भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 225

प्रकृतिखण्ड २१५

पञ्चदेवोपासकोंके नरकमें न जानेका कथन तथा छियासी प्रकारके नरक-कुण्डोंका विशद परिचय

सावित्रीने कहा— महाभाग धर्मराज ! आप वेद एवं वेदाङ्गके पारगामी विद्वान् हैं। जो सबका सारभूत, अभीष्ट, सर्वसम्मत, कर्मका उच्छेद करनेमें कारणभूत, परम श्रेष्ठ, मनुष्योंके लिये सुखदायी, यशोवर्द्धक, धर्मप्रद तथा सबको सब प्रकारका मङ्गल प्रदान करनेवाला है, जिसके प्रभावसे सम्पूर्ण मानव जगत्‌को दुःख देनेवाली यमयातनाको नहीं प्राप्त होते, नरककुण्डोंको नहीं देखते और न उनमें पड़ते ही हैं; तथा जिससे जन्म आदि विकार नहीं प्राप्त होते, वह उत्तम कर्म क्या है? सुव्रत ! यह बतानेकी कृपा करें। साथ ही उन कुण्डोंके आकार कैसे हैं, वे किस प्रकार बने हैं तथा कौन-से पापी किस रूपसे उनमें वास करते हैं—यह मैं सुनना चाहती हूँ। देहके अग्निमें भस्म हो जानेके पश्चात् मानव किस देहसे लोकान्तरोंमें जाता और अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंके फल भोगता है ? अत्यन्त क्लेश पानेपर भी वह शरीर नष्ट क्यों नहीं हो जाता तथा वह शरीर भी कैसा है ? ये सभी बातें मुझे बतानेकी कृपा करें।

भगवान् नारायण कहते हैं— नारद ! सावित्रीके वचन सुनकर धर्मराजने भगवान् श्रीहरिको स्मरण करते हुए गुरुको नमस्कारकर पवित्र कथा आरम्भ की।

धर्मराज बोले— वत्से ! पतिव्रते ! सुव्रते ! चारों वेद, धर्मशास्त्र, संहिता, पुराण, इतिहास, पाञ्चरात्र प्रभृति धर्मग्रन्थ तथा अन्य धर्मशास्त्र एवं वेदाङ्ग—इन सबमें एक श्रीकृष्णकी मङ्गलमयी सेवाको ही सबके लिये अभीष्ट एवं सारभूत बतलाया गया है। इससे जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि तथा शोक-संताप नष्ट हो जाते हैं। यह साधन सर्वमङ्गलस्वरूप तथा परम आनन्दका कारण है। इससे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। यह नरकसे प्राणीका उद्धार करनेवाला है। भक्तिरूपी वृक्षमें अङ्कुर उत्पन्न करनेवाला तथा कर्मरूपी वृक्षको काटनेवाला है। गोलोकके मार्गपर अग्रसर होनेके लिये यह सोपान है। भगवान्‌के सालोक्य, सार्टि, सारूप्य और सामीप्य आदि मोक्षको तथा अविनाशी एवं शुभ पदको प्रदान करनेवाला है। शुभे ! श्रीकृष्णके किङ्कर नरककुण्ड, यमदूत तथा यमराजको स्वप्नमें भी नहीं देखते हैं।

जो एकादशीका व्रत तथा वैष्णवतीर्थमें स्नान करते हैं, एकादशीको अन्न नहीं खाते और भगवान् श्रीहरिको नित्य प्रणाम करते एवं उनकी प्रतिमाकी पूजा करते हैं, उन्हें भी मेरी भयंकर संयमनीपुरीमें नहीं जाना पड़ता। भगवान् श्रीकृष्णके भक्तोंसे मेरे दूत इस प्रकार डरते हैं, जैसे गरुड़से सर्प। मेरा दूत जब हाथमें पाश लेकर मर्त्यलोककी ओर जाता है, तब मैं चेतावनी देते हुए उससे कहता हूँ—‘दूत ! तुम भगवान् विष्णुके भक्तका आश्रम छोड़कर और सब जगह जा सकोगे।’ श्रीकृष्ण-मन्त्रके उपासकोंके नाम भी यमलोक-वासियोंको काट खाते हैं। चित्रगुप्त भयभीत-से हो दोनों हाथ जोड़कर उनका स्वागत करते हैं। ब्रह्माजी उनके लिये मधुपर्क आदि निवेदन करते हैं; क्योंकि वे ब्रह्मलोकको लाँघकर गोलोकमें जानेवाले होते हैं। उनके स्पर्शमात्रसे प्राणियोंके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे प्रज्वलित अग्निमें पड़कर तृण और काष्ठ भस्म हो जाते हैं। उन्हें देखकर मोह भी अत्यन्त भयभीत-सा होकर सम्मोहको प्राप्त होता है। काम, क्रोध, लोभ, मृत्यु, जरा, शोक, भय, काल, शुभाशुभ कर्म, हर्ष तथा भोग—ये सभी हरिभक्तोंको देखकर प्रभावशून्य हो जाते हैं।