भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२२२ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सौगुना ऊँचा है। परंतु ज्ञानदाता गुरु मातासे भी सौगुना अधिक पूजनीय होता है।

**यम बोले—**बेटी! मैं पहले ही तुम्हें यह वर दे चुका हूँ कि तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट प्रश्न होगा, वह सब मैं बताऊँगा—तुम जो कुछ जानना चाहोगी, उसका ज्ञान कराऊँगा। अतः इस समय मेरे वरसे तुम्हें भगवान् श्रीकृष्णकी भक्ति प्राप्त हो। कल्याणि! तुम जो भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन सुनना चाहती हो, वह बहुत ही उत्तम है। यह प्रश्न प्रश्नकर्ताके, उत्तर देनेवालेके और श्रोताओंके कुलका भी उद्धार करनेवाला है। परंतु है यह बहुत कठिन। सहस्र मुखवाले शेष भी इसे कहनेमें असमर्थ हैं। मृत्युञ्जय भगवान् शंकर यदि अपने पाँच मुखोंसे कहने लगें तो वे भी पार नहीं पा सकते। ब्रह्माजी चारों वेदों तथा अखिल जगत्‌के स्रष्टा हैं। चार मुखोंसे उनकी परम शोभा होती है। भगवान् विष्णु सर्वज्ञ हैं, परंतु ये दोनों प्रधान देव भी श्रीकृष्णके गुणोंका सम्यक् प्रकारसे वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। स्वामी कार्तिकेय अपने छः मुखोंसे वर्णन करते रहें तो भी अन्त नहीं पा सकते। महाभाग गणेशजीको योगीन्द्रोंके गुरु-का-गुरु कहा जाता है; किंतु भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन कर पाना उनके लिये भी असम्भव है। सम्पूर्ण शास्त्रोंके सारतत्त्व चार वेद हैं। ये वेद तथा इनसे परिचित विद्वान् भी श्रीकृष्णके गुणोंकी एक कला भी जाननेमें असमर्थ सिद्ध हो जाते हैं। श्रीकृष्णकी महिमाके वर्णनमें साक्षात् सरस्वती भी जड़के समान होकर असमर्थता प्रकट करने लगती हैं। सनत्कुमार, धर्म, सनक, सनातन सनन्द, कपिल तथा सूर्य—ये तथा श्रीब्रह्माजीके अन्यान्य सुयोग्य पुत्र भी उनके महत्त्वका वर्णन करनेमें सफलता नहीं प्राप्त कर सके, तब फिर अन्य व्यक्तियोंसे क्या आशा की जा सकती है? श्रीकृष्णके जिन गुणोंकी व्याख्या सिद्ध, मुनीन्द्र तथा योगीन्द्र भी नहीं कर सकते, उनका वर्णन अन्य पुरुष कैसे कर सकते हैं? तथा मैं ही कैसे कर सकता हूँ?

ब्रह्मा, विष्णु और शिव प्रभृति देवता जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते हैं, वे भक्तोंके लिये जितने सुगम हैं, उतने ही भक्तहीन जनोंके लिये दुर्लभ भी हैं। श्रीकृष्णका गुणानुवाद परम पवित्र है। कुछ लोग किंचिन्मात्र उसे जानते हैं। परम ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मा तथा उनके पुत्र आदि अधिक परिचित हैं। ज्ञानियोंके गुरु गणेशजी उनसे भी अधिक जानते हैं। सबसे अधिक सर्वज्ञ भगवान् शंकर ही जानते हैं; क्योंकि परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णने पूर्वकालमें इनको ज्ञान प्रदान किया था। गोलोकके अत्यन्त निर्जन रमणीय रासमण्डलमें श्रीकृष्णने जो शिवको अपने गुणोंके कीर्तनका महत्त्व बताया था, उसका स्वयं शिवजीने अपनी पुरीमें धर्मके प्रति उपदेश किया था। महाभाग सूर्यके पूछनेपर धर्मने पुष्करमें उनके सामने इसकी व्याख्या की थी। साध्वि! मेरे पिता भगवान् सूर्यने तपस्याद्वारा धर्मकी आराधना करके मुझे प्राप्त किया था। सुव्रते! पूर्व समयमें मेरे पिताजी यत्नपूर्वक मुझे यमपुरीका राज्य दे रहे थे; किंतु मैं लेना नहीं चाहता था। वैराग्य हो जानेके कारण मेरे मनमें तपस्या करनेकी बात आती थी। तब पिताजीने मेरे सामने भगवान्‌के गुणोंका जो वर्णन किया था, वह अत्यन्त दुर्गम है। मैं आगमके अनुसार उसे कुछ कहता हूँ, सुनो।

वरानने! श्रीकृष्णके इतने अमित गुण हैं कि उन्हें वे स्वयं ही पूरा नहीं जानते; तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है? जैसे आकाश स्वयं ही अपना अन्त नहीं जानता, उसी तरह भगवान् भी अपने गुणोंका अन्त नहीं जानते। भगवान् सबके अन्तरात्मा एवं सम्पूर्ण कारणोंके कारण हैं; वे सर्वेश्वर, सर्वाद्य, सर्ववित् और सर्वरूपधारी हैं, वे नित्यस्वरूप, नित्यविग्रह, नित्यानन्द, निराकार, निरङ्कुश,