ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
प्रकृतिखण्ड २१९
तथा भस्मकुण्ड नामक नरकका अधिकारी होता है। जो मानव देवता-ब्राह्मणके सुगन्धित तैल, आँवला तथा अन्य भी किसी उत्तम गन्धवाले द्रव्यका अपहरण करता है, वह पूतिकुण्डसंज्ञक नरकमें रहकर रात-दिन दुर्गन्धका अनुभव करता है। साध्वि! जो बलवान् व्यक्ति किसी दूसरेकी पैतृक भूमिको छल-बलसे अथवा उसे मारकर छीन लेता है, उसे तप्तसूर्मि नामक नरकमें स्थान मिलता है। जैसे खौलते हुए तेलमें कोई जीव जलता है, उसी तरह वह दग्ध होता हुआ निरन्तर उसके भीतर चक्कर लगाता रहता है, तथापि जलकर भस्म नहीं हो जाता; क्योंकि प्राणीका भोगदेह (यातना-शरीर) नष्ट नहीं होता। इसके बाद वह विष्ठाका कीड़ा होता है। फिर भूमिहीन एवं दरिद्र मानव होता है।
साध्वि! जो अत्यन्त दारुण एवं निर्दयी व्यक्ति तलवारसे जीवोंको काटता तथा धनके लोभसे नरघाती बनकर मानवकी हत्या करता है, वह असिपत्र नामक नरकमें स्थान पाता है। मेरे दूत तलवारसे निरन्तर उसके अङ्ग काटते हैं। जब वह भोजनके अभावमें चिल्लाता है, तब दूत उसे मारते हैं। फिर सौ-सौ जन्मोंतक भारतमें चाण्डाल, शूकर और कूकर होता है। इसके बाद सात-सात जन्मोंतक शृगाल और व्याघ्र होता है, तीन जन्मोंतक भेड़िया, सात जन्मोंतक गेंडा और तीन जन्मोंतक भैंसा होता है। पतिव्रते ! ग्रामों और नगरोंमें आग लगानेवाला पापी मानव क्षुरधारकुण्ड नामक नरकमें निवास करता है। तीन युगोंतक उसमें रहता है और यमदूत उसके अङ्गको काटते रहते हैं। फिर उसे प्रेतकी योनि मिल जाती है और मुँहसे आग उगलता हुआ वह जगत्में भ्रमण करता है। फिर सात-सात जन्मोंतक अमेध्य-भोजी, खद्योत, महान् शूलरोगी एवं गलितकुष्ठी मानव होता है। जो दूसरेके कानमें मुँह लगाकर परायी निन्दा करता है, दूसरेके दोष जाननेमें जिसकी विशेष स्पृहा रहती है तथा जो देवता एवं ब्राह्मणकी निन्दा किया करता है, वह तीन युगोंतक सूचीमुख नामक नरकमें स्थान पाता है। सूचीमें उसके सभी अङ्ग छिद जाते हैं। फिर बिच्छू, सर्प, वज्रकीट तथा आग फैलानेवाले कीड़ोंकी योनियोंमें सात-सात जन्मोंतक भटकता है। जो गृहस्थोंके घरमें सेंध लगाकर घुस जाता और भीतर पड़ी हुई वस्तुएँ चुरा लेता है तथा गाय, बकरे और भेड़ोंकी भी चोरी करता है, वह गोधामुख नामक नरकमें जाता है। मेरे दूतोंकी मार खाते हुए तीन युगोंतक उसे वहाँ रहना पड़ता है। साधारण वस्तु चुरानेवाला व्यक्ति नक्रमुख-संज्ञक नरकमें जाता है। मेरे दूतोंकी मार सहते हुए वह वहाँ रहता है। फिर उसकी शुद्धि हो जाती है। जो हाथियों, घोड़ों एवं गौओंको मारता है तथा वृक्षोंको काटता है, वह महान् पातकी व्यक्ति गजदंश नामक नरकमें दीर्घकालतक रहता है। मेरे दूत हाथीके दाँत लेकर उन्हींसे उसको निरन्तर पीटते हैं। फिर तीन-तीन जन्मोंतक वह हाथी, घोड़े, गौ एवं म्लेच्छ जातिकी योनिमें उत्पन्न होता है। प्यासी गौके जल पीते समय जो उसे दूर हटा देता है, वह पुरुष गोमुखकुण्ड नामक नरकमें पड़ता है। वहाँ सब ओर कीड़े और खौलता हुआ जल भरा रहता है। वह उसीमें जलता हुआ वास करता है। इसके बाद दीर्घरोगी एवं दरिद्र मानव होता है।
जो गौ, ब्राह्मण, स्त्री, भिक्षुक तथा गर्भकी प्रत्यक्ष अथवा आतिदेशिकी हत्या करता है एवं अगम्या स्त्रीके साथ गमन करता है, वह महान् नीच व्यक्ति कुम्भीपाककुण्ड नरकमें निवास करता है। मेरे दूत निरन्तर मारते हुए उसे चूर्ण-चूर्ण कर देते हैं। प्रज्वलित अग्नि, कण्टक और खौलते हुए तेलमें एवं गरम लोहे तथा आगसे संतप्त ताँबेपर वह क्षण-क्षणमें गिरता रहता है। फिर गीध, सूअर तथा कौवा और सर्प होता है।
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तदनन्तर वह विष्ठाका कीड़ा होता है। फिर बैल होनेके पश्चात् कोढ़ी मनुष्य होता है। दरिद्रता उसका साथ कभी नहीं छोड़ती।
साध्वि! जो भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी प्रतिमामें, अन्य देवताओं तथा उनके विग्रहोंमें, शिव तथा शिवलिङ्गमें, सूर्य तथा सूर्यकान्तमणिमें, गणेश और उनकी प्रतिमामें—सर्वत्र भेदबुद्धि करता है, उसे आतिदेशिकी ब्रह्महत्या लगती है। अर्थात् शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार उसे ब्रह्महत्या लगती है। जो अपने गुरु, इष्टदेव और जन्मदात्री मातामें भेदबुद्धि करता है, उसे ब्रह्महत्या लगती है। जो विष्णुभक्तों तथा अन्य देवभक्तोंमें, ब्राह्मणों एवं ब्राह्मणेतरोंमें तुलना करता है, उसे ब्रह्महत्या लगती है। परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण सर्वेश्वरेश्वर हैं। ये सम्पूर्ण कारणोंके कारण हैं। इन सर्वान्तर्यामी आदिपुरुषकी सभी देवता उपासना करते हैं। ये मायासे अनेक रूप धारण करते हैं। वस्तुतः ये एक निर्गुण ब्रह्म हैं। जो इनकी दूसरे किसीसे समता करता है, वह आतिदेशिकी ब्रह्महत्याका अधिकारी माना जाता है। वेदमें कहे हुए देवताओं और पितरोंके परम्परागत पूजनका जो निषेध करता है, वह ब्रह्महत्याको प्राप्त करता है। जो भगवान् हृषीकेश तथा उनके मन्त्रोपासकोंकी निन्दा करता है; जो पवित्रोंमें भी परम पवित्र हैं, जिनका विग्रह आनन्दमय ज्ञानस्वरूप है तथा जो वैष्णवजनोंके परम आराध्य एवं देवताओंके सेव्य हैं, उन सनातन भगवान् श्रीहरिकी जो पूजा नहीं करते, बल्कि उलटे निन्दा करते हैं, उनको ब्रह्महत्या लगती है। जो सर्वदेवीस्वरूपा, सर्वाद्या, सर्ववन्दिता, सर्वकारणरूपा, विष्णुभक्तिप्रदायिनी, सती, विष्णुमाया, सर्वशक्तिस्वरूपा तथा सर्वमाता प्रकृति (दुर्गा) हैं, उनकी जो निन्दा करते हैं, उन्हें ब्रह्महत्या प्राप्त होती है। श्रीकृष्णजन्माष्टमी, रामनवमी, एकादशी, शिवरात्रि और रविवारव्रत—ये अत्यन्त पुण्य प्रदान करनेवाले हैं। जो ये परम पवित्र पाँच व्रत नहीं करते, वे चाण्डालसे भी अधिक नीच मानव ब्रह्महत्याके भागी होते हैं। जो भारतवासी मानव अम्बुवाची योगमें अर्थात् आर्द्रा नक्षत्रके प्रथम चरणमें पृथ्वी खोदते तथा जलमें मल-मूत्रादि करते हैं, उन्हें ब्रह्महत्या लगती है। जो समर्थ होकर भी गुरु, माता, भाई, साध्वी स्त्री, पुत्र-पुत्री तथा अनाथोंका भरण-पोषण नहीं करता है, वह ब्रह्महत्याका अधिकारी होता है। जो भगवान् श्रीहरिकी भक्तिसे वञ्चित है, उसे ब्रह्महत्या लगती है। निरन्तर भगवान् श्रीहरिको भोग लगाकर भोजन नहीं करनेवाला और भगवान् विष्णु तथा पुण्यमय पार्थिवेश्वरकी उपासनासे विमुख रहनेवाला ब्रह्महत्यारा कहा जाता है।
(अब आतिदेशिकी गोहत्या बतलाते हैं—) कोई व्यक्ति गौको मार रहा हो, उसे देखकर जो निवारण नहीं करता तथा जो गौ और ब्राह्मणके बीचसे होकर निकलता है, वह गोहत्याका अधिकारी होता है। जो मूर्ख डंडोंसे गौको पीटता है, बैलपर आरूढ़ होता है, उसे प्रतिदिन गोवधका पाप लगता है। जो पैरसे अग्निका स्पर्श और गौपर चरण-प्रहार करता है तथा स्नान करके बिना पैर धोये घरके भीतर प्रवेश करता है, उसे गोवधका पाप लगता है। जो पति अपनी स्त्रीका सतीत्व बेचकर जीविका चलाता है और संध्या नहीं करता, उसे गोहत्या लगती है। जो स्त्री अपने स्वामी तथा श्रीकृष्णमें भेदबुद्धि करती तथा कठोर वचनोंसे पतिके हृदयपर आघात पहुँचाती है, उसे निश्चय ही गोहत्या लगती है। जो गौओंके जानेके मार्गको खोदकर तथा तड़ाग एवं उसके ऊपरकी भूमिको जोतकर उसमें अनाज बोता है, वह गोहत्याके पापका भागी होता है। राजकीय उपद्रव और दैवी प्रकोपके अवसरपर जो स्वामी यत्नपूर्वक गौकी रक्षा नहीं करता, बल्कि उसे उलटे दुःख देता है, उस मूढ़ मानवको गोहत्या अवश्य लगती है। जो किसी प्राणीको, देवप्रतिमाके स्नान
२७- भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूप, महत्त्व और गुणोंकी अनिर्वचनीयता
प्रकृतिखण्ड २१३
करानेके बाद वहाँसे बहते हुए जलको, देवताके नैवेद्यको तथा निर्माल्य पुष्पको लाँघता है, वह गोहत्याका भागी होता है। जो अतिथियोंके लिये सदा 'नहीं' ही किया करता, झूठ बोलता और दूसरोंको ठगता तथा देवता और गुरुसे द्वेष करता है, उसे गोहत्याका पाप लगता है। जो देवप्रतिमा, गुरु और ब्राह्मणको देखकर वेगपूर्वक उन्हें प्रणाम नहीं करता, उसे गोहत्या अवश्य लगती है। जो ब्राह्मण प्रणाम करनेवाले व्यक्तिको क्रोधमें आकर आशीर्वाद नहीं देता तथा विद्यार्थीको विद्या नहीं पढ़ाता, उसे गोहत्या लगती है।
गुरुपत्नी, राजपत्नी, सौतेली माँ, सगी माँ, पुत्री, पुत्र-वधू, सास, गर्भवती स्त्री, बहिन, सहोदर भाईकी पत्नी, मामी, दादी, नानी, बूआ, मौसी, भतीजी, शिष्या, शिष्य-पत्नी, भानजेकी स्त्री, भाईके पुत्रकी पत्नी—इन सबको ब्रह्माजीने अत्यन्त अगम्या बतलाया है। जो पुरुष कामभावसे इनपर दृष्टिपात करता है, उसे अधम मानव कहा गया है। वेदोंमें उसे मातृगामी कहा गया है। उसे ब्रह्महत्याका पाप-फल प्राप्त होता है। किसी भी सत्कर्ममें उसे नहीं लिया जा सकता। वह महापापी अत्यन्त दुष्कर कुम्भीपाक नामक नरकमें जाता है। भद्रे! मैंने नरकोंमें जानेवाले लोगोंके कुछ लक्षण बतला दिये। इन नरककुण्डोंसे अतिरिक्त नरकोंमें जो जाते हैं, उनका प्रसङ्ग कहता हूँ, सुनो!
साध्वि! जो द्विज पुंश्चली और वेश्याका अन्न खाता तथा उसके साथ गमन करता है, वह मरनेके पश्चात् कालसूत्र नामक नरकमें जाता है। इसके बाद रोगी होता है। एक पतिकी सेवा करनेवाली स्त्री 'पतिव्रता' कहलाती है। दूसरेसे सम्बन्ध स्थापित करनेपर उसे 'कुलटा' कहते हैं। तीसरेके सम्पर्कमें आनेपर उसे 'धर्षिणी' जानना चाहिये। चौथेके पास जानेवाली 'पुंश्चली' मानी जाती है। पाँचवें-छठेंके साथ गमन करनेवाली स्त्रीकी 'वेश्या' संज्ञा होती है। सातवें-आठवेंके सम्पर्कमें आनेवाली 'युग्मी' कहलाती है। इससे अधिक पुरुषोंके पास जानेवाली स्त्रीको 'महावेश्या' कहते हैं। वह सबके लिये अस्पृश्य है। जो द्विज कुलटा, धर्षिणी, पुंश्चली, वेश्या, युग्मी तथा महावेश्याके साथ गमन करता है, वह अवटोद नामक नरकमें जाता है—यह निश्चित है। कुलटागामी सौ वर्षोंतक, धर्षिणीगामी चार सौ वर्षोंतक, पुंश्चलीगामी छः सौ वर्षोंतक, वेश्यागामी आठ सौ वर्षोंतक, युग्मीगामी एक हजार वर्षोंतक तथा महावेश्यागामी कामुक मानव इससे सौ गुने वर्षोंतक इस अवटोद नरकमें वास करता है। यमदूत उसपर प्रहार करते हैं। फिर कुलटागामी तित्तिर, धर्षिणीगामी कौआ, पुंश्चलीगामी कोयल, वेश्यागामी शृगाल, युग्मीगामी सूअर तथा महावेश्यागामी मरघटमें सेमलका वृक्ष होकर सात जन्मोंतक पापका फल भोगते हैं।
जो ज्ञानहीन मानव सूर्यग्रहण अथवा चन्द्रग्रहणके समय भोजन करता है, वह अरुन्तुद नामक नरकमें जाता है। वह जितने अन्नके दाने खाता है, उतने वर्षोंतक उसे उस नरकमें वास करना पड़ता है। इसके बाद वह उदररोगसे पीड़ित मानव होता है। फिर गुल्म-रोगी, काना और दन्तहीन होता है। जो अपनी कन्याका वाग्दान करके किसी दूसरे वरके साथ उसका विवाह करता है, वह पांशुभोज नामक नरकमें स्थान पाता है। पांशु ही उसे भोजनके लिये मिलता है। साध्वि! जो दानमें दी हुई वस्तुको फिर ले लेता है, वह पाशवेष्ट नामक नरकमें निवास करता है। वहाँ शयन करनेके लिये उसे बाणोंकी शय्या मिलती है। मेरे दूतोंकी मार भी खानी पड़ती है। जो ब्राह्मणको दण्ड देता है तथा जिसके भयसे ब्राह्मण काँपता है, वह व्यक्ति प्रकम्पन नामक नरकमें वास करता है। जो स्त्री क्रोधभरे मुखसे रोषपूर्वक अपने पतिको देखती तथा कटुवचन कहती है, वह
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उल्कामुख नामक नरकमें जाती है। मेरे दूत उसके मुखमें उल्का (लूक) देते हैं और डंडोंसे उसके मस्तकपर प्रहार करते हैं। इसके बाद मनुष्ययोनिमें आकर वह विधवा तथा रोगिणी होती है। वेश्याको वेधन-कुण्डमें, युग्मीको दण्डताडनकुण्डमें, महावेश्याको जालबन्धकुण्डमें, कुलटाको देहचूर्णकुण्डमें, स्वैरिणीको दलनकुण्डमें तथा धृष्टाको शोषणकुण्डमें यातना भोगनेके लिये निवास करना पड़ता है। मेरे दूत उनपर प्रहार करते हैं। साध्वि ! ये पापिनी स्त्रियाँ विष्ठा-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुएँ खाकर निरन्तर कष्ट भोगती हैं।
जो पुरुष हाथमें तुलसी लेकर की हुई प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता अथवा झूठी शपथ खाता है, वह ज्वालामुख नामक नरकमें जाता है। हाथमें गङ्गाजल तथा शालग्रामकी प्रतिमा ले प्रतिज्ञा करके उसका पालन नहीं करनेवाला भी ज्वालामुख नरकका ही भागी होता है। जो दाहिना हाथ उठाकर प्रतिज्ञा करता, देवमन्दिरमें जाकर या गौ और ब्राह्मणको छूकर वचनबद्ध होता और फिर उसका पालन नहीं करता है, उसे भी ज्वालामुख नामक नरककी प्राप्ति होती है। मित्रद्रोही, कृतघ्न, विश्वासघाती तथा झूठी गवाही देनेवाला—ये सभी ज्वालामुख नरकमें स्थान पाते हैं। वहाँ उन्हें प्रतप्त अङ्गार खानेके लिये मिलते हैं और मेरे दूत उन्हें पीड़ा पहुँचाते रहते हैं। तुलसी छूकर झूठी शपथ खानेवाला सात जन्मोंतक चाण्डाल होता है। गङ्गाजल लेकर प्रतिज्ञा करके उसे न पालनेवाला पाँच जन्मोंतक म्लेच्छ होता है। देवि! शालग्रामका स्पर्श करके की हुई प्रतिज्ञाका पालन न करनेवाला सात जन्मोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। देवप्रतिमाको छूकर झूठी शपथ खानेवाला फोड़ेका कीड़ा होता है। खुले हाथों देनेकी झूठी प्रतिज्ञा करनेवाला सात जन्मोंतक सर्प होता है। इसके बाद बिना हाथका मानव होकर फिर शुद्ध होता है। देवमन्दिरमें असत्य बोलनेवाला सात जन्मोंतक देवल होता है। ब्राह्मण आदिके सम्मुख प्रतिज्ञा करके उसका पालन न करनेवाला अग्रदानी होता है। तदनन्तर तीन जन्मोंतक वह गूँगा और बहरा मानव होता है। मित्रसे द्रोह करनेवाला नेवला होता है। कृतघ्न गेंडा और विश्वासघाती व्याघ्र होता है। वक्तव्यमें जो झूठी गवाही देता है, वह भालू होता है। ये उपर्युक्त पापी मानव अपने आगे और पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंको नरकमें गिराते हैं। मूर्खताके कारण अपनी नित्यक्रियासे विहीन, वेदके वचनोंमें अनास्था रखकर निरन्तर कपटपूर्वक उनका उपहास करनेवाला तथा व्रत और उपवाससे रहित एवं उत्तम सद्वाक्यका निन्दक कुटिल ब्राह्मण जिम्भ एवं हिमोदक नरकमें वास करता है। जो देवता और ब्राह्मणके धनका अपहरण करता है, उसे आगे-पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंको नरकमें गिराकर स्वयं भी वहाँ रहना पड़ता है। धूमके अन्धकारसे पूर्ण धूमान्ध नामक नरकमें जाता है। उसे धूएँके कारण कष्ट भोगना पड़ता है। भोजनके लिये उसे धूम्र ही मिलता है। इस प्रकारकी यातना भोगते हुए वह वहाँ रहता है। तत्पश्चात् सात जन्मोंतक वह चूहेकी योनिमें जन्म पाता है। तदनन्तर नाना प्रकारके पक्षियों, कीड़ों, वृक्षों और पशुओंकी योनिमें जन्म पानेके पश्चात् शुद्ध होता है।
पतिव्रते! ये सुविख्यात नरककुण्ड बताये गये हैं। इनके अतिरिक्त अन्य छोटे-छोटे अप्रसिद्ध नरक भी गिनाये गये हैं। अपने दुष्कर्मोंके फल भोगनेवाले पापियोंसे उन नरकोंका कोना-कोना भरा रहता है। कर्म-फल भोगनेके लिये प्राणी नाना प्रकारकी योनियोंमें भटकते हैं। कहाँतक बताया जाय ?
(अध्याय २९-३१)
प्रकृतिखण्ड २१५
पञ्चदेवोपासकोंके नरकमें न जानेका कथन तथा छियासी प्रकारके नरक-कुण्डोंका विशद परिचय
सावित्रीने कहा— महाभाग धर्मराज ! आप वेद एवं वेदाङ्गके पारगामी विद्वान् हैं। जो सबका सारभूत, अभीष्ट, सर्वसम्मत, कर्मका उच्छेद करनेमें कारणभूत, परम श्रेष्ठ, मनुष्योंके लिये सुखदायी, यशोवर्द्धक, धर्मप्रद तथा सबको सब प्रकारका मङ्गल प्रदान करनेवाला है, जिसके प्रभावसे सम्पूर्ण मानव जगत्को दुःख देनेवाली यमयातनाको नहीं प्राप्त होते, नरककुण्डोंको नहीं देखते और न उनमें पड़ते ही हैं; तथा जिससे जन्म आदि विकार नहीं प्राप्त होते, वह उत्तम कर्म क्या है? सुव्रत ! यह बतानेकी कृपा करें। साथ ही उन कुण्डोंके आकार कैसे हैं, वे किस प्रकार बने हैं तथा कौन-से पापी किस रूपसे उनमें वास करते हैं—यह मैं सुनना चाहती हूँ। देहके अग्निमें भस्म हो जानेके पश्चात् मानव किस देहसे लोकान्तरोंमें जाता और अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंके फल भोगता है ? अत्यन्त क्लेश पानेपर भी वह शरीर नष्ट क्यों नहीं हो जाता तथा वह शरीर भी कैसा है ? ये सभी बातें मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण कहते हैं— नारद ! सावित्रीके वचन सुनकर धर्मराजने भगवान् श्रीहरिको स्मरण करते हुए गुरुको नमस्कारकर पवित्र कथा आरम्भ की।
धर्मराज बोले— वत्से ! पतिव्रते ! सुव्रते ! चारों वेद, धर्मशास्त्र, संहिता, पुराण, इतिहास, पाञ्चरात्र प्रभृति धर्मग्रन्थ तथा अन्य धर्मशास्त्र एवं वेदाङ्ग—इन सबमें एक श्रीकृष्णकी मङ्गलमयी सेवाको ही सबके लिये अभीष्ट एवं सारभूत बतलाया गया है। इससे जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि तथा शोक-संताप नष्ट हो जाते हैं। यह साधन सर्वमङ्गलस्वरूप तथा परम आनन्दका कारण है। इससे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। यह नरकसे प्राणीका उद्धार करनेवाला है। भक्तिरूपी वृक्षमें अङ्कुर उत्पन्न करनेवाला तथा कर्मरूपी वृक्षको काटनेवाला है। गोलोकके मार्गपर अग्रसर होनेके लिये यह सोपान है। भगवान्के सालोक्य, सार्टि, सारूप्य और सामीप्य आदि मोक्षको तथा अविनाशी एवं शुभ पदको प्रदान करनेवाला है। शुभे ! श्रीकृष्णके किङ्कर नरककुण्ड, यमदूत तथा यमराजको स्वप्नमें भी नहीं देखते हैं।
जो एकादशीका व्रत तथा वैष्णवतीर्थमें स्नान करते हैं, एकादशीको अन्न नहीं खाते और भगवान् श्रीहरिको नित्य प्रणाम करते एवं उनकी प्रतिमाकी पूजा करते हैं, उन्हें भी मेरी भयंकर संयमनीपुरीमें नहीं जाना पड़ता। भगवान् श्रीकृष्णके भक्तोंसे मेरे दूत इस प्रकार डरते हैं, जैसे गरुड़से सर्प। मेरा दूत जब हाथमें पाश लेकर मर्त्यलोककी ओर जाता है, तब मैं चेतावनी देते हुए उससे कहता हूँ—‘दूत ! तुम भगवान् विष्णुके भक्तका आश्रम छोड़कर और सब जगह जा सकोगे।’ श्रीकृष्ण-मन्त्रके उपासकोंके नाम भी यमलोक-वासियोंको काट खाते हैं। चित्रगुप्त भयभीत-से हो दोनों हाथ जोड़कर उनका स्वागत करते हैं। ब्रह्माजी उनके लिये मधुपर्क आदि निवेदन करते हैं; क्योंकि वे ब्रह्मलोकको लाँघकर गोलोकमें जानेवाले होते हैं। उनके स्पर्शमात्रसे प्राणियोंके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे प्रज्वलित अग्निमें पड़कर तृण और काष्ठ भस्म हो जाते हैं। उन्हें देखकर मोह भी अत्यन्त भयभीत-सा होकर सम्मोहको प्राप्त होता है। काम, क्रोध, लोभ, मृत्यु, जरा, शोक, भय, काल, शुभाशुभ कर्म, हर्ष तथा भोग—ये सभी हरिभक्तोंको देखकर प्रभावशून्य हो जाते हैं।
| २१६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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पतिव्रते! जो यमयातनामें नहीं पड़ते, उनका परिचय दिया गया। अब आगमके अनुसार देहका विवरण बता रहा हूँ, सुनो। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच तत्त्व स्रष्टाके सृष्टि-विधानमें देहधारियोंकी देहके बीज (उपादान कारण) हैं। पृथ्वी आदि पाँच भूतोंसे जो देह निर्मित होता है, वह कृत्रिम है। अतएव नश्वर है। इसीलिये वह यहीं भस्म हो जाता है। बँधी हुई मुट्ठीमें अँगूठेकी जितनी लम्बाई होती है, उतना ही बड़ा जो पुरुषाकार जीव है, वही कर्मोंके भोगके लिये सूक्ष्म 'यातनादेह' को धारण करता है। वह देह मेरे लोकमें नरककी प्रज्वलित आगमें डाली जानेपर भी जलकर भस्म नहीं होती। जलमें भी गलती नहीं है। दीर्घकालतक घातक प्रहार करनेपर भी उसका नाश नहीं होता है। अस्त्र, शस्त्र, तीखे कण्टक, खौलते हुए तेल या जल, तपाये हुए लौह, गरम पत्थर तथा तपाकर लाल की हुई लोहेकी प्रतिमासे स्पर्श होनेपर और ऊँचेसे नीचे गिरनेपर भी वह यातना-शरीर न तो दग्ध होता है, न टेढ़ा-मेढ़ा ही होता है। केवल संताप भोगता है (पर नष्ट नहीं होता)। देवि! आगमोंके कथनानुसार (जलने, कटने आदिका भीषण दुःख सहते हुए भी न मरनेवाले) यातना-देहका सारा वृत्तान्त तथा कारण बताया गया। अब मैं तुमसे नरक-कुण्डोंके लक्षण बता रहा हूँ; सुनो।
सतीशिरोमणे! सभी नरककुण्ड पूर्ण चन्द्रमण्डलकी भाँति गोलाकार हैं। वे गहरे भी बहुत हैं। उनमें अनेक प्रकारके पत्थर जड़े गये हैं। प्रलयकालतक उनका नाश नहीं होता। भगवान् श्रीहरिकी इच्छासे पापियोंको क्लेश देनेके लिये नानारूपोंमें उनका निर्माण हुआ है। जो प्रज्वलित अंगारस्वरूप है, जिसका विस्तार सब ओरसे एक-एक कोस है तथा जिसमें सौ हाथ ऊपरतक आगकी लपटें उठा करती हैं, उसे ‘अग्निकुण्ड’ कहा गया है। भयानक चीत्कार करनेवाले पापियोंसे वह सदा भरा रहता है। मेरे दूत उनपर प्रहार करते रहते हैं। वे निरन्तर उस नरककी रक्षा भी करते हैं। जो हिंसक जन्तुओंसे भरा-पूरा अत्यन्त घोर अन्धकारसे पूर्ण तथा आधे कोसतक विस्तृत है और जिसमें बहुत गरम जल भरा रहता है उसे ‘प्रतप्तोदककुण्ड’ कहते हैं। मेरे सेवकोंद्वारा कठिन प्रहार पड़नेपर नारकी जीव चिल्लाते रहते हैं। इसके बाद ‘तप्तक्षारोदकुण्ड’ है। वह खौलते हुए खारे जलसे भरा रहता है। एक कोस विस्तारवाला वह भयानक नरक पापियों तथा नाकोंसे भरपूर है। एक कोसके विस्तारमें ‘विण्मूत्रकुण्ड’ नामक नरक है। निराहार रहनेके कारण सूखे हुए कण्ठ, ओठ और तालुवाले पापी उसमें इधर-उधर भागते हैं। वह दारुण नरक विष्ठासे ही बना हुआ है। उसमें अत्यन्त दुर्गन्ध फैली रहती है। वहाँ कीड़ोंसे उनका सारा अङ्ग छिद जाता है। ‘मूत्रकुण्ड’ नामक नरक खौलते हुए मूत्र तथा मूत्रके कीड़ोंसे भलीभाँति भरा हुआ है। अत्यन्त पातकी जीवोंसे भरा हुआ वह नरक दो कोसके परिमाणमें है। वहाँके कीड़े जीवोंको खाते रहते हैं। उसमें पड़े पापियोंके कण्ठ, ओठ और तालु सूखे रहते हैं। श्लेष्म आदि अपवित्र वस्तुओं और उसके कीड़ों तथा श्लेष्मभोजी पापीजनोंसे भरा नरक ‘श्लेष्मकुण्ड’ कहा गया है। आधे कोसके परिमाणमें विषभक्षी पापियों तथा कीड़ोंसे भरा हुआ नरक ‘गरकुण्ड’ के नामसे कहा जाता है। सर्पके समान आकारवाले वज्रमय दाँतोंसे युक्त तथा क्षुधातुर सूखे कण्ठवाले अत्यन्त भयंकर जन्तुओंद्वारा वह नरक भरा रहता है। आँखोंके मलोंसे युक्त आधे कोसके विस्तारवाला ‘नेत्रमलकुण्ड’ है। कीड़ोंसे क्षत-विक्षत हुए पापी प्राणी निरन्तर उसमें चक्कर लगाते रहते हैं। वसासे पूर्ण चार कोसका लम्बा-चौड़ा ‘वसाकुण्ड’ है। वसाभोजी पातकी जीव
प्रकृतिखण्ड २१७
उसमें व्याप्त रहते हैं। एक कोसकी लम्बाई-चौड़ाईवाला 'शुक्रकुण्ड' है। वीर्यके कीड़ोंसे वह व्याप्त रहता है। उसमें रहनेवाले पापियोंको जब कीड़े काटते हैं, तब वे इधर-उधर भागते रहते हैं। बावड़ीके समान परिमाणवाला दुर्गन्धित वस्तुओंसे भरा हुआ 'रक्तकुण्ड' है। उस गहरे कुण्डमें रक्त पीनेवाले प्राणी तथा काटनेवाले कीड़े भरे रहते हैं। 'अश्रुकुण्ड' नेत्रोंके आँसुओंसे पूर्ण रहता है। अनेक पापीजन उसमें भरे रहते हैं। चार बावड़ी-जितना उसका विस्तार है। कीड़ोंके काटनेपर जीव उसमें रुदन करते रहते हैं। मनुष्योंके शारीरिक मलों तथा मलभक्षी पापी जीवोंसे युक्त 'गात्रमलकुण्ड' है। कीड़ोंके काटने तथा मेरे दूतोंके मारनेके कारण घबराये हुए जीव उसमें किसी प्रकार समय बिताते हैं। कानोंकी मैल खानेवाले पापियोंसे आच्छादित 'कर्णविट्कुण्ड' है। चार बावड़ी-जितने प्रमाणवाला वह कुण्ड कीटोंद्वारा काटे जानेवाले पापियोंके चीत्कारसे पूरित रहता है। मनुष्योंकी मज्जा तथा अत्यन्त दुर्गन्धसे युक्त 'मज्जाकुण्ड' है, जो महापापियोंसे युक्त एवं चार वापीके विस्तारवाला है। मेरे दूतोंसे प्रताड़ित प्राणियोंसे युक्त स्निग्ध मांसवाला 'मांसकुण्ड' है। एक वापी-जितने प्रमाणवाले इस कुण्डमें भयानक प्राणी भरे रहते हैं। कन्याका विक्रय करनेवाले पापी वहाँ रहकर कन्याका मांस भक्षण करते हैं। कीड़ोंके काटनेपर वे अत्यन्त भयभीत हो 'बचाओ-बचाओ' की पुकार करते रहते हैं। चार बावड़ी-जितने लंबे-चौड़े 'नखादि' चार कुण्ड हैं। ताम्रमय उल्कासे युक्त तथा जलते हुए ताँबेके सदृश 'प्रतप्तताम्रकुण्ड' है। ताँबेकी असंख्य प्रतप्त प्रतिमाएँ उसमें भरी रहती हैं। प्रत्येक प्रतिमासे पापियोंको सताया जाता है। तब वे चिल्ला उठते हैं। नारकी जीवोंसे भरा वह नरक दो कोस लंबा-चौड़ा है। प्रज्वलित लोहे तथा चमकते हुए अङ्गारोंसे युक्त 'प्रतप्तलौहकुण्ड' है। वह जलते हुए लौहकी लाखों प्रतिमाओंसे पूर्ण है। प्रत्येक प्रतिमासे पापियोंको सताया जाता है, तब वे चीत्कार कर उठते हैं। वहाँ निरन्तर जलते हुए वे पापी भयभीत होकर 'रक्षा करो, रक्षा करो' पुकारते रहते हैं। वह कुण्ड दो कोसमें विस्तृत तथा अत्यन्त भयानक है और वहाँ चारों ओर भयानक अन्धकार छाया रहता है। 'चर्मकुण्ड' और 'तप्तसुराकुण्ड' आधी बावड़ीके प्रमाणके ही हैं। चर्मभक्षण तथा सुरापान करनेवाले पापी जीव उसमें भरे रहते हैं।
शाल्मलिवृक्षके नीचे तीखे काँटोंसे भरा एक कुण्ड है। वह दुःखप्रद नरक एक कोसकी दूरीमें है। लाखों मनुष्य उसमें अँट सकते हैं। वहाँ चार-चार हाथके अत्यन्त तीखे काँटे शाल्मली वृक्षसे गिरकर बिछे रहते हैं। एक-एक करके सभी काँटोंसे घोर पापियोंके अङ्ग छिद उठते हैं। उन अत्यन्त व्यग्र पापियोंके तालू सूख जाते हैं, तब महान् भयभीत होकर 'मुझे जल दो'—यों चिल्लाने लगते हैं। तक्षक आदिके विषसमूहोंसे परिपूर्ण एक कोस लंबा-चौड़ा नरक है, जिसमें पापी मेरे दूतोंकी मार खाकर गिरते हैं और वह विष ही खानेको पाते हैं। 'प्रतप्ततैलकुण्ड' में सदा खौलता हुआ तेल भरा रहता है। जलनके कारण कीड़ेतक उसमें नहीं रहते; किंतु मेरे दूतोंकी चोट खाकर पापियोंको वहाँ रहना पड़ता है। जलता हुआ तैल ही उन्हें खाना पड़ता है।
जिनके आकार त्रिशूल-जैसे हैं तथा जिनकी धार अत्यन्त तीक्ष्ण है, उन लौहमय शस्त्रोंसे सम्पन्न 'शस्त्रकुण्ड' है। चार कोसमें विस्तृत वह नरक ऐसा जान पड़ता है, मानो शस्त्रोंकी शय्या हो। भालोंसे छिद जानेके कारण जिनके कण्ठ, ओठ और तालू सूख गये हैं, ऐसे पापी जीवोंसे उस नरकका कोना-कोना भरा रहता है। साध्वि ! जिसमें सर्प-जैसे बड़े-बड़े असंख्य भयंकर कीड़े रहते हैं, उसे 'कृमिकुण्ड' कहा जाता है। विकृत
२८- भगवती महालक्ष्मीके प्राकट्य तथा विभिन्न व्यक्तियोंसे उनके पूजित होनेका तथा दुर्वासाके शापसे महालक्ष्मीके देवलोक-त्याग और इन्द्रके दुःखी होकर बृहस्पतिके पास जानेका वर्णन
२१८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
वदनवाले उन कीड़ोंके दाँत बड़े तेज होते हैं। वहाँ सर्वत्र अन्धकार फैला है। 'पूयकुण्ड' को चार कोस लंबा-चौड़ा बताया जाता है। पूयभक्षी प्राणी उसमें निवास करते हैं। तालके वृक्ष-जितना गहरा तथा असंख्य सर्पोंसे युक्त 'सर्पकुण्ड' है। वह दो कोस लंबा और बर्फीले जलसे पूर्ण होता है। साँप पापियोंके शरीरसे लिपटकर उन्हें काटते रहते हैं। मशक आदि क्रूर जन्तुओंसे पूर्ण 'मशकुण्ड', 'दंशकुण्ड' और 'गोलकुण्ड'—ये तीन नरक हैं। महान् पापियोंसे युक्त उन नरकोंकी सीमा आधे-आधे कोसकी है। जिनके हाथ बँधे रहते हैं, रुधिरसे सर्वाङ्ग लाल रहता है तथा जो मेरे दूतोंसे घायल रहते हैं, उन प्राणियोंद्वारा वहाँ हाहाकार मचा रहता है। वज्र और बिच्छुओंसे ओत-प्रोत 'वज्रदंष्ट्रकुण्ड' और 'वृश्चिककुण्ड' हैं। आधी बावड़ीके प्रमाणवाले उन नरकोंमें वज्र एवं बिच्छुओंसे विद्ध प्राणी भरे रहते हैं। 'शरकुण्ड', 'शूलकुण्ड' और 'खड्गकुण्ड'—ये तीनों आयुधोंसे व्याप्त हैं। उन नरकोंमें पड़े प्राणियोंका शरीर शस्त्रास्त्रोंसे छिदता रहता है। रक्तकी धारा बहने लगती है, जिससे वे लाल प्रतीत होते हैं। उन नरकोंका प्रमाण आधी बावड़ी है। संतस कीचड़से पूर्ण तथा अन्धकारमय 'गोलकुण्ड' है। टेढ़े-मेढ़े काँटोंकी-सी आकृतिवाले कीड़े यहाँके पापियोंको काटते हैं। उस नरकका विस्तार आधी बावड़ी है। कीड़ोंके काटने तथा मेरे दूतोंके मारनेपर भयसे घबराये हुए प्राणी रोते रहते हैं। पापियोंका झुंड कोसोंतक फैला रहता है। अत्यन्त दुर्गन्धसे युक्त तथा पापियोंको निरन्तर दुःख देनेवाला 'नक्रकुण्ड' है। वहाँ विकृत आकारवाले भयंकर नक्र आदि जन्तु उन्हें काटते रहते हैं। उस नरककी लंबाई-चौड़ाई आधी बावड़ीके परिमाणमें है। विष्ठा, मूत्र और श्लेष्मभक्षी असंख्य पापियों एवं कौओंसे भरा हुआ एक कुण्ड है। उसमें विशाल तथा विकृत आकारवाले भयंकर असंख्य कौए पापियोंको नोचते रहते हैं। 'सञ्चानकुण्ड' और 'बाजकुण्ड' इन्हीं दोनों वस्तुओं (पक्षियों)-से ओत-प्रोत हैं। इन कुण्डोंका परिमाण सौ धनुष है। उन भयानक पक्षियोंसे काटे हुए प्राणी सदा चीत्कार मचाया करते हैं। पापी जीवोंसे व्याप्त तथा सौ धनुष विस्तृत 'वज्रकुण्ड' है। वज्रके समान दाँतवाले भयंकर जन्तु उसमें रहते हैं। वहाँ सर्वत्र घोर अन्धकार छाया रहता है। दो वापी-जितना लंबा-चौड़ा 'तप्तपाषाणकुण्ड' है। उसका आकार ऐसा है मानो आग धधक रही हो। पापी प्राणी संतस होकर इधर-उधर भागते रहते हैं। छुरेकी धारके समान तीखे पाषाणोंसे बना हुआ 'तीक्ष्ण पाषाणकुण्ड' है। महान् पापी उसमें वास करते हैं। रक्तसे लथपथ हुए प्राणियोंसे भरा हुआ 'लालाकुण्ड' है। वह कुण्ड एक कोस नीचेतक गहरा है। मेरे दूतोंसे संतस प्राणी उसमें खचाखच भरे रहते हैं। कज्जल वर्णवाले संतस पत्थरोंसे निर्मित तथा सौ धनुष परिमाणवाला 'मसीकुण्ड' है। पापियोंसे वह कुण्ड पूरित रहता है। तपे हुए बालूसे भरपूर एक कोस विस्तारवाला 'चूर्णकुण्ड' है। उसमें प्रतप्त बालुकासे दग्ध प्राणी निवास करते हैं। कुम्हारके चक्रकी भाँति निरन्तर घूमता हुआ 'चक्रकुण्ड' है। उसमें अत्यन्त तीक्ष्ण धारवाले सोलह अरे लगे हुए हैं, जिनसे वहाँके पापियोंके अङ्ग सदा क्षत-विक्षत होते रहते हैं। उस कुण्डका आकार अत्यन्त टेढ़ी-मेढ़ी कन्दराके समान है तथा वह पर्याप्त गहरा है। उसकी लंबाई-चौड़ाई चार कोस है। उसमें खौलता हुआ जल भरा रहता है। वहाँके घोर पापियोंको जलचर-जन्तु काटते-खाते हैं। उस अन्धकारमय भयानक कुण्डमें संतस प्राणियोंद्वारा करुण-क्रन्दन होता रहता है। विकृत आकारवाले अत्यन्त भयंकर असंख्य कछुओंसे भरा हुआ 'कूर्मकुण्ड' है। जलमें रहनेवाले कछुए नारकी जीवोंको नोचते-खाते रहते हैं। प्रज्वलित ज्वालाओंसे व्याप्त
प्रकृतिखण्ड
'ज्वालाकुण्ड' है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई एक कोस है। उस कष्टदायी कुण्डमें पातकी प्राणी निरन्तर चिल्लाते रहते हैं। एक कोस गहराईवाला 'भस्मकुण्ड' है जिसमें सर्वत्र प्रतप्त भस्म ही भरा रहता है। जलते हुए भस्मको खानेके कारण वहाँके पातकी जीवोंके अङ्गोंमें दाह-सा होता रहता है।
जो तपे हुए लौहसे परिपूर्ण तथा जले हुए गात्रवाले पापियोंसे युक्त नरक है, उसे 'दग्धकुण्ड' कहा गया है। वह अत्यन्त भयंकर गहरा कुण्ड एक कोसके परिमाणमें है। वहाँ सर्वत्र अन्धकार छाया रहता है। ज्वालाके कारण पापियोंके तालु सूखे रहते हैं। 'तप्तसूर्मिकुण्ड' नरक अत्यन्त भयानक है, जो बहुसंख्यक ऊर्मियों, संतप्त क्षार-जलों, नाना प्रकारके शब्द करनेवाले जल-जन्तुओंसे युक्त है। जिसकी चौड़ाई चार कोस है; ऐसे गहरे और अन्धकारयुक्त नरकको 'प्रतप्तसूचीकुण्ड' कहते हैं। उस भयानक कुण्डमें दग्ध होनेके कारण आर्तनाद करते हुए प्राणी एक-दूसरेको नहीं देख पाते। जिसमें तलवारकी धारके समान तीखे पत्तेवाले बहुत-से ऊँचे-ऊँचे ताड़के वृक्ष हैं, उस नरकको 'असिपत्रकुण्ड' कहा गया है। उस नरकके ये ताड़वृक्ष आधे कोसकी लंबाईतक ऊपरको फैले हुए हैं और उन्हीं वृक्षोंपरसे वहाँके पापियोंको गिराया जाता है। उन वृक्षोंके सिरसे गिराये गये पापियोंके रक्तोंसे वह कुण्ड भरा रहता है। उन पापियोंके मुखसे 'रक्षा करो' की चीख निकलती रहती है। वह भयानक कुण्ड अत्यन्त गहरा, अन्धकारसे आच्छन्न तथा रक्तके कीड़ोंसे परिपूरित है। जो सौ धनुष-जितना लंबा-चौड़ा तथा छुरेकी धारके समान अस्त्रोंसे युक्त है, उस भयानक नरकको 'क्षुरधारकुण्ड' कहते हैं। पापियोंके रक्तसे वह कभी खाली नहीं हो पाता। जिसमें सूईके समान नोकवाले अस्त्र भरे रहते हैं तथा जो पापियोंके रक्तसे सदा परिपूर्ण रहता है, पचास धनुष-जितना लंबा-चौड़ा वह नरक 'सूचीमुख' कहलाता है। वहाँ नारकी प्राणी अत्यन्त कष्ट भोगते हैं। किसी एक जन्तुविशेषका नाम गोधा है; उसके मुखके समान जिसकी आकृति है, उसका नाम 'गोधामुखकुण्ड' है। उसकी गहराई कुएँके समान है और उसका प्रमाण बीस धनुष है। वह नरक घोर पापियोंके लिये अत्यन्त कष्टप्रद है। उन गोधासंज्ञक कीड़ोंके काटनेसे नारकी जीवोंका मुख सदा नीचेको लटकता रहता है। नाक (जलजन्तुविशेष)-के मुखके समान जिसकी आकृति है, उसे 'नक्रकुण्ड' कहते हैं। वह सोलह धनुषके विस्तारमें स्थित है। उसकी गहराई कुएँ-जितनी है। उस कुण्डमें सदा पापी भरे रहते हैं। 'गजदंशकुण्ड' को सौ धनुष लंबा-चौड़ा बतलाया गया है। तीस धनुष-जितना विस्तृत तथा गौके मुखकी आकृतिवाला एवं पापियोंके लिये अत्यन्त दुःखद जो नरक है, उसे 'गोमुखकुण्ड' कहा गया है। कालचक्रसे युक्त सदा चक्कर काटनेवाला भयानक नरक, जिसकी आकृति घड़ेके समान है, 'कुम्भीपाक' कहलाता है। चार कोसके परिमाणवाला वह नरक महान् अन्धकारमय है। साध्वि! उसकी गहराई एक लाख पोरसा* है। उस कुण्डके अन्तर्गत तप्ततैल एवं ताम्रकुण्ड आदि बहुसंख्यक कुण्ड हैं। उस नरकमें बड़े-बड़े पापी अचेत होकर पड़े रहते हैं। भयंकर कीड़ोंके काटनेपर चिल्लाते हुए नारकी जीव परस्पर एक-दूसरेको देखनेमें असमर्थ रहते हैं। उन्हें क्षण-क्षणमें मूर्च्छा आती है और वे पृथ्वीपर लोट-पोट हो जाते हैं। पतिव्रते! उन सभी कुण्डोंमें जितने पापी पड़े हुए हैं, उन सबकी ऐसी ही दुर्दशा है। मेरे दूतोंकी मार पड़नेपर वे क्षणमें गिरते और क्षणभरमें चिल्लाहट मचाने लगते हैं।
* पुरुषकी लंबाईको 'पोरसा' कहते हैं।
२२० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
कुम्भीपाकके अन्तर्गत जो नरककुण्ड हैं, वे उससे कहीं चौगुने कष्टप्रद हैं। सुदीर्घ कालतक मार पड़नेपर भी यातना भोगनेवाले उन शरीरोंका अन्त नहीं होता। कुम्भीपाकको सम्पूर्ण नरक-कुण्डोंमें प्रधान बताया गया है। कालनिर्मित सुदृढ़ सूत्रसे बँधे हुए पापी जीव जहाँ निवास करते हैं, उसे ‘कालसूत्र’ नामक नरककुण्ड कहा गया है। मेरे दूतोंके प्रयाससे प्राणी कभी ऊपर उठते हैं और कभी डूब जाते हैं। बहुत देरतक उनकी साँस बंद हो जाती है। वे अचेत-से हो जाते हैं। साध्वि ! उसका जल सदा खौलता रहता है। नरकभोगी प्राणियोंके लिये वह बड़ा ही कष्टप्रद है। ‘अवटकुण्ड’ और ‘मत्स्योदकुण्ड’ एक ही है। ‘अवट’ संज्ञक एक कूप है। अतः कोई उसे अवटकुण्ड कहा करते हैं। संतप्त जलसे वह परिपूर्ण रहता है। चौबीस धनुष-जितना वह लंबा-चौड़ा है। जलते हुए शरीरवाले घोर पापी जीव उसमें निरन्तर व्याप्त रहते हैं। मेरे दूतोंकी कठिन मार उन्हें सहनी पड़ती है। उस कुण्डकी ‘अवटोद’ संज्ञा है। उसके जलका स्पर्श होते ही सम्पूर्ण व्याधियाँ पापियोंको अनायास घेर लेती हैं। उसकी गहराई सौ धनुष है। जिसमें पड़े हुए प्राणियोंको अरुन्तुद नामक कीड़े काटते रहते हैं, उसे ‘अरुन्तुदकुण्ड’ कहा जाता है। दुःखी जीव सदा हाहाकार मचाया करते हैं। अत्यन्त तपी हुई धूलोंसे व्याप्त नरकको ‘पांशुकुण्ड’ कहते हैं। वह सौ धनुष-जितना विस्तृत है। उसमें पड़े नारकी जीवोंके चमड़े जलते रहते हैं। खानेके लिये उसे जलती हुई धूल ही उपलब्ध होती है। जिसमें गिरते ही पापी पाशोंसे आवेष्टित हो जाता है, उसे विज्ञ पुरुषोंने ‘पाशवेष्टनकुण्ड’ कहा है। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक कोस है। जहाँ पापी ज्यों ही गिरते हैं, त्यों ही शूलसे जकड़ उठते हैं, उसे ‘शूलप्रोतकुण्ड’ कहा जाता है। उसका परिमाण बीस धनुष है। ‘प्रकम्पनकुण्ड’ आधे कोसके विस्तारमें है। उसका जल बर्फके समान गलता रहता है। उसमें पड़ते ही प्राणियोंके शरीरमें कँपकँपी मच जाती है। जिसमें पापियोंके मुखोंमें जलती हुई लुआठी घुसा दी जाती है, उसे ‘उल्कामुखकुण्ड’ कहा गया है। वह भी बीस धनुष-जितना लम्बा-चौड़ा है।
जिसकी गहराई लाख पोरसा है तथा सौ धनुष-जितना जो विस्तृत है, उस भयानक कुण्डको ‘अन्धकूप नरक’ कहते हैं। उसमें नाना प्रकारकी आकृतिवाले कीड़े रहते हैं। वह सदा अन्धकारसे व्याप्त रहता है। कूपके समान उसकी गोलाई है। कीड़ोंके काटनेपर प्राणी आतुर होकर परस्पर एक-दूसरेको चबाने लगते हैं। उन्हें खौलता हुआ जल ही पीनेको मिलता है। एक तो वे खौलते हुए जलसे जलते हैं, दूसरे कीड़े भी काटते रहते हैं। वहाँ इतना अन्धकार रहता है कि वे आँखोंसे कुछ भी देख नहीं सकते।
जहाँ जानेपर पापी अनेक प्रकारसे शस्त्रोंसे बिंध जाते हैं, वह ‘वेधनकुण्ड’ कहलाता है। उसकी लंबाई-चौड़ाई बीस धनुष है। जहाँ डंडोंसे मारा जाता है, उस सोलह धनुषके प्रमाणवाले नरकको ‘दण्डताडनकुण्ड’ कहते हैं। जहाँ जाते ही पापी जीव मछलियोंकी भाँति महाजालमें फँस जाते हैं तथा जो बीस धनुष-जितना विस्तृत है, वह ‘जालरन्ध्रकुण्ड’ कहलाता है। जहाँ गिरे हुए पापियोंके शरीर चूर्ण-चूर्ण हो जाते हैं, वह नरक ‘देहचूर्णकुण्ड’ नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ गये हुए पापियोंके पैरमें लोहेकी बेड़ी पड़ी रहती है। असंख्य पोरसा वह गहरा है। लंबाई और चौड़ाई बीस धनुष है। प्रकाशका तो वहाँ कहीं नाम ही नहीं रहता। उसमें प्राणी मूर्च्छित होकर जड़की भाँति पड़े रहते हैं। जहाँ गये पापी मेरे दूतोंद्वारा दलित और ताड़ित होते रहते हैं, उसको ‘दलनकुण्ड’ कहा गया है। वह सोलह धनुषके विस्तारमें है।
तपी हुई बालूसे व्याप्त होनेके कारण जहाँ गिरते ही पापीके कण्ठ, ओठ और तालू सूख
प्रकृतिखण्ड २२१
जाते हैं तथा जो तीस धनुष-जितना परिमाणमें है और जिसकी गहराई सौ पोरसा है एवं जो सदा अन्धकारसे आच्छन्न रहता है, उन पापियोंके लिये अतिशय दुःखप्रद नरकको 'शोषणकुण्ड' कहते हैं। विविध धर्मसम्बन्धी कषाय जलसे जो लबालब भरा रहता है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई सौ धनुष है और जहाँ सदा दुर्गन्ध फैली रहती है तथा जहाँ उस अमेध्य वस्तुके आहारपर ही रहकर पापी जीव यातना भोगते हैं, वह नरक 'कषकुण्ड' कहलाता है। साध्वि ! जिस कुण्डका आकार शूर्पके सदृश है तथा जो बारह धनुषके बराबर लंबा-चौड़ा है एवं जहाँ सर्वत्र संतप्त बालुका बिछी रहती है और पातकियोंसे कोई स्थल खाली नहीं रहता, उस नरकको 'शूर्पकुण्ड' कहते हैं। वहाँ सदा दुर्गन्ध भरी रहती है। वही खाकर पापी जीव वहाँ यातना भोगते हैं। पतिव्रते ! जहाँकी रेणुका अत्यन्त संतप्त रहती है तथा जो घोर पापी जीवोंसे युक्त रहता है एवं जिसके भीतर आगकी लपटें उठा करती हैं, ऐसी ज्वालासे भरे हुए मुखवाले नरकको 'ज्वालामुखकुण्ड' कहा जाता है। वह बीस धनुषमें विस्तृत है। ज्वालासे दग्ध पापी उसके कोने-कोनेमें भरे रहते हैं। उस कुण्डमें प्राणियोंको असीम कष्ट भोगना पड़ता है।
जहाँ गिरते ही मानव मूर्च्छित हो जाता है तथा जिसके भीतरकी ईंटें अत्यन्त संतप्त रहती हैं एवं जो आधी बावड़ी-जितना परिमाणवाला है, वह 'जिम्भकुण्ड' कहलाता है। जो धूममय अन्धकारसे संयुक्त रहता है तथा जहाँ गये हुए पापी धूमोंके कारण नेत्रहीन हो जाते हैं और जिसमें साँस लेनेके लिये बहुत-से छिद्र बने हैं, उस नरकको 'धूम्प्रान्धकुण्ड' कहा गया है। वह सौ धनुषके बराबर परिमाणमें है। जहाँ जानेपर पापीको तुरंत नाग बाँध लेते हैं तथा जो सौ धनुष-जितना लंबा-चौड़ा है और जिसमें सदा नाग भरे रहते हैं, उसे 'नागवेष्टनकुण्ड' कहा गया है। इन सभी कुण्डोंमें मेरे दूत प्राणियोंको मारते, जलाते तथा भाँति-भाँतिसे भयानक कष्ट देते रहते हैं।
सावित्री ! सुनो, मैंने ये छियासी नरककुण्ड और इनके लक्षण भी बतला दिये। अब फिर तुम क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ३२-३३)
भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूप, महत्त्व और गुणोंकी अनिर्वचनीयता
सावित्रीने कहा—देव ! अब आप मुझे सारभूत एवं परम दुर्लभ हरिभक्तिका उपदेश दीजिये। अन्य सब बातें मैंने आपसे सुन ली हैं। इस समय और किसी विषयको सुनना शेष नहीं है। अब तो मुझे भगवान् श्रीकृष्णके गुण-कीर्तनरूप कुछ धर्मकी बात बताइये। वही लाखों मनुष्योंके उद्धारका बीज है। वही नरकके समुद्रसे पार उतारनेवाला है। श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन मुक्तिके सारभूत तत्त्वकी प्राप्तिका कारण तथा समस्त अमङ्गलोंका निवारण करनेवाला है। वह कर्ममय वृक्षोंको उखाड़ फेंकनेवाला तथा किये हुए पापसमूहोंको हरनेवाला है। प्रभो! मुक्तियाँ कितने प्रकारकी हैं? उनके लक्षण क्या हैं? हरिभक्तिका स्वरूप क्या है? उसके भेद कितने हैं? तथा निषेकका भी क्या लक्षण है? वह सारभूत तत्त्वज्ञान क्या है? यह आप बताइये। अपना सर्वस्व दान कर देना, उपवास-व्रत करना, तीर्थोंमें नहाना, व्रत रखना और तप करना—ये सब-के-सब ज्ञानहीनको ज्ञान देनेसे जो पुण्य होता है, उसकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते। भगवन् ! यह निश्चय है कि गौरवकी दृष्टिसे पिताकी अपेक्षा माताका स्थान
२२२ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
सौगुना ऊँचा है। परंतु ज्ञानदाता गुरु मातासे भी सौगुना अधिक पूजनीय होता है।
**यम बोले—**बेटी! मैं पहले ही तुम्हें यह वर दे चुका हूँ कि तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट प्रश्न होगा, वह सब मैं बताऊँगा—तुम जो कुछ जानना चाहोगी, उसका ज्ञान कराऊँगा। अतः इस समय मेरे वरसे तुम्हें भगवान् श्रीकृष्णकी भक्ति प्राप्त हो। कल्याणि! तुम जो भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन सुनना चाहती हो, वह बहुत ही उत्तम है। यह प्रश्न प्रश्नकर्ताके, उत्तर देनेवालेके और श्रोताओंके कुलका भी उद्धार करनेवाला है। परंतु है यह बहुत कठिन। सहस्र मुखवाले शेष भी इसे कहनेमें असमर्थ हैं। मृत्युञ्जय भगवान् शंकर यदि अपने पाँच मुखोंसे कहने लगें तो वे भी पार नहीं पा सकते। ब्रह्माजी चारों वेदों तथा अखिल जगत्के स्रष्टा हैं। चार मुखोंसे उनकी परम शोभा होती है। भगवान् विष्णु सर्वज्ञ हैं, परंतु ये दोनों प्रधान देव भी श्रीकृष्णके गुणोंका सम्यक् प्रकारसे वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। स्वामी कार्तिकेय अपने छः मुखोंसे वर्णन करते रहें तो भी अन्त नहीं पा सकते। महाभाग गणेशजीको योगीन्द्रोंके गुरु-का-गुरु कहा जाता है; किंतु भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन कर पाना उनके लिये भी असम्भव है। सम्पूर्ण शास्त्रोंके सारतत्त्व चार वेद हैं। ये वेद तथा इनसे परिचित विद्वान् भी श्रीकृष्णके गुणोंकी एक कला भी जाननेमें असमर्थ सिद्ध हो जाते हैं। श्रीकृष्णकी महिमाके वर्णनमें साक्षात् सरस्वती भी जड़के समान होकर असमर्थता प्रकट करने लगती हैं। सनत्कुमार, धर्म, सनक, सनातन सनन्द, कपिल तथा सूर्य—ये तथा श्रीब्रह्माजीके अन्यान्य सुयोग्य पुत्र भी उनके महत्त्वका वर्णन करनेमें सफलता नहीं प्राप्त कर सके, तब फिर अन्य व्यक्तियोंसे क्या आशा की जा सकती है? श्रीकृष्णके जिन गुणोंकी व्याख्या सिद्ध, मुनीन्द्र तथा योगीन्द्र भी नहीं कर सकते, उनका वर्णन अन्य पुरुष कैसे कर सकते हैं? तथा मैं ही कैसे कर सकता हूँ?
ब्रह्मा, विष्णु और शिव प्रभृति देवता जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते हैं, वे भक्तोंके लिये जितने सुगम हैं, उतने ही भक्तहीन जनोंके लिये दुर्लभ भी हैं। श्रीकृष्णका गुणानुवाद परम पवित्र है। कुछ लोग किंचिन्मात्र उसे जानते हैं। परम ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मा तथा उनके पुत्र आदि अधिक परिचित हैं। ज्ञानियोंके गुरु गणेशजी उनसे भी अधिक जानते हैं। सबसे अधिक सर्वज्ञ भगवान् शंकर ही जानते हैं; क्योंकि परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णने पूर्वकालमें इनको ज्ञान प्रदान किया था। गोलोकके अत्यन्त निर्जन रमणीय रासमण्डलमें श्रीकृष्णने जो शिवको अपने गुणोंके कीर्तनका महत्त्व बताया था, उसका स्वयं शिवजीने अपनी पुरीमें धर्मके प्रति उपदेश किया था। महाभाग सूर्यके पूछनेपर धर्मने पुष्करमें उनके सामने इसकी व्याख्या की थी। साध्वि! मेरे पिता भगवान् सूर्यने तपस्याद्वारा धर्मकी आराधना करके मुझे प्राप्त किया था। सुव्रते! पूर्व समयमें मेरे पिताजी यत्नपूर्वक मुझे यमपुरीका राज्य दे रहे थे; किंतु मैं लेना नहीं चाहता था। वैराग्य हो जानेके कारण मेरे मनमें तपस्या करनेकी बात आती थी। तब पिताजीने मेरे सामने भगवान्के गुणोंका जो वर्णन किया था, वह अत्यन्त दुर्गम है। मैं आगमके अनुसार उसे कुछ कहता हूँ, सुनो।
वरानने! श्रीकृष्णके इतने अमित गुण हैं कि उन्हें वे स्वयं ही पूरा नहीं जानते; तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है? जैसे आकाश स्वयं ही अपना अन्त नहीं जानता, उसी तरह भगवान् भी अपने गुणोंका अन्त नहीं जानते। भगवान् सबके अन्तरात्मा एवं सम्पूर्ण कारणोंके कारण हैं; वे सर्वेश्वर, सर्वाद्य, सर्ववित् और सर्वरूपधारी हैं, वे नित्यस्वरूप, नित्यविग्रह, नित्यानन्द, निराकार, निरङ्कुश,
प्रकृतिखण्ड
२२३
निःशङ्क, निर्गुण (प्राकृतगुणरहित), निरामय, निर्लिप्त, सर्वसाक्षी, सर्वाधार एवं परात्पर हैं। प्रकृति उन्हींसे उत्पन्न हुई है और सम्पूर्ण प्राकृत पदार्थ प्रकृतिके कार्य हैं। स्वयं परमपुरुष श्रीकृष्ण ही प्रकृति हैं और वे प्रकृतिसे परे भी हैं। रूपहीन होते हुए भी भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये वे नाना प्रकारके रूप धारण करते हैं। उनका दिव्य चिन्मय स्वरूप अत्यन्त कमनीय, सुन्दर और परम मनोहर है। वे नवीन मेघमालाके समान श्याम कान्ति धारण करते हैं। उनकी किशोर अवस्था है। वे गोपवेषमें सुशोभित होते हैं। कोटि-कोटि कामदेवोंकी लावण्यलीलाके धाम हैं। उनकी मोहिनी झाँकी मनको मोहे लेती है। उनके नेत्र शरत्कालके मध्याह्नमें पूर्णतः विकसित हुए कमलोंकी शोभाको छीने लेते हैं। उनका मुख शरत्पूर्णिमाके करोड़ों चन्द्रमाओंकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाला है। अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित दिव्य आभूषण उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। मन्द मुस्कानसे सुशोभित मुख एवं सर्वाङ्ग बहुमूल्य पीताम्बरसे सतत शोभायमान है। वे परब्रह्मस्वरूप हैं और ब्रह्मतेजसे उद्भासित होते हैं। भक्तजनोंको सुखपूर्वक उनका दर्शन सुलभ होता है। वे शान्तस्वरूप राधा-वल्लभ अनन्त गुण और महिमासे सम्पन्न हैं। प्रेममयी गोपियाँ सब ओरसे घेरकर उन्हें मन्द मुस्कराहटके साथ निहारती रहती हैं। वे रासमण्डलके मध्यभागमें रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनके दो भुजाएँ हैं। वे वनमालासे विभूषित हैं और मुरली बजा रहे हैं। मणिराज कौस्तुभ सदा ही उनके वक्षःस्थलको उद्भासित करता रहता है। केसर, रोली, अबीर, कस्तूरी तथा चन्दनसे उनका श्रीविग्रह चर्चित है। वे मनोहर चम्पा, कमल और मालतीकी मालाओंसे अलंकृत हैं। चारु चम्पाके फूलोंसे सुशोभित चूड़ामणि (मुकुट)-की बंकिमा (लटक) उनके मनोहर सौन्दर्यकी वृद्धि कर रही है।
भक्ति-रससे ओतप्रोत भक्तजन भगवान् श्रीकृष्णके ऐसे ही स्वरूपका ध्यान करते हैं। जगद्धाता ब्रह्मा उन्हींका भय मानकर सृष्टिका विधान तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके भाग्यका उनके कर्मके अनुसार लेखन करते हैं। उन्हींकी आज्ञाके अनुसार सबको तपस्याओं तथा कर्मोंका फल देते हैं। उन्हींके भयसे पालक भगवान् विष्णु सदा सबका पालन करते हैं। उनसे भीत रहनेवाले कालाग्निरुद्रद्वारा अखिल जगत्का संहार होता है। जो ज्ञानियोंके गुरु-के-गुरु एवं मृत्युञ्जय नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिव हैं, वे भी उन्हींको जानने तथा उनका ज्ञान प्रदान करनेसे सिद्धेश, योगीश तथा सर्वज्ञ हुए हैं। भक्ति एवं ज्ञानसे युक्त तथा परमानन्दसे सम्पन्न हैं। साध्वि! उन्हींके कृपा-प्रसादसे शीघ्रगामियोंमें श्रेष्ठ पवनदेवता चलते तथा सूर्य उन्हींके भयसे निरन्तर तपते हैं। उन्हींकी आज्ञाके अनुसार इन्द्र वर्षा करते, मृत्यु समस्त प्राणियोंपर प्रभाव डालती, अग्नि जलाती एवं जल शीतल रहता तथा अत्यन्त भयभीत दिक्पाल दिशाओंकी रक्षा करते हैं। उन्हींके भयसे ग्रह राशिचक्रोंपर भ्रमण करते हैं। वृक्ष जो फूलते और फलते हैं, इसमें भी उनका भय ही कारण है। उन्हींकी आज्ञासे फल पकते हैं तथा बहुत-से वृक्ष फलहीन रह जाते हैं। उनकी आज्ञासे ही जलचर जीव स्थलमें और स्थलचर प्राणी जलमें जीवित नहीं रह पाते हैं। उन्हींके भयसे मैं (यमराज) धर्माधर्मके विषयमें नियन्त्रण करता हूँ। उनकी आज्ञासे ही काल सबको अपना ग्रास बनाता और सर्वत्र चक्कर लगाता ही रहता है। उन्हींके भयसे मृत्यु तथा काल किसीको असमयमें नहीं मार सकते। कोई जलती हुई आगमें या गहरे जलाशय अथवा समुद्रमें गिर जाय, वृक्षके ऊपरसे नीचे पड़ जाय, तीखी तलवारपर गिर पड़े, सर्प आदिके मुँहमें पड़ जाय, संग्राममें तथा अन्य विषम संकटोंमें फँसकर नाना प्रकारके अस्त्र-
२२४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
शस्त्रोंसे क्षत-विक्षत हो जाय तो भी जिनका भय मानकर काल उसे अकालमें नहीं ले जा सकता तथा जिनकी आज्ञा मिल जानेपर फूल और चन्दनसे सजी हुई सेजपर तन्त्र-मन्त्र तथा भाई-बन्धुओंसे सुरक्षित होकर सोते हुए मनुष्यको भी काल समय आनेपर अवश्य उठा ले जाता है, वे भगवान् ही सर्वोपरि हैं। उनके भयसे ही काल सब कुछ करता है। उन्हींकी आज्ञासे वायु जलराशिको, जलराशि कच्छपको, कच्छप शेषनागको, शेषनाग पृथ्वीको तथा क्षमारूप पृथ्वी समुद्रों, सातों पर्वतों तथा नाना प्रकारके रूपवाले चराचर जगत्को धारण करती है। उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूत प्रकट होते और अन्तमें उन्हींके भीतर लीन हो जाते हैं।
पतिव्रते ! इकहत्तर दिव्य युगोंकी इन्द्रकी आयु होती है। ऐसे अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन हो जानेपर ब्रह्माका एक दिन-रात होता है। इसी प्रकार तीस दिनोंका एक मास, दो मासोंकी एक ऋतु तथा छः ऋतुओंका एक वर्ष होता है। ऐसे सौ वर्षकी ब्रह्माकी आयु होती है। जबतक ब्रह्माका पतन नहीं होता तबतक श्रीहरिकी आँखें खुली रहती हैं—उनकी पलक उठी रहती है। जब वे आँख मूँदते या पलक गिराते हैं, तब ब्रह्माजीका पतन एवं प्रलय होता है। उसीको 'प्राकृतिक प्रलय' कहते हैं। उस प्राकृतिक प्रलयके समय सम्पूर्ण प्राकृत पदार्थ एवं देवता आदि चराचर प्राणी ब्रह्मामें लीन हो जाते हैं और ब्रह्मा भगवान् श्रीकृष्णके नाभिकमलमें लीन हो जाते हैं। क्षीरसागरमें शयन करनेवाले श्रीविष्णु तथा वैकुण्ठवासी चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णके वामपार्श्वमें लीन हो जाते हैं। रुद्र और भैरव आदि जितने भी शिवके अनुगामी हैं, वे मङ्गलाधार सनातन ज्ञानानन्दस्वरूप शिवमें लीन होते हैं। ज्ञानके अधिष्ठाता भगवान् शिव उन परमात्मा महादेव श्रीकृष्णके ज्ञानमें विलीन हो जाते हैं। सम्पूर्ण शक्तियाँ विष्णुमाया दुर्गामें तिरोहित हो जाती हैं। विष्णुमाया दुर्गा भगवान् श्रीकृष्णकी बुद्धिमें स्थान ग्रहण कर लेती हैं; क्योंकि वे उनकी बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं। नारायणके अंश स्वामिकार्तिकेय उनके वक्षःस्थलमें लीन हो जाते हैं। सुव्रते ! गणोंके स्वामी देवेश्वर गणेशको भगवान् श्रीकृष्णका अंश माना गया है। वे उनकी दोनों भुजाओंमें प्रविष्ट हो जाते हैं। लक्ष्मीकी अंशभूता देवियाँ लक्ष्मीमें तथा लक्ष्मी श्रीराधामें लीन हो जाती हैं। गोपियाँ तथा सम्पूर्ण देवपत्नियां भी श्रीराधामें ही लीन हो जाती हैं। भगवान् श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधीश्वरी देवी श्रीराधा उनके प्राणोंमें निवास कर जाती हैं। सावित्री, वेद एवं सम्पूर्ण शास्त्र सरस्वतीमें प्रवेश कर जाते हैं। सरस्वती परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णकी जिह्वामें विलीन हो जाती हैं। गोलोकके सम्पूर्ण गोप भगवान् श्रीकृष्णके रोमकूपोंमें लीन हो जाते हैं। उन प्रभुके प्राणोंमें सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राणस्वरूप वायुका, उनकी जठराग्निमें समस्त अग्नियोंका तथा उनकी जिह्वाके अग्रभागमें जलका लय हो जाता है। जो सारसे भी सारतर हैं तथा भक्तिरसामृतका पान करते हैं, वे भक्त वैष्णवजन अत्यन्त आनन्दित हो उन भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें विलीन हो जाते हैं। क्षुद्र विराट् महान् विराट्में और महान् विराट् परमात्मा श्रीकृष्णमें लीन हो जाते हैं। श्रीकृष्णके ही रोमकूपोंमें सम्पूर्ण विश्वकी स्थिति है। उन्हींके आँख मीचनेपर महाप्रलय होता है तथा उनकी आँख खुलते ही पुनः सृष्टिका कार्य आरम्भ हो जाता है। भगवान्की पलक जितनी देर उठी या खुली रहती है, उतनी ही देरतक बंद भी रहती है। दोनोंमें बराबर ही समय लगता है। ब्रह्माके सौ वर्षोंतक सृष्टि चालू रहती है, फिर उतने ही समयके लिये प्रलय हो जाता है। सुव्रते!
प्रकृतिखण्ड २२५
ब्रह्माकी सृष्टि और प्रलयकी कोई गिनती ही नहीं है। ठीक उसी तरह, जैसे भूमिके धूलिकणोंकी कोई गणना नहीं की जा सकती। जिन सर्वान्तरात्मा श्रीकृष्णके नेत्रोंकी पलक गिरते ही जगत्का प्रलय हो जाता है और पलकके उठते ही उन परमेश्वरकी इच्छासे सृष्टि आरम्भ हो जाती है, उनके गुणोंका कीर्तन करनेमें कौन समर्थ है? मैंने पिताजीके मुखसे जैसा-जैसा सुना है, वैसा-वैसा आगमोंके अनुसार वर्णन किया है।
चारों वेदोंने मुक्तिके चार भेद बतलाये हैं। उन सबसे प्रभुकी भक्तिको श्रेष्ठ माना गया है; क्योंकि इसके सामने सभी तुच्छ हैं। भक्ति मुक्तिसे भी बड़ी है। एक मुक्ति 'सालोक्य' प्रदान करनेवाली, दूसरी 'सारूप्य' देनेमें निपुण, तीसरी 'सामीप्य' प्रदान करनेवाली है और चौथी 'निर्वाणपद' पर पहुँचानेवाली कही जाती है। भक्त पुरुष परमप्रभु परमात्माकी सेवा छोड़कर इन मुक्तियोंकी इच्छा नहीं करते। वे सिद्धत्व, अमरत्व और ब्रह्मत्वकी भी अवहेलना करते हैं। मुक्ति सेवारहित होती है और भक्तिमें निरन्तर सेवाभावका उत्कर्ष होता रहता है। यही भक्ति और मुक्तिका भेद है। अब निषेकका लक्षण सुनो। विद्वान् पुरुष कहते हैं कि किये हुए कर्मोंका भोग ही निषेक है। उस कर्मभोग या प्रारब्धका भी खण्डन करके कल्याण प्रदान करनेवाली है—श्रीकृष्णकी उत्तम सेवा। साध्वि! यह तत्त्वज्ञान लोक और वेदका सार है। यह विघ्नोंका नाशक तथा शुभदायक है। बेटी! अब तुम सुखपूर्वक अपने घरको जाओ।
इस प्रकार कहकर सूर्यपुत्र यमराजने सावित्रीके पति सत्यवान्को जीवन प्रदान करके सावित्रीको शुभ आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् वे वहाँसे जानेके लिये उद्यत हो गये। उन्हें जाते देख सावित्री उनके चरणोंमें मस्तक झुका दोनों पैर पकड़कर रोने लगी। सच है, सत्पुरुषोंका बिछोह बड़ा ही दुःखदायक होता है। नारद! सावित्रीको रोती देख कृपानिधान यम भी रो पड़े और मन-ही-मन संतुष्ट हो उससे इस प्रकार बोले।
यमने कहा—सावित्री! तुम पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें लाख वर्षोंतक सुख भोगनेके अनन्तर भगवान् श्रीकृष्णके गोलोकधाममें जाओगी। भद्रे! अब तुम अपने घर जाओ और भगवती सावित्रीका व्रत करो। चौदह वर्षोंतक करनेपर यह व्रत नारियोंको मोक्ष प्रदान करता है। ज्येष्ठमासके कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथिको यह व्रत करना चाहिये। भाद्रपद-मासके शुक्लपक्षमें अष्टमी तिथिके दिन महालक्ष्मीका शुभ व्रत होता है। यह व्रत सोलह वर्षोंतक प्रत्येक वर्षके प्रतिमासके शुक्लपक्षमें करना चाहिये। जो नारी भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करती है, उसे भगवान् श्रीहरिका परमपद प्राप्त हो जाता है। प्रत्येक मङ्गलवारको मङ्गल प्रदान करनेवाली भगवती मङ्गलचण्डिकाकी पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक मासके शुक्लपक्षमें षष्ठीके दिन मङ्गलप्रदा भगवती षष्ठी (देवसेना)-की उपासना करनेका विधान है। इसी प्रकार आषाढ़की संक्रान्तिके अवसरपर सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करनेवाली भगवती मनसाकी पूजा होती है। कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथिको रासमण्डलमें विराजमान भगवान् श्रीकृष्णकी प्राणाधिका श्रीराधाकी उपासना करनी चाहिये तथा प्रत्येक मासकी शुक्ला अष्टमीके दिन दुर्गतिनाशिनी, विष्णुमाया भगवती दुर्गाका व्रत करना चाहिये। जो नारी विशुद्ध पतिव्रताओंमें, श्रीयन्त्र आदिमें तथा प्रतिमाओंमें पतिपुत्रवती सती प्रकृतिस्वरूपिणी भगवती जगदम्बाकी भावना करके धन और संततिकी प्राप्तिके लिये भक्तिपूर्वक पूजा करती है, वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके परमपदको प्राप्त होती है।
इस प्रकार कहकर धर्मराज अपने स्थानपर पधार गये। सावित्री भी पतिदेवको लेकर अपने घर लौट गयी। नारद! यों सावित्री और सत्यवान्
२२६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
दोनों जब घरपर चले आये, तब सावित्रीने सत्यवान्से तथा अन्य बान्धवोंसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। फिर वरके प्रभावसे सावित्रीके पिता क्रमशः सौ पुत्रवाले हो गये। उसके श्वशुरकी आँखें ठीक हो गयीं और वे अपना राज्य पा गये। सावित्री स्वयं भी बहुत-से पुत्रोंकी जननी बन गयी। उस पतिव्रता सावित्रीने पुण्यभूमि भारतवर्षमें अनेक वर्षोंतक सुख-भोग किया। तत्पश्चात् वह अपने पतिके साथ गोलोकधाममें चली गयी। जो सविताकी अधिदेवी, सवितृदेवताके मन्त्रोंकी अधिष्ठात्री तथा वेदोंकी सावित्री (जननी) हैं, वे देवी इन्हीं गुणोंके कारण ‘सावित्री’ कही गयी हैं।
वत्स! इस प्रकार सावित्रीका श्रेष्ठ उपाख्यान तथा प्राणियोंके कर्मविपाक—ये प्रसङ्ग तुम्हें बता दिये। अब पुनः क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय ३४)
भगवती महालक्ष्मीके प्राकट्य तथा विभिन्न व्यक्तियोंसे उनके पूजित होनेका तथा दुर्वासाके शापसे महालक्ष्मीके देवलोक-त्याग और इन्द्रके दुःखी होकर बृहस्पतिके पास जानेका वर्णन
नारदजीने कहा— भगवन्! मैं धर्मराज और सावित्रीके संवादमें निर्गुण-निराकार परमात्मा श्रीकृष्णका निर्मल यश सुन चुका। वास्तवमें उनके गुणोंका कीर्तन मङ्गलोंका भी मङ्गल है। प्रभो! अब मैं भगवती लक्ष्मीका उपाख्यान सुनना चाहता हूँ। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! सर्वप्रथम भगवती लक्ष्मीकी किसने पूजा की? इन देवीका कैसा स्वरूप है और किस मन्त्रसे इनकी पूजा होती है? आप मुझे इनका गुणानुवाद सुनानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायण बोले— ब्रह्मन्! प्राचीन समयकी बात है। सृष्टिके आदिमें परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णके वामभागसे रासमण्डलमें भगवती श्रीराधा प्रकट हुईं। उन परम सुन्दरी श्रीराधाके चारों ओर वटवृक्ष शोभा दे रहे थे। उनकी अवस्था ऐसी थी, मानो द्वादशवर्षीया देवी हों। निरन्तर रहनेवाला तारुण्य उनकी शोभा बढ़ा रहा था। उनका दिव्य विग्रह ऐसा प्रकाशमान था, मानो श्वेत चम्पकका पुष्प हो। उन मनोहारिणी देवीके दर्शन परम सुखी बनानेवाले थे। उनका प्रसन्नमुख शरत्पूर्णिमाके कोटि-कोटि चन्द्रमाओंकी प्रभासे पूर्ण था। उनके विकसित नेत्रोंके सामने शरत्कालके मध्याह्नकालिक कमलोंकी शोभा छिप जाती थी। परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णके साथ विराजमान रहनेवाली वे देवी उनकी इच्छाके अनुसार दो रूप हो गयीं। रूप, वर्ण, तेज, अवस्था, कान्ति, यश, वस्त्र, आकृति, आभूषण, गुण, मुस्कान, अवलोकन, वाणी, गति, मधुर-स्वर, नीति तथा अनुनय-विनयमें दोनों (राधा तथा लक्ष्मी) समान थीं। श्रीराधाके बाँयें अंशसे लक्ष्मीका प्रादुर्भाव हुआ और अपने दाहिने अंशमें श्रीराधा स्वयं ही विद्यमान रहीं। श्रीराधाने प्रथम परात्पर प्रभु द्विभुज भगवान् श्रीकृष्णको पतिरूपसे स्वीकार कर लिया। भगवान्का वह विग्रह अत्यन्त कमनीय था। महालक्ष्मीने भी श्रीराधाके वर लेनेके पश्चात् उन्हींको पति बनानेकी इच्छा की। तब भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें गौरव प्रदान करनेके विचारसे ही स्वयं दो रूपोंमें प्रकट हो गये। अपने दक्षिण अंशसे वे दो भुजाधारी श्रीकृष्ण ही बने रहे और वाम अंशसे चतुर्भुज विष्णुके रूपमें परिणत हो गये। उन्होंने महालक्ष्मीको भगवान् विष्णुकी सेवामें समर्पित कर दिया। जो देवी अपनी स्नेहभरी दृष्टिसे विश्वको माताकी भाँति निरन्तर देखती-भालती
प्रकृतिखण्ड २२७
रहती हैं, वे ही देवियोंमें महती होनेके कारण महालक्ष्मीके नामसे प्रसिद्ध हुईं। इस प्रकार द्विभुज भगवान् श्रीकृष्ण श्रीराधाके प्राणपति बने और चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु लक्ष्मीके। द्विभुज श्रीकृष्ण गोपों और गोपियोंसे आवृत हो गोलोकमें अत्यन्त शोभा पाने लगे और चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु भगवती लक्ष्मीसहित वैकुण्ठधामको चले गये। ये भगवान् श्रीविष्णु और भगवान् श्रीकृष्ण दोनों समस्त अंशोंमें एक समान ही हैं।
भगवती श्रीमहालक्ष्मी योगबलसे नाना रूपोंमें विराजमान हुईं। वे सम्पूर्ण सौभाग्योंसे सम्पन्न होकर परम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा, परिपूर्णतमा 'महालक्ष्मी' के नामसे प्रसिद्ध हो वैकुण्ठधाममें निवास करने लगीं। प्रेमके कारण समस्त नारीसमुदायमें वे प्रधान हुईं। वे स्वर्गमें इन्द्रकी सम्पत्तिस्वरूपिणी होकर 'स्वर्गलक्ष्मी' के नामसे प्रसिद्ध हुईं। पातालमें तथा मर्त्यलोकमें राजाओंके यहाँ 'राजलक्ष्मी' हुईं। गृहस्थोंके यहाँ 'गृह-लक्ष्मी' के नामसे पूजित हुईं। अपने कलांशसे ये ही गृहिणी भी कहलाती हैं। वे गृहस्थोंके लिये सम्पत्स्वरूपा तथा सर्वमङ्गलमङ्गला हैं। गौओंकी जननी सुरभि तथा यज्ञपत्नी दक्षिणा भी वे ही हैं। क्षीरसागरके यहाँ उसकी कन्या हैं। कमलोंमें 'श्री' तथा चन्द्रमा और सूर्यमें 'शोभा' रूपसे उन्हींका निवास है। वे सूर्यमण्डलका अलंकार हैं। भूषण, रत्न, फल, जल, राजा, रानी, दिव्य नारी, गृह, सम्पूर्ण धान्य, वस्त्र, पवित्र स्थान, देवताओंकी प्रतिमा, मङ्गल-कलश, माणिक्य, मोतियोंकी सुन्दर मालाएँ, बहुमूल्य हीरे, चन्दन-वृक्षोंकी सुरम्य शाखा तथा नूतन मेघ—इन सभी वस्तुओंमें भगवती श्रीलक्ष्मीका अंश विद्यमान है।
मुने! सर्वप्रथम भगवान् नारायणने वैकुण्ठधाममें इन महालक्ष्मीकी पूजा की। दूसरी बार ब्रह्माजीने भक्तिपूर्वक इनका अर्चन किया। तीसरी बार भगवान् श्रीशिवने इनकी आराधना की। मुने! फिर भगवान् विष्णुने क्षीरसागरमें इनकी पूजा की। तदनन्तर स्वायम्भुव मनु, मानवेन्द्र, ऋषीश्वर, मुनीश्वर तथा साधु गृहस्थ—इन लोगोंने महालक्ष्मीकी उपासना की है। गन्धर्व और नाग आदिने पाताललोकमें इनका पूजन किया। भाद्रपदमासकी शुक्ल अष्टमीके सुअवसरपर ब्रह्माद्वारा ये सुपूजित हुईं। नारद! फिर भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें पूरे पक्षतक त्रिलोकीमें इनकी भक्तिपूर्वक पूजा होने लगी। चैत्र, पौष तथा भाद्रपदमासके पवित्र मङ्गलवारको भगवान् विष्णुने भक्तिपूर्वक तीनों लोकोंमें इनकी पूजाका महोत्सव चालू किया। वर्षके अन्तमें पौषकी संक्रान्तिके दिन मनुने अपने प्राङ्गणमें इनकी प्रतिमाका आवाहन करके इनकी पूजा की। तत्पश्चात् तीनों लोकोंमें वह पूजा प्रचलित हो गयी। राजेन्द्र! मङ्गल, केदार, नील, नल, सुबल, उत्तानपाद-पुत्र ध्रुव, इन्द्र, बलि, कश्यप, दक्ष, मनु, विवस्वान् (सूर्य), प्रियव्रत, चन्द्रमा, कुबेर, वायु, यम, अग्नि और वरुणने मङ्गलमयी देवीकी उपासना की। इस प्रकार ये भगवती महालक्ष्मी सर्वत्र सब लोगोंसे सदा सुपूजित हुई हैं। ये सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी अधिष्ठात्री देवी हैं। समस्त सम्पत्तियाँ इन्हींका स्वरूप हैं।
नारदजीने पूछा— भगवन्! श्रीमहालक्ष्मी भगवान् नारायणकी प्रिया होकर सदा वैकुण्ठमें विराजती हैं। उन सनातनीदेवीको वैकुण्ठकी अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। फिर वे देवी पृथ्वीपर सिन्धुकन्याके रूपमें कैसे प्रकट हुईं? उनका ध्यान, कवच और पूजनसम्बन्धी सम्पूर्ण विधान क्या है? पूर्वकालमें सबसे पहले उन महालक्ष्मीका स्तवन किसने किया था? इन सब बातोंका मेरे लिये विशद विवेचन कीजिये।
भगवान् नारायणने कहा— नारद! पूर्वसमयकी बात है। दुर्वासाके शापसे इन्द्र, देवसमुदाय तथा मर्त्यलोक—सभी श्रीहीन हो गये थे। रूठी हुई लक्ष्मी स्वर्ग आदिका त्याग करके
२९- भगवती लक्ष्मीका समुद्रसे प्रकट होना और इन्द्रके द्वारा महालक्ष्मीके ध्यान तथा स्तवन किये जाने और पुनः अधिकार प्राप्त किये जानेका वर्णन
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बड़े दुःखके साथ वैकुण्ठमें गयीं और महालक्ष्मीमें अपने-आपको विलीन कर दिया। उस समय सम्पूर्ण देवताओंके शोककी सीमा नहीं रही। वे परम दुःखी होकर भगवान् ब्रह्माकी सभामें गये। वहाँ पहुँचकर ब्रह्माजीको आगे करके वे सब वैकुण्ठमें गये। वहाँ भगवान् नारायण विराजमान थे। अत्यन्त दैन्यभाव प्रकट करते हुए देवताओंने उनकी शरण ग्रहण की। वस्तुतः देवता बहुत दुःखी थे। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे। तब पुराणपुरुष भगवान् श्रीहरिकी आज्ञा मानकर वे इन्द्रसम्पत्तिस्वरूपा लक्ष्मी अपनी कलासे समुद्रकी कन्या हुईं।
देवताओं और दैत्योंने मिलकर क्षीरसागरका मन्थन किया था। उससे महालक्ष्मीका प्रादुर्भाव हुआ। देवताओंने वहाँ उन्हें देखा और उनसे वर प्राप्त किया। देवता आदिको वर देकर उन प्रसन्नवदना देवीने क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुको वरमाला अर्पित की। नारद! उनकी कृपासे देवताओंको असुरोंके हाथमें गया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हो गया। देवता उनकी भलीभाँति पूजा और स्तुति करके सर्वत्र निरापद हो गये।
नारदजीने पूछा— ब्रह्मन्! ब्रह्मनिष्ठ और तत्त्वज्ञ मुनिवर दुर्वासाने कब, क्यों और किस अपराधके कारण इन्द्रको शाप दे दिया था? देवता आदिने किस रूपसे समुद्रका मन्थन किया? किस स्तोत्रसे प्रसन्न होकर देवीने इन्द्रको साक्षात् दर्शन दिये थे? प्रभो! किस प्रकार उन दोनोंका संवाद हुआ था? यह सब बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण कहते हैं— नारद! प्राचीन कालकी बात है। मुनिवर दुर्वासाजी वैकुण्ठसे कैलासके शिखरपर जा रहे थे। इन्द्रने उन्हें देखा। मुनिवरका शरीर ब्रह्मतेजसे प्रदीप्त हो रहा था। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सूर्यकी सहस्रों किरणोंसे सम्पन्न हों। उनकी अत्यन्त स्वच्छ जटाएँ तपाये हुए सुवर्णके समान चमक रही थीं। वे श्वेतवर्णका यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे तथा उनके हाथोंमें चीर, दण्ड और कमण्डलु शोभा पा रहे थे। उनके ललाटपर महान् उज्ज्वल तिलक चन्द्रमाके सदृश जान पड़ता था। वेद-वेदाङ्गके पारगामी असंख्य शिष्य उनके साथ विद्यमान थे। उन्हें देखकर इन्द्रने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। उनके शिष्योंको भी भक्तिपूर्वक प्रसन्नताके साथ इन्द्रने संतुष्ट किया। तब शिष्योंसहित मुनिवर दुर्वासाने इन्द्रको शुभ-आशीर्वाद दिया; साथ ही भगवान् विष्णुद्वारा प्राप्त परम मनोहर पारिजात-पुष्प भी उन्हें समर्पित किये। राज्यश्रीके गर्वमें गर्वित इन्द्रने जरा, मृत्यु एवं शोकका विनाश करनेवाले तथा मोक्षदायी उस पुष्पको लेकर अपने ऐरावत हाथीके मस्तकपर रख दिया। उस पुष्पका स्पर्श होते ही रूप, गुण, तेज और अवस्था—इन सबसे सम्पन्न होकर ऐरावत सहसा भगवान् विष्णुके समान हो गया। फिर तो इन्द्रको छोड़कर वह घोर वनमें चला गया। मुने! उस समय इन्द्र तेजसे युक्त उस ऐरावतपर शासन नहीं कर सके। इन्द्रने इस दिव्य पुष्पका परित्याग कर तिरस्कार किया है—यह जानकर मुनिवर दुर्वासाके रोषकी सीमा न रही। उन्होंने क्रोधमें भरकर शाप देते हुए कहा।
मुनिवर दुर्वासा बोले— अरे! राज्यश्रीके अभिमानमें प्रमत्त होकर तुम क्यों मेरा अपमान कर रहे हो? मैंने तुम्हें यह पारिजात-पुष्प दिया और तुमने गर्वके कारण स्वयं इसका उपयोग न करके हाथीके मस्तकपर रख दिया! नियम तो यह है कि श्रीविष्णुको समर्पित किये हुए नैवेद्य, फल अथवा जलके प्राप्त होते ही उनका उपभोग करना चाहिये। त्याग करनेसे ब्रह्महत्याके सदृश दोष लगता है। सौभाग्यवश प्राप्त हुए भगवान् विष्णुके पावन नैवेद्यका जो त्याग करता
•••• प्रकृतिखण्ड २२९
है, वह पुरुष श्री, बुद्धि और ज्ञानसे भ्रष्ट हो जाता है। भगवान् विष्णुके लिये अर्पित की हुई वस्तुको पाते ही उसे पा लेनेवाला बड़भागी पुरुष अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करके स्वयं मुक्त हो जाता है। जो पुरुष नैवेद्य भोजन करके निरन्तर भगवान् श्रीहरिकी भक्तिपूर्वक पूजा और स्तुति करता है, वह भगवान् विष्णुके समान हो जाता है। उसका स्पर्श करके चलनेवाली वायुका संयोग पाकर तीर्थोंका समूह पवित्र हो जाता है। उसकी चरणरज लगते ही पृथ्वी पवित्र हो जाती है। श्रीहरिको भोग न लगाया हुआ अन्न मांसके समान अभक्ष्य है। शिव-लिङ्गके लिये अर्पण किया हुआ अन्न तथा शूद्रयाजी, चिकित्सक, देवल, कन्याविक्रयी और योनि-जीविका अन्न, ठंडा, बासी, सबके भोजन करनेपर बचा हुआ अन्न, शूद्रापति एवं वृषवाही, अदीक्षित, शवदाही, अगम्यागामी, मित्रद्रोही, विश्वासघाती, कृतघ्न तथा झूठी गवाही देनेवाले ब्राह्मणोंका अन्न अत्यन्त दूषित समझा जाता है; परंतु ये सब भी भगवान् विष्णुको अर्पण करके भोजन करनेसे शुद्ध हो जाते हैं। यदि चाण्डाल भी भगवान् विष्णुकी उपासना करता है तो वह करोड़ों वंशजोंका उद्धार कर सकता है। श्रीहरिकी भक्तिसे विमुख मानव स्वयं अपनी भी रक्षा नहीं कर सकता। यदि अज्ञानमें भी भगवान् विष्णुको समर्पित नैवेद्य ग्रहण कर लिया जाय तो वह पुरुष अपने सात जन्मोंके उपार्जित पापोंसे मुक्त हो जाता है। जान-बूझकर भक्तिपूर्वक जो श्रीहरिका प्रसाद ग्रहण करता है, उसके तो अनेक जन्मोंके पाप निश्चितरूपसे भस्म हो जाते हैं। इन्द्र ! तुमने जो अभिमानमें आकर भगवान्के प्रसादरूप पारिजातके पुष्पको हाथीके मस्तकपर रख दिया, इस अपराधके फलस्वरूप लक्ष्मी तुम्हें छोड़कर भगवान् श्रीहरिके समीप चली जाय। मैं भगवान् नारायणका भक्त हूँ। मुझे शिव तथा ब्रह्मासे भी किंचित् भी भय नहीं है। काल, मृत्यु और जरासे भी मैं नहीं डरता, फिर दूसरोंकी तो गिनती ही क्या है? तुम्हारे पिता प्रजापति कश्यप भी मेरा क्या करेंगे? देवराज ! तुम्हारे गुरु बृहस्पति भी मुझ निःशङ्क पुरुषका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। देखो, यह पुष्प जिसके मस्तकपर है, उसीकी पूजा श्रेष्ठ मानी जाती है। शिवके पुत्रका मस्तक कट जानेपर उसके पुनरुज्जीवनके लिये यही मस्तक (हाथीका सिर) जोड़ा जायगा।
मुनिवर दुर्वासाके ये वचन सुनकर देवराज इन्द्रने उनके चरण पकड़ लिये। भयके कारण उनके मनमें घबराहट छा गयी। शोकातुर होकर उच्च स्वरसे रोते हुए वे मुनिसे कहने लगे।
इन्द्रने कहा- प्रभो ! आपने मुझ मतवालेको यह शाप देकर बहुत ही उचित किया है। यदि आपने मेरी सम्पत्ति हर ली तो अब आप मुझे कुछ ज्ञानोपदेश करनेकी कृपा कीजिये। ऐश्वर्य तो विपत्तियोंका बीज है। उससे ज्ञान ढक जाता है। इसीसे इसको मुक्तिमार्गकी अर्गला कहा जाता है। इसके कारण हरि-भक्तिमें पद-पदपर बाधा उपस्थित हुआ करती है। सम्पत्ति जन्म, मृत्यु, जरा, रोग, शोक और दुःखके बीजका उत्तम अङ्कुर है। धनरूपी रतौंधीसे अन्धा हुआ मानव मुक्तिके मार्गको नहीं देख सकता।* जो सम्पत्तिसे प्रमत्त हो गया है, उसे मदिरासे मत्त हुआ समझना चाहिये। उसे बान्धवजन घेरे रहते हैं; परंतु वह बन्धुजनोंसे द्वेष रखता है। वैभवमत्त, विषयान्ध, विह्वल, महाकामी और राजसिक व्यक्तिमें सत्त्वमार्गका अवलोकन करनेकी योग्यता नहीं रह जाती।
* ऐश्वर्यं विपदां बीजं प्रच्छन्नज्ञानकारणम्। मुक्तिमार्गार्गलं दाढ्यं हरिभक्तिव्यवाय कम् ॥
जन्ममृत्युजरारोगशोकदुःखाङ्कुरं परम्। सम्पत्तितिमिरान्धं च मुक्तिमार्गं न पश्यति ॥
(प्रकृतिखण्ड ३६। ४८-४९)
२३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण विषयान्ध दो प्रकारके बताये गये हैं - राजस और बात है कि तुम अभीष्ट (मोक्ष)- मार्गका साक्षात्कार तामस । जिसमें शास्त्रका ज्ञान नहीं है, वह तामस करना चाहते हो। यह पहले तो दुःखका कारण कहलाता है और शास्त्रज्ञ राजस । मुनिश्रेष्ठ ! शास्त्र जान पड़ता है; परंतु परिणाममें सुख देनेवाला है। दो प्रकारके मार्ग दिखलाते हैं - एक प्रवृत्ति - बीज जीवको जो गर्भकी यातना तथा मृत्युकष्ट सहन और दूसरा निवृत्ति-बीज। पहला जो प्रवृत्तिमार्ग करने पड़ते हैं, उन सबका खण्डन करनेवाला यह है, वह दुःखका रास्ता है, परंतु जीव क्लेशमें ही ज्ञान बताया जा रहा है। जिससे पार पाना कठिन सुख मानकर पहले उसीपर चलते हैं। वह मार्ग है, उस दुर्वार एवं असार संसार-पारावारसे उद्धार स्वच्छन्द, प्रसन्नतापूर्ण, विरोधशून्य एवं आपात- करनेवाला यह ज्ञान ही है। इससे कर्मरूपी वृक्षके मधुर होनेपर भी परिणाममें नाशका बीज तथा अङ्कुरका उच्छेद हो जाता है। यह सबका उद्धार जन्म-मृत्यु और जराके चक्करमें डालनेवाला है। करनेवाला है। ज्ञानका यह मार्ग सब मार्गोंसे श्रेष्ठ जीव अनेक जन्मोंतक अपने विहित कर्मके है। इससे संतोष और संततिकी प्राप्ति होती है। परिणामस्वरूप नाना प्रकारकी योनियोंमें क्रमशः दान, तप, व्रत और उपवास आदि कर्मसे भ्रमण करनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे जीवधारियोंको स्वर्गभोग आदि सुखकी उपलब्धि मानव होकर सत्सङ्गका सुअवसर प्राप्त करता है। होती है। पहलेके सकाम कर्मोंका यत्नपूर्वक सैकड़ों और सहस्रों पुरुषोंमें कोई विरला ही मूलोच्छेद करके यह ज्ञान मोक्षका बीज वपन साधुपुरुष भवसागरसे पार उतारनेमें कारण बनता करता है। संकल्पका अभाव ही मोक्षका बीज है। है। साधुपुरुष सत्त्वगुणके प्रकाशसे मुक्तिमार्गका मनुष्य जो भी सात्त्विक कर्म करे, उसे कामना या दर्शन कराता है। तब जीवके हृदयमें बन्धनको संकल्पसे शून्य ही रखे। समस्त कर्मोंको श्रीकृष्णके तोड़नेके लिये यत्न करनेकी भावना उत्पन्न होती चरणोंमें समर्पित करके ज्ञानी पुरुष परब्रह्म है। जब अनेक जन्मोंके पुण्य एवं तपस्या और परमात्मामें लीन हो जाता है। संसारी पुरुषोंके उपवास सहायक होते हैं तब प्राणीको निर्विघ्न लिये इस गतिको निर्वाण- मोक्ष कहा गया है। और परम सुखद मुक्तिमार्गकी उपलब्धि होती है। परंतु वैष्णव पुरुष भगवत्सेवासे विरह होनेके यह बात मैंने विभिन्न प्रसङ्गों और अवसरोंपर गुरु भयसे कातर हो इस निर्वाण-मुक्तिकी इच्छा (बृहस्पति) - जी के मुखसे सुनी है। अब विधाताने नहीं करते हैं। वे उत्तम देह धारण करके गोलोक इस विपत्तिके समय मुझे ज्ञानका समुद्र प्रदान अथवा वैकुण्ठधाममें उन्हीं परमात्माकी नित्य किया है। मेरा उद्धार करनेवाली यह विपत्ति सेवा करते हैं। इन्द्र ! वैष्णवजन भगवत्सेवारूप वास्तवमें सम्पत्तिरूपिणी है। ज्ञानसिन्धो ! दीनबन्धो ! मुक्तिकी ही अभिलाषा रखते हैं। वे जीवन्मुक्त हैं दयानिधे ! इस समय मुझ दीनको कुछ ऐसा और अपने समस्त कुलका उद्धार कर देते हैं। सारभूत ज्ञान दीजिये, जो मुझे भवसागरसे पार भगवान् विष्णुका स्मरण, कीर्तन, अर्चन, पादसेवन, कर दे। वन्दन, स्तवन, नित्य भक्तिभावसे उनके नैवेद्यका इन्द्रकी यह बात सुनकर ज्ञानियोंके गुरु भक्षण, चरणोदकका पान तथा उनके मन्त्रका सनातन मुनि दुर्वासा जोर-जोरसे हँस पड़े और जप - यही जीवके उद्धारका बीज है, जो सबके अत्यन्त संतुष्ट होकर इन्द्रको ज्ञानका उपदेश लिये अभीष्ट हो सकता है। यह मृत्युञ्जय-ज्ञान है, देने लगे। जिसे भगवान् मृत्युञ्जयने मुझे दिया था। मैं उनका मुनि बोले- अहो महेन्द्र ! यह बड़े मङ्गलकी शिष्य हूँ। इसलिये उन्हींके कृपा-प्रसादसे सर्वत्र