ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २१३
करानेके बाद वहाँसे बहते हुए जलको, देवताके नैवेद्यको तथा निर्माल्य पुष्पको लाँघता है, वह गोहत्याका भागी होता है। जो अतिथियोंके लिये सदा 'नहीं' ही किया करता, झूठ बोलता और दूसरोंको ठगता तथा देवता और गुरुसे द्वेष करता है, उसे गोहत्याका पाप लगता है। जो देवप्रतिमा, गुरु और ब्राह्मणको देखकर वेगपूर्वक उन्हें प्रणाम नहीं करता, उसे गोहत्या अवश्य लगती है। जो ब्राह्मण प्रणाम करनेवाले व्यक्तिको क्रोधमें आकर आशीर्वाद नहीं देता तथा विद्यार्थीको विद्या नहीं पढ़ाता, उसे गोहत्या लगती है।
गुरुपत्नी, राजपत्नी, सौतेली माँ, सगी माँ, पुत्री, पुत्र-वधू, सास, गर्भवती स्त्री, बहिन, सहोदर भाईकी पत्नी, मामी, दादी, नानी, बूआ, मौसी, भतीजी, शिष्या, शिष्य-पत्नी, भानजेकी स्त्री, भाईके पुत्रकी पत्नी—इन सबको ब्रह्माजीने अत्यन्त अगम्या बतलाया है। जो पुरुष कामभावसे इनपर दृष्टिपात करता है, उसे अधम मानव कहा गया है। वेदोंमें उसे मातृगामी कहा गया है। उसे ब्रह्महत्याका पाप-फल प्राप्त होता है। किसी भी सत्कर्ममें उसे नहीं लिया जा सकता। वह महापापी अत्यन्त दुष्कर कुम्भीपाक नामक नरकमें जाता है। भद्रे! मैंने नरकोंमें जानेवाले लोगोंके कुछ लक्षण बतला दिये। इन नरककुण्डोंसे अतिरिक्त नरकोंमें जो जाते हैं, उनका प्रसङ्ग कहता हूँ, सुनो!
साध्वि! जो द्विज पुंश्चली और वेश्याका अन्न खाता तथा उसके साथ गमन करता है, वह मरनेके पश्चात् कालसूत्र नामक नरकमें जाता है। इसके बाद रोगी होता है। एक पतिकी सेवा करनेवाली स्त्री 'पतिव्रता' कहलाती है। दूसरेसे सम्बन्ध स्थापित करनेपर उसे 'कुलटा' कहते हैं। तीसरेके सम्पर्कमें आनेपर उसे 'धर्षिणी' जानना चाहिये। चौथेके पास जानेवाली 'पुंश्चली' मानी जाती है। पाँचवें-छठेंके साथ गमन करनेवाली स्त्रीकी 'वेश्या' संज्ञा होती है। सातवें-आठवेंके सम्पर्कमें आनेवाली 'युग्मी' कहलाती है। इससे अधिक पुरुषोंके पास जानेवाली स्त्रीको 'महावेश्या' कहते हैं। वह सबके लिये अस्पृश्य है। जो द्विज कुलटा, धर्षिणी, पुंश्चली, वेश्या, युग्मी तथा महावेश्याके साथ गमन करता है, वह अवटोद नामक नरकमें जाता है—यह निश्चित है। कुलटागामी सौ वर्षोंतक, धर्षिणीगामी चार सौ वर्षोंतक, पुंश्चलीगामी छः सौ वर्षोंतक, वेश्यागामी आठ सौ वर्षोंतक, युग्मीगामी एक हजार वर्षोंतक तथा महावेश्यागामी कामुक मानव इससे सौ गुने वर्षोंतक इस अवटोद नरकमें वास करता है। यमदूत उसपर प्रहार करते हैं। फिर कुलटागामी तित्तिर, धर्षिणीगामी कौआ, पुंश्चलीगामी कोयल, वेश्यागामी शृगाल, युग्मीगामी सूअर तथा महावेश्यागामी मरघटमें सेमलका वृक्ष होकर सात जन्मोंतक पापका फल भोगते हैं।
जो ज्ञानहीन मानव सूर्यग्रहण अथवा चन्द्रग्रहणके समय भोजन करता है, वह अरुन्तुद नामक नरकमें जाता है। वह जितने अन्नके दाने खाता है, उतने वर्षोंतक उसे उस नरकमें वास करना पड़ता है। इसके बाद वह उदररोगसे पीड़ित मानव होता है। फिर गुल्म-रोगी, काना और दन्तहीन होता है। जो अपनी कन्याका वाग्दान करके किसी दूसरे वरके साथ उसका विवाह करता है, वह पांशुभोज नामक नरकमें स्थान पाता है। पांशु ही उसे भोजनके लिये मिलता है। साध्वि! जो दानमें दी हुई वस्तुको फिर ले लेता है, वह पाशवेष्ट नामक नरकमें निवास करता है। वहाँ शयन करनेके लिये उसे बाणोंकी शय्या मिलती है। मेरे दूतोंकी मार भी खानी पड़ती है। जो ब्राह्मणको दण्ड देता है तथा जिसके भयसे ब्राह्मण काँपता है, वह व्यक्ति प्रकम्पन नामक नरकमें वास करता है। जो स्त्री क्रोधभरे मुखसे रोषपूर्वक अपने पतिको देखती तथा कटुवचन कहती है, वह