ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
कुम्भीपाकके अन्तर्गत जो नरककुण्ड हैं, वे उससे कहीं चौगुने कष्टप्रद हैं। सुदीर्घ कालतक मार पड़नेपर भी यातना भोगनेवाले उन शरीरोंका अन्त नहीं होता। कुम्भीपाकको सम्पूर्ण नरक-कुण्डोंमें प्रधान बताया गया है। कालनिर्मित सुदृढ़ सूत्रसे बँधे हुए पापी जीव जहाँ निवास करते हैं, उसे ‘कालसूत्र’ नामक नरककुण्ड कहा गया है। मेरे दूतोंके प्रयाससे प्राणी कभी ऊपर उठते हैं और कभी डूब जाते हैं। बहुत देरतक उनकी साँस बंद हो जाती है। वे अचेत-से हो जाते हैं। साध्वि ! उसका जल सदा खौलता रहता है। नरकभोगी प्राणियोंके लिये वह बड़ा ही कष्टप्रद है। ‘अवटकुण्ड’ और ‘मत्स्योदकुण्ड’ एक ही है। ‘अवट’ संज्ञक एक कूप है। अतः कोई उसे अवटकुण्ड कहा करते हैं। संतप्त जलसे वह परिपूर्ण रहता है। चौबीस धनुष-जितना वह लंबा-चौड़ा है। जलते हुए शरीरवाले घोर पापी जीव उसमें निरन्तर व्याप्त रहते हैं। मेरे दूतोंकी कठिन मार उन्हें सहनी पड़ती है। उस कुण्डकी ‘अवटोद’ संज्ञा है। उसके जलका स्पर्श होते ही सम्पूर्ण व्याधियाँ पापियोंको अनायास घेर लेती हैं। उसकी गहराई सौ धनुष है। जिसमें पड़े हुए प्राणियोंको अरुन्तुद नामक कीड़े काटते रहते हैं, उसे ‘अरुन्तुदकुण्ड’ कहा जाता है। दुःखी जीव सदा हाहाकार मचाया करते हैं। अत्यन्त तपी हुई धूलोंसे व्याप्त नरकको ‘पांशुकुण्ड’ कहते हैं। वह सौ धनुष-जितना विस्तृत है। उसमें पड़े नारकी जीवोंके चमड़े जलते रहते हैं। खानेके लिये उसे जलती हुई धूल ही उपलब्ध होती है। जिसमें गिरते ही पापी पाशोंसे आवेष्टित हो जाता है, उसे विज्ञ पुरुषोंने ‘पाशवेष्टनकुण्ड’ कहा है। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक कोस है। जहाँ पापी ज्यों ही गिरते हैं, त्यों ही शूलसे जकड़ उठते हैं, उसे ‘शूलप्रोतकुण्ड’ कहा जाता है। उसका परिमाण बीस धनुष है। ‘प्रकम्पनकुण्ड’ आधे कोसके विस्तारमें है। उसका जल बर्फके समान गलता रहता है। उसमें पड़ते ही प्राणियोंके शरीरमें कँपकँपी मच जाती है। जिसमें पापियोंके मुखोंमें जलती हुई लुआठी घुसा दी जाती है, उसे ‘उल्कामुखकुण्ड’ कहा गया है। वह भी बीस धनुष-जितना लम्बा-चौड़ा है।
जिसकी गहराई लाख पोरसा है तथा सौ धनुष-जितना जो विस्तृत है, उस भयानक कुण्डको ‘अन्धकूप नरक’ कहते हैं। उसमें नाना प्रकारकी आकृतिवाले कीड़े रहते हैं। वह सदा अन्धकारसे व्याप्त रहता है। कूपके समान उसकी गोलाई है। कीड़ोंके काटनेपर प्राणी आतुर होकर परस्पर एक-दूसरेको चबाने लगते हैं। उन्हें खौलता हुआ जल ही पीनेको मिलता है। एक तो वे खौलते हुए जलसे जलते हैं, दूसरे कीड़े भी काटते रहते हैं। वहाँ इतना अन्धकार रहता है कि वे आँखोंसे कुछ भी देख नहीं सकते।
जहाँ जानेपर पापी अनेक प्रकारसे शस्त्रोंसे बिंध जाते हैं, वह ‘वेधनकुण्ड’ कहलाता है। उसकी लंबाई-चौड़ाई बीस धनुष है। जहाँ डंडोंसे मारा जाता है, उस सोलह धनुषके प्रमाणवाले नरकको ‘दण्डताडनकुण्ड’ कहते हैं। जहाँ जाते ही पापी जीव मछलियोंकी भाँति महाजालमें फँस जाते हैं तथा जो बीस धनुष-जितना विस्तृत है, वह ‘जालरन्ध्रकुण्ड’ कहलाता है। जहाँ गिरे हुए पापियोंके शरीर चूर्ण-चूर्ण हो जाते हैं, वह नरक ‘देहचूर्णकुण्ड’ नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ गये हुए पापियोंके पैरमें लोहेकी बेड़ी पड़ी रहती है। असंख्य पोरसा वह गहरा है। लंबाई और चौड़ाई बीस धनुष है। प्रकाशका तो वहाँ कहीं नाम ही नहीं रहता। उसमें प्राणी मूर्च्छित होकर जड़की भाँति पड़े रहते हैं। जहाँ गये पापी मेरे दूतोंद्वारा दलित और ताड़ित होते रहते हैं, उसको ‘दलनकुण्ड’ कहा गया है। वह सोलह धनुषके विस्तारमें है।
तपी हुई बालूसे व्याप्त होनेके कारण जहाँ गिरते ही पापीके कण्ठ, ओठ और तालू सूख