ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २१६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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पतिव्रते! जो यमयातनामें नहीं पड़ते, उनका परिचय दिया गया। अब आगमके अनुसार देहका विवरण बता रहा हूँ, सुनो। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच तत्त्व स्रष्टाके सृष्टि-विधानमें देहधारियोंकी देहके बीज (उपादान कारण) हैं। पृथ्वी आदि पाँच भूतोंसे जो देह निर्मित होता है, वह कृत्रिम है। अतएव नश्वर है। इसीलिये वह यहीं भस्म हो जाता है। बँधी हुई मुट्ठीमें अँगूठेकी जितनी लम्बाई होती है, उतना ही बड़ा जो पुरुषाकार जीव है, वही कर्मोंके भोगके लिये सूक्ष्म 'यातनादेह' को धारण करता है। वह देह मेरे लोकमें नरककी प्रज्वलित आगमें डाली जानेपर भी जलकर भस्म नहीं होती। जलमें भी गलती नहीं है। दीर्घकालतक घातक प्रहार करनेपर भी उसका नाश नहीं होता है। अस्त्र, शस्त्र, तीखे कण्टक, खौलते हुए तेल या जल, तपाये हुए लौह, गरम पत्थर तथा तपाकर लाल की हुई लोहेकी प्रतिमासे स्पर्श होनेपर और ऊँचेसे नीचे गिरनेपर भी वह यातना-शरीर न तो दग्ध होता है, न टेढ़ा-मेढ़ा ही होता है। केवल संताप भोगता है (पर नष्ट नहीं होता)। देवि! आगमोंके कथनानुसार (जलने, कटने आदिका भीषण दुःख सहते हुए भी न मरनेवाले) यातना-देहका सारा वृत्तान्त तथा कारण बताया गया। अब मैं तुमसे नरक-कुण्डोंके लक्षण बता रहा हूँ; सुनो।
सतीशिरोमणे! सभी नरककुण्ड पूर्ण चन्द्रमण्डलकी भाँति गोलाकार हैं। वे गहरे भी बहुत हैं। उनमें अनेक प्रकारके पत्थर जड़े गये हैं। प्रलयकालतक उनका नाश नहीं होता। भगवान् श्रीहरिकी इच्छासे पापियोंको क्लेश देनेके लिये नानारूपोंमें उनका निर्माण हुआ है। जो प्रज्वलित अंगारस्वरूप है, जिसका विस्तार सब ओरसे एक-एक कोस है तथा जिसमें सौ हाथ ऊपरतक आगकी लपटें उठा करती हैं, उसे ‘अग्निकुण्ड’ कहा गया है। भयानक चीत्कार करनेवाले पापियोंसे वह सदा भरा रहता है। मेरे दूत उनपर प्रहार करते रहते हैं। वे निरन्तर उस नरककी रक्षा भी करते हैं। जो हिंसक जन्तुओंसे भरा-पूरा अत्यन्त घोर अन्धकारसे पूर्ण तथा आधे कोसतक विस्तृत है और जिसमें बहुत गरम जल भरा रहता है उसे ‘प्रतप्तोदककुण्ड’ कहते हैं। मेरे सेवकोंद्वारा कठिन प्रहार पड़नेपर नारकी जीव चिल्लाते रहते हैं। इसके बाद ‘तप्तक्षारोदकुण्ड’ है। वह खौलते हुए खारे जलसे भरा रहता है। एक कोस विस्तारवाला वह भयानक नरक पापियों तथा नाकोंसे भरपूर है। एक कोसके विस्तारमें ‘विण्मूत्रकुण्ड’ नामक नरक है। निराहार रहनेके कारण सूखे हुए कण्ठ, ओठ और तालुवाले पापी उसमें इधर-उधर भागते हैं। वह दारुण नरक विष्ठासे ही बना हुआ है। उसमें अत्यन्त दुर्गन्ध फैली रहती है। वहाँ कीड़ोंसे उनका सारा अङ्ग छिद जाता है। ‘मूत्रकुण्ड’ नामक नरक खौलते हुए मूत्र तथा मूत्रके कीड़ोंसे भलीभाँति भरा हुआ है। अत्यन्त पातकी जीवोंसे भरा हुआ वह नरक दो कोसके परिमाणमें है। वहाँके कीड़े जीवोंको खाते रहते हैं। उसमें पड़े पापियोंके कण्ठ, ओठ और तालु सूखे रहते हैं। श्लेष्म आदि अपवित्र वस्तुओं और उसके कीड़ों तथा श्लेष्मभोजी पापीजनोंसे भरा नरक ‘श्लेष्मकुण्ड’ कहा गया है। आधे कोसके परिमाणमें विषभक्षी पापियों तथा कीड़ोंसे भरा हुआ नरक ‘गरकुण्ड’ के नामसे कहा जाता है। सर्पके समान आकारवाले वज्रमय दाँतोंसे युक्त तथा क्षुधातुर सूखे कण्ठवाले अत्यन्त भयंकर जन्तुओंद्वारा वह नरक भरा रहता है। आँखोंके मलोंसे युक्त आधे कोसके विस्तारवाला ‘नेत्रमलकुण्ड’ है। कीड़ोंसे क्षत-विक्षत हुए पापी प्राणी निरन्तर उसमें चक्कर लगाते रहते हैं। वसासे पूर्ण चार कोसका लम्बा-चौड़ा ‘वसाकुण्ड’ है। वसाभोजी पातकी जीव