता है।

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