भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 224
२१४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उल्कामुख नामक नरकमें जाती है। मेरे दूत उसके मुखमें उल्का (लूक) देते हैं और डंडोंसे उसके मस्तकपर प्रहार करते हैं। इसके बाद मनुष्ययोनिमें आकर वह विधवा तथा रोगिणी होती है। वेश्याको वेधन-कुण्डमें, युग्मीको दण्डताडनकुण्डमें, महावेश्याको जालबन्धकुण्डमें, कुलटाको देहचूर्णकुण्डमें, स्वैरिणीको दलनकुण्डमें तथा धृष्टाको शोषणकुण्डमें यातना भोगनेके लिये निवास करना पड़ता है। मेरे दूत उनपर प्रहार करते हैं। साध्वि ! ये पापिनी स्त्रियाँ विष्ठा-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुएँ खाकर निरन्तर कष्ट भोगती हैं।

जो पुरुष हाथमें तुलसी लेकर की हुई प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता अथवा झूठी शपथ खाता है, वह ज्वालामुख नामक नरकमें जाता है। हाथमें गङ्गाजल तथा शालग्रामकी प्रतिमा ले प्रतिज्ञा करके उसका पालन नहीं करनेवाला भी ज्वालामुख नरकका ही भागी होता है। जो दाहिना हाथ उठाकर प्रतिज्ञा करता, देवमन्दिरमें जाकर या गौ और ब्राह्मणको छूकर वचनबद्ध होता और फिर उसका पालन नहीं करता है, उसे भी ज्वालामुख नामक नरककी प्राप्ति होती है। मित्रद्रोही, कृतघ्न, विश्वासघाती तथा झूठी गवाही देनेवाला—ये सभी ज्वालामुख नरकमें स्थान पाते हैं। वहाँ उन्हें प्रतप्त अङ्गार खानेके लिये मिलते हैं और मेरे दूत उन्हें पीड़ा पहुँचाते रहते हैं। तुलसी छूकर झूठी शपथ खानेवाला सात जन्मोंतक चाण्डाल होता है। गङ्गाजल लेकर प्रतिज्ञा करके उसे न पालनेवाला पाँच जन्मोंतक म्लेच्छ होता है। देवि! शालग्रामका स्पर्श करके की हुई प्रतिज्ञाका पालन न करनेवाला सात जन्मोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। देवप्रतिमाको छूकर झूठी शपथ खानेवाला फोड़ेका कीड़ा होता है। खुले हाथों देनेकी झूठी प्रतिज्ञा करनेवाला सात जन्मोंतक सर्प होता है। इसके बाद बिना हाथका मानव होकर फिर शुद्ध होता है। देवमन्दिरमें असत्य बोलनेवाला सात जन्मोंतक देवल होता है। ब्राह्मण आदिके सम्मुख प्रतिज्ञा करके उसका पालन न करनेवाला अग्रदानी होता है। तदनन्तर तीन जन्मोंतक वह गूँगा और बहरा मानव होता है। मित्रसे द्रोह करनेवाला नेवला होता है। कृतघ्न गेंडा और विश्वासघाती व्याघ्र होता है। वक्तव्यमें जो झूठी गवाही देता है, वह भालू होता है। ये उपर्युक्त पापी मानव अपने आगे और पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंको नरकमें गिराते हैं। मूर्खताके कारण अपनी नित्यक्रियासे विहीन, वेदके वचनोंमें अनास्था रखकर निरन्तर कपटपूर्वक उनका उपहास करनेवाला तथा व्रत और उपवाससे रहित एवं उत्तम सद्वाक्यका निन्दक कुटिल ब्राह्मण जिम्भ एवं हिमोदक नरकमें वास करता है। जो देवता और ब्राह्मणके धनका अपहरण करता है, उसे आगे-पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंको नरकमें गिराकर स्वयं भी वहाँ रहना पड़ता है। धूमके अन्धकारसे पूर्ण धूमान्ध नामक नरकमें जाता है। उसे धूएँके कारण कष्ट भोगना पड़ता है। भोजनके लिये उसे धूम्र ही मिलता है। इस प्रकारकी यातना भोगते हुए वह वहाँ रहता है। तत्पश्चात् सात जन्मोंतक वह चूहेकी योनिमें जन्म पाता है। तदनन्तर नाना प्रकारके पक्षियों, कीड़ों, वृक्षों और पशुओंकी योनिमें जन्म पानेके पश्चात् शुद्ध होता है।

पतिव्रते! ये सुविख्यात नरककुण्ड बताये गये हैं। इनके अतिरिक्त अन्य छोटे-छोटे अप्रसिद्ध नरक भी गिनाये गये हैं। अपने दुष्कर्मोंके फल भोगनेवाले पापियोंसे उन नरकोंका कोना-कोना भरा रहता है। कर्म-फल भोगनेके लिये प्राणी नाना प्रकारकी योनियोंमें भटकते हैं। कहाँतक बताया जाय ?

(अध्याय २९-३१)

ब्रह्मवैवर्त पुराण · पृष्ठ 224, कुल 810 में से · BharatKosha