ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २२१
जाते हैं तथा जो तीस धनुष-जितना परिमाणमें है और जिसकी गहराई सौ पोरसा है एवं जो सदा अन्धकारसे आच्छन्न रहता है, उन पापियोंके लिये अतिशय दुःखप्रद नरकको 'शोषणकुण्ड' कहते हैं। विविध धर्मसम्बन्धी कषाय जलसे जो लबालब भरा रहता है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई सौ धनुष है और जहाँ सदा दुर्गन्ध फैली रहती है तथा जहाँ उस अमेध्य वस्तुके आहारपर ही रहकर पापी जीव यातना भोगते हैं, वह नरक 'कषकुण्ड' कहलाता है। साध्वि ! जिस कुण्डका आकार शूर्पके सदृश है तथा जो बारह धनुषके बराबर लंबा-चौड़ा है एवं जहाँ सर्वत्र संतप्त बालुका बिछी रहती है और पातकियोंसे कोई स्थल खाली नहीं रहता, उस नरकको 'शूर्पकुण्ड' कहते हैं। वहाँ सदा दुर्गन्ध भरी रहती है। वही खाकर पापी जीव वहाँ यातना भोगते हैं। पतिव्रते ! जहाँकी रेणुका अत्यन्त संतप्त रहती है तथा जो घोर पापी जीवोंसे युक्त रहता है एवं जिसके भीतर आगकी लपटें उठा करती हैं, ऐसी ज्वालासे भरे हुए मुखवाले नरकको 'ज्वालामुखकुण्ड' कहा जाता है। वह बीस धनुषमें विस्तृत है। ज्वालासे दग्ध पापी उसके कोने-कोनेमें भरे रहते हैं। उस कुण्डमें प्राणियोंको असीम कष्ट भोगना पड़ता है।
जहाँ गिरते ही मानव मूर्च्छित हो जाता है तथा जिसके भीतरकी ईंटें अत्यन्त संतप्त रहती हैं एवं जो आधी बावड़ी-जितना परिमाणवाला है, वह 'जिम्भकुण्ड' कहलाता है। जो धूममय अन्धकारसे संयुक्त रहता है तथा जहाँ गये हुए पापी धूमोंके कारण नेत्रहीन हो जाते हैं और जिसमें साँस लेनेके लिये बहुत-से छिद्र बने हैं, उस नरकको 'धूम्प्रान्धकुण्ड' कहा गया है। वह सौ धनुषके बराबर परिमाणमें है। जहाँ जानेपर पापीको तुरंत नाग बाँध लेते हैं तथा जो सौ धनुष-जितना लंबा-चौड़ा है और जिसमें सदा नाग भरे रहते हैं, उसे 'नागवेष्टनकुण्ड' कहा गया है। इन सभी कुण्डोंमें मेरे दूत प्राणियोंको मारते, जलाते तथा भाँति-भाँतिसे भयानक कष्ट देते रहते हैं।
सावित्री ! सुनो, मैंने ये छियासी नरककुण्ड और इनके लक्षण भी बतला दिये। अब फिर तुम क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ३२-३३)
भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूप, महत्त्व और गुणोंकी अनिर्वचनीयता
सावित्रीने कहा—देव ! अब आप मुझे सारभूत एवं परम दुर्लभ हरिभक्तिका उपदेश दीजिये। अन्य सब बातें मैंने आपसे सुन ली हैं। इस समय और किसी विषयको सुनना शेष नहीं है। अब तो मुझे भगवान् श्रीकृष्णके गुण-कीर्तनरूप कुछ धर्मकी बात बताइये। वही लाखों मनुष्योंके उद्धारका बीज है। वही नरकके समुद्रसे पार उतारनेवाला है। श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन मुक्तिके सारभूत तत्त्वकी प्राप्तिका कारण तथा समस्त अमङ्गलोंका निवारण करनेवाला है। वह कर्ममय वृक्षोंको उखाड़ फेंकनेवाला तथा किये हुए पापसमूहोंको हरनेवाला है। प्रभो! मुक्तियाँ कितने प्रकारकी हैं? उनके लक्षण क्या हैं? हरिभक्तिका स्वरूप क्या है? उसके भेद कितने हैं? तथा निषेकका भी क्या लक्षण है? वह सारभूत तत्त्वज्ञान क्या है? यह आप बताइये। अपना सर्वस्व दान कर देना, उपवास-व्रत करना, तीर्थोंमें नहाना, व्रत रखना और तप करना—ये सब-के-सब ज्ञानहीनको ज्ञान देनेसे जो पुण्य होता है, उसकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते। भगवन् ! यह निश्चय है कि गौरवकी दृष्टिसे पिताकी अपेक्षा माताका स्थान