ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
वदनवाले उन कीड़ोंके दाँत बड़े तेज होते हैं। वहाँ सर्वत्र अन्धकार फैला है। 'पूयकुण्ड' को चार कोस लंबा-चौड़ा बताया जाता है। पूयभक्षी प्राणी उसमें निवास करते हैं। तालके वृक्ष-जितना गहरा तथा असंख्य सर्पोंसे युक्त 'सर्पकुण्ड' है। वह दो कोस लंबा और बर्फीले जलसे पूर्ण होता है। साँप पापियोंके शरीरसे लिपटकर उन्हें काटते रहते हैं। मशक आदि क्रूर जन्तुओंसे पूर्ण 'मशकुण्ड', 'दंशकुण्ड' और 'गोलकुण्ड'—ये तीन नरक हैं। महान् पापियोंसे युक्त उन नरकोंकी सीमा आधे-आधे कोसकी है। जिनके हाथ बँधे रहते हैं, रुधिरसे सर्वाङ्ग लाल रहता है तथा जो मेरे दूतोंसे घायल रहते हैं, उन प्राणियोंद्वारा वहाँ हाहाकार मचा रहता है। वज्र और बिच्छुओंसे ओत-प्रोत 'वज्रदंष्ट्रकुण्ड' और 'वृश्चिककुण्ड' हैं। आधी बावड़ीके प्रमाणवाले उन नरकोंमें वज्र एवं बिच्छुओंसे विद्ध प्राणी भरे रहते हैं। 'शरकुण्ड', 'शूलकुण्ड' और 'खड्गकुण्ड'—ये तीनों आयुधोंसे व्याप्त हैं। उन नरकोंमें पड़े प्राणियोंका शरीर शस्त्रास्त्रोंसे छिदता रहता है। रक्तकी धारा बहने लगती है, जिससे वे लाल प्रतीत होते हैं। उन नरकोंका प्रमाण आधी बावड़ी है। संतस कीचड़से पूर्ण तथा अन्धकारमय 'गोलकुण्ड' है। टेढ़े-मेढ़े काँटोंकी-सी आकृतिवाले कीड़े यहाँके पापियोंको काटते हैं। उस नरकका विस्तार आधी बावड़ी है। कीड़ोंके काटने तथा मेरे दूतोंके मारनेपर भयसे घबराये हुए प्राणी रोते रहते हैं। पापियोंका झुंड कोसोंतक फैला रहता है। अत्यन्त दुर्गन्धसे युक्त तथा पापियोंको निरन्तर दुःख देनेवाला 'नक्रकुण्ड' है। वहाँ विकृत आकारवाले भयंकर नक्र आदि जन्तु उन्हें काटते रहते हैं। उस नरककी लंबाई-चौड़ाई आधी बावड़ीके परिमाणमें है। विष्ठा, मूत्र और श्लेष्मभक्षी असंख्य पापियों एवं कौओंसे भरा हुआ एक कुण्ड है। उसमें विशाल तथा विकृत आकारवाले भयंकर असंख्य कौए पापियोंको नोचते रहते हैं। 'सञ्चानकुण्ड' और 'बाजकुण्ड' इन्हीं दोनों वस्तुओं (पक्षियों)-से ओत-प्रोत हैं। इन कुण्डोंका परिमाण सौ धनुष है। उन भयानक पक्षियोंसे काटे हुए प्राणी सदा चीत्कार मचाया करते हैं। पापी जीवोंसे व्याप्त तथा सौ धनुष विस्तृत 'वज्रकुण्ड' है। वज्रके समान दाँतवाले भयंकर जन्तु उसमें रहते हैं। वहाँ सर्वत्र घोर अन्धकार छाया रहता है। दो वापी-जितना लंबा-चौड़ा 'तप्तपाषाणकुण्ड' है। उसका आकार ऐसा है मानो आग धधक रही हो। पापी प्राणी संतस होकर इधर-उधर भागते रहते हैं। छुरेकी धारके समान तीखे पाषाणोंसे बना हुआ 'तीक्ष्ण पाषाणकुण्ड' है। महान् पापी उसमें वास करते हैं। रक्तसे लथपथ हुए प्राणियोंसे भरा हुआ 'लालाकुण्ड' है। वह कुण्ड एक कोस नीचेतक गहरा है। मेरे दूतोंसे संतस प्राणी उसमें खचाखच भरे रहते हैं। कज्जल वर्णवाले संतस पत्थरोंसे निर्मित तथा सौ धनुष परिमाणवाला 'मसीकुण्ड' है। पापियोंसे वह कुण्ड पूरित रहता है। तपे हुए बालूसे भरपूर एक कोस विस्तारवाला 'चूर्णकुण्ड' है। उसमें प्रतप्त बालुकासे दग्ध प्राणी निवास करते हैं। कुम्हारके चक्रकी भाँति निरन्तर घूमता हुआ 'चक्रकुण्ड' है। उसमें अत्यन्त तीक्ष्ण धारवाले सोलह अरे लगे हुए हैं, जिनसे वहाँके पापियोंके अङ्ग सदा क्षत-विक्षत होते रहते हैं। उस कुण्डका आकार अत्यन्त टेढ़ी-मेढ़ी कन्दराके समान है तथा वह पर्याप्त गहरा है। उसकी लंबाई-चौड़ाई चार कोस है। उसमें खौलता हुआ जल भरा रहता है। वहाँके घोर पापियोंको जलचर-जन्तु काटते-खाते हैं। उस अन्धकारमय भयानक कुण्डमें संतस प्राणियोंद्वारा करुण-क्रन्दन होता रहता है। विकृत आकारवाले अत्यन्त भयंकर असंख्य कछुओंसे भरा हुआ 'कूर्मकुण्ड' है। जलमें रहनेवाले कछुए नारकी जीवोंको नोचते-खाते रहते हैं। प्रज्वलित ज्वालाओंसे व्याप्त