ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २१७
उसमें व्याप्त रहते हैं। एक कोसकी लम्बाई-चौड़ाईवाला 'शुक्रकुण्ड' है। वीर्यके कीड़ोंसे वह व्याप्त रहता है। उसमें रहनेवाले पापियोंको जब कीड़े काटते हैं, तब वे इधर-उधर भागते रहते हैं। बावड़ीके समान परिमाणवाला दुर्गन्धित वस्तुओंसे भरा हुआ 'रक्तकुण्ड' है। उस गहरे कुण्डमें रक्त पीनेवाले प्राणी तथा काटनेवाले कीड़े भरे रहते हैं। 'अश्रुकुण्ड' नेत्रोंके आँसुओंसे पूर्ण रहता है। अनेक पापीजन उसमें भरे रहते हैं। चार बावड़ी-जितना उसका विस्तार है। कीड़ोंके काटनेपर जीव उसमें रुदन करते रहते हैं। मनुष्योंके शारीरिक मलों तथा मलभक्षी पापी जीवोंसे युक्त 'गात्रमलकुण्ड' है। कीड़ोंके काटने तथा मेरे दूतोंके मारनेके कारण घबराये हुए जीव उसमें किसी प्रकार समय बिताते हैं। कानोंकी मैल खानेवाले पापियोंसे आच्छादित 'कर्णविट्कुण्ड' है। चार बावड़ी-जितने प्रमाणवाला वह कुण्ड कीटोंद्वारा काटे जानेवाले पापियोंके चीत्कारसे पूरित रहता है। मनुष्योंकी मज्जा तथा अत्यन्त दुर्गन्धसे युक्त 'मज्जाकुण्ड' है, जो महापापियोंसे युक्त एवं चार वापीके विस्तारवाला है। मेरे दूतोंसे प्रताड़ित प्राणियोंसे युक्त स्निग्ध मांसवाला 'मांसकुण्ड' है। एक वापी-जितने प्रमाणवाले इस कुण्डमें भयानक प्राणी भरे रहते हैं। कन्याका विक्रय करनेवाले पापी वहाँ रहकर कन्याका मांस भक्षण करते हैं। कीड़ोंके काटनेपर वे अत्यन्त भयभीत हो 'बचाओ-बचाओ' की पुकार करते रहते हैं। चार बावड़ी-जितने लंबे-चौड़े 'नखादि' चार कुण्ड हैं। ताम्रमय उल्कासे युक्त तथा जलते हुए ताँबेके सदृश 'प्रतप्तताम्रकुण्ड' है। ताँबेकी असंख्य प्रतप्त प्रतिमाएँ उसमें भरी रहती हैं। प्रत्येक प्रतिमासे पापियोंको सताया जाता है। तब वे चिल्ला उठते हैं। नारकी जीवोंसे भरा वह नरक दो कोस लंबा-चौड़ा है। प्रज्वलित लोहे तथा चमकते हुए अङ्गारोंसे युक्त 'प्रतप्तलौहकुण्ड' है। वह जलते हुए लौहकी लाखों प्रतिमाओंसे पूर्ण है। प्रत्येक प्रतिमासे पापियोंको सताया जाता है, तब वे चीत्कार कर उठते हैं। वहाँ निरन्तर जलते हुए वे पापी भयभीत होकर 'रक्षा करो, रक्षा करो' पुकारते रहते हैं। वह कुण्ड दो कोसमें विस्तृत तथा अत्यन्त भयानक है और वहाँ चारों ओर भयानक अन्धकार छाया रहता है। 'चर्मकुण्ड' और 'तप्तसुराकुण्ड' आधी बावड़ीके प्रमाणके ही हैं। चर्मभक्षण तथा सुरापान करनेवाले पापी जीव उसमें भरे रहते हैं।
शाल्मलिवृक्षके नीचे तीखे काँटोंसे भरा एक कुण्ड है। वह दुःखप्रद नरक एक कोसकी दूरीमें है। लाखों मनुष्य उसमें अँट सकते हैं। वहाँ चार-चार हाथके अत्यन्त तीखे काँटे शाल्मली वृक्षसे गिरकर बिछे रहते हैं। एक-एक करके सभी काँटोंसे घोर पापियोंके अङ्ग छिद उठते हैं। उन अत्यन्त व्यग्र पापियोंके तालू सूख जाते हैं, तब महान् भयभीत होकर 'मुझे जल दो'—यों चिल्लाने लगते हैं। तक्षक आदिके विषसमूहोंसे परिपूर्ण एक कोस लंबा-चौड़ा नरक है, जिसमें पापी मेरे दूतोंकी मार खाकर गिरते हैं और वह विष ही खानेको पाते हैं। 'प्रतप्ततैलकुण्ड' में सदा खौलता हुआ तेल भरा रहता है। जलनके कारण कीड़ेतक उसमें नहीं रहते; किंतु मेरे दूतोंकी चोट खाकर पापियोंको वहाँ रहना पड़ता है। जलता हुआ तैल ही उन्हें खाना पड़ता है।
जिनके आकार त्रिशूल-जैसे हैं तथा जिनकी धार अत्यन्त तीक्ष्ण है, उन लौहमय शस्त्रोंसे सम्पन्न 'शस्त्रकुण्ड' है। चार कोसमें विस्तृत वह नरक ऐसा जान पड़ता है, मानो शस्त्रोंकी शय्या हो। भालोंसे छिद जानेके कारण जिनके कण्ठ, ओठ और तालू सूख गये हैं, ऐसे पापी जीवोंसे उस नरकका कोना-कोना भरा रहता है। साध्वि ! जिसमें सर्प-जैसे बड़े-बड़े असंख्य भयंकर कीड़े रहते हैं, उसे 'कृमिकुण्ड' कहा जाता है। विकृत