ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड
'ज्वालाकुण्ड' है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई एक कोस है। उस कष्टदायी कुण्डमें पातकी प्राणी निरन्तर चिल्लाते रहते हैं। एक कोस गहराईवाला 'भस्मकुण्ड' है जिसमें सर्वत्र प्रतप्त भस्म ही भरा रहता है। जलते हुए भस्मको खानेके कारण वहाँके पातकी जीवोंके अङ्गोंमें दाह-सा होता रहता है।
जो तपे हुए लौहसे परिपूर्ण तथा जले हुए गात्रवाले पापियोंसे युक्त नरक है, उसे 'दग्धकुण्ड' कहा गया है। वह अत्यन्त भयंकर गहरा कुण्ड एक कोसके परिमाणमें है। वहाँ सर्वत्र अन्धकार छाया रहता है। ज्वालाके कारण पापियोंके तालु सूखे रहते हैं। 'तप्तसूर्मिकुण्ड' नरक अत्यन्त भयानक है, जो बहुसंख्यक ऊर्मियों, संतप्त क्षार-जलों, नाना प्रकारके शब्द करनेवाले जल-जन्तुओंसे युक्त है। जिसकी चौड़ाई चार कोस है; ऐसे गहरे और अन्धकारयुक्त नरकको 'प्रतप्तसूचीकुण्ड' कहते हैं। उस भयानक कुण्डमें दग्ध होनेके कारण आर्तनाद करते हुए प्राणी एक-दूसरेको नहीं देख पाते। जिसमें तलवारकी धारके समान तीखे पत्तेवाले बहुत-से ऊँचे-ऊँचे ताड़के वृक्ष हैं, उस नरकको 'असिपत्रकुण्ड' कहा गया है। उस नरकके ये ताड़वृक्ष आधे कोसकी लंबाईतक ऊपरको फैले हुए हैं और उन्हीं वृक्षोंपरसे वहाँके पापियोंको गिराया जाता है। उन वृक्षोंके सिरसे गिराये गये पापियोंके रक्तोंसे वह कुण्ड भरा रहता है। उन पापियोंके मुखसे 'रक्षा करो' की चीख निकलती रहती है। वह भयानक कुण्ड अत्यन्त गहरा, अन्धकारसे आच्छन्न तथा रक्तके कीड़ोंसे परिपूरित है। जो सौ धनुष-जितना लंबा-चौड़ा तथा छुरेकी धारके समान अस्त्रोंसे युक्त है, उस भयानक नरकको 'क्षुरधारकुण्ड' कहते हैं। पापियोंके रक्तसे वह कभी खाली नहीं हो पाता। जिसमें सूईके समान नोकवाले अस्त्र भरे रहते हैं तथा जो पापियोंके रक्तसे सदा परिपूर्ण रहता है, पचास धनुष-जितना लंबा-चौड़ा वह नरक 'सूचीमुख' कहलाता है। वहाँ नारकी प्राणी अत्यन्त कष्ट भोगते हैं। किसी एक जन्तुविशेषका नाम गोधा है; उसके मुखके समान जिसकी आकृति है, उसका नाम 'गोधामुखकुण्ड' है। उसकी गहराई कुएँके समान है और उसका प्रमाण बीस धनुष है। वह नरक घोर पापियोंके लिये अत्यन्त कष्टप्रद है। उन गोधासंज्ञक कीड़ोंके काटनेसे नारकी जीवोंका मुख सदा नीचेको लटकता रहता है। नाक (जलजन्तुविशेष)-के मुखके समान जिसकी आकृति है, उसे 'नक्रकुण्ड' कहते हैं। वह सोलह धनुषके विस्तारमें स्थित है। उसकी गहराई कुएँ-जितनी है। उस कुण्डमें सदा पापी भरे रहते हैं। 'गजदंशकुण्ड' को सौ धनुष लंबा-चौड़ा बतलाया गया है। तीस धनुष-जितना विस्तृत तथा गौके मुखकी आकृतिवाला एवं पापियोंके लिये अत्यन्त दुःखद जो नरक है, उसे 'गोमुखकुण्ड' कहा गया है। कालचक्रसे युक्त सदा चक्कर काटनेवाला भयानक नरक, जिसकी आकृति घड़ेके समान है, 'कुम्भीपाक' कहलाता है। चार कोसके परिमाणवाला वह नरक महान् अन्धकारमय है। साध्वि! उसकी गहराई एक लाख पोरसा* है। उस कुण्डके अन्तर्गत तप्ततैल एवं ताम्रकुण्ड आदि बहुसंख्यक कुण्ड हैं। उस नरकमें बड़े-बड़े पापी अचेत होकर पड़े रहते हैं। भयंकर कीड़ोंके काटनेपर चिल्लाते हुए नारकी जीव परस्पर एक-दूसरेको देखनेमें असमर्थ रहते हैं। उन्हें क्षण-क्षणमें मूर्च्छा आती है और वे पृथ्वीपर लोट-पोट हो जाते हैं। पतिव्रते! उन सभी कुण्डोंमें जितने पापी पड़े हुए हैं, उन सबकी ऐसी ही दुर्दशा है। मेरे दूतोंकी मार पड़नेपर वे क्षणमें गिरते और क्षणभरमें चिल्लाहट मचाने लगते हैं।
* पुरुषकी लंबाईको 'पोरसा' कहते हैं।