भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

प्रकृतिखण्ड २२१

जाते हैं तथा जो तीस धनुष-जितना परिमाणमें है और जिसकी गहराई सौ पोरसा है एवं जो सदा अन्धकारसे आच्छन्न रहता है, उन पापियोंके लिये अतिशय दुःखप्रद नरकको 'शोषणकुण्ड' कहते हैं। विविध धर्मसम्बन्धी कषाय जलसे जो लबालब भरा रहता है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई सौ धनुष है और जहाँ सदा दुर्गन्ध फैली रहती है तथा जहाँ उस अमेध्य वस्तुके आहारपर ही रहकर पापी जीव यातना भोगते हैं, वह नरक 'कषकुण्ड' कहलाता है। साध्वि ! जिस कुण्डका आकार शूर्पके सदृश है तथा जो बारह धनुषके बराबर लंबा-चौड़ा है एवं जहाँ सर्वत्र संतप्त बालुका बिछी रहती है और पातकियोंसे कोई स्थल खाली नहीं रहता, उस नरकको 'शूर्पकुण्ड' कहते हैं। वहाँ सदा दुर्गन्ध भरी रहती है। वही खाकर पापी जीव वहाँ यातना भोगते हैं। पतिव्रते ! जहाँकी रेणुका अत्यन्त संतप्त रहती है तथा जो घोर पापी जीवोंसे युक्त रहता है एवं जिसके भीतर आगकी लपटें उठा करती हैं, ऐसी ज्वालासे भरे हुए मुखवाले नरकको 'ज्वालामुखकुण्ड' कहा जाता है। वह बीस धनुषमें विस्तृत है। ज्वालासे दग्ध पापी उसके कोने-कोनेमें भरे रहते हैं। उस कुण्डमें प्राणियोंको असीम कष्ट भोगना पड़ता है।

जहाँ गिरते ही मानव मूर्च्छित हो जाता है तथा जिसके भीतरकी ईंटें अत्यन्त संतप्त रहती हैं एवं जो आधी बावड़ी-जितना परिमाणवाला है, वह 'जिम्भकुण्ड' कहलाता है। जो धूममय अन्धकारसे संयुक्त रहता है तथा जहाँ गये हुए पापी धूमोंके कारण नेत्रहीन हो जाते हैं और जिसमें साँस लेनेके लिये बहुत-से छिद्र बने हैं, उस नरकको 'धूम्प्रान्धकुण्ड' कहा गया है। वह सौ धनुषके बराबर परिमाणमें है। जहाँ जानेपर पापीको तुरंत नाग बाँध लेते हैं तथा जो सौ धनुष-जितना लंबा-चौड़ा है और जिसमें सदा नाग भरे रहते हैं, उसे 'नागवेष्टनकुण्ड' कहा गया है। इन सभी कुण्डोंमें मेरे दूत प्राणियोंको मारते, जलाते तथा भाँति-भाँतिसे भयानक कष्ट देते रहते हैं।

सावित्री ! सुनो, मैंने ये छियासी नरककुण्ड और इनके लक्षण भी बतला दिये। अब फिर तुम क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ३२-३३)


भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूप, महत्त्व और गुणोंकी अनिर्वचनीयता

सावित्रीने कहा—देव ! अब आप मुझे सारभूत एवं परम दुर्लभ हरिभक्तिका उपदेश दीजिये। अन्य सब बातें मैंने आपसे सुन ली हैं। इस समय और किसी विषयको सुनना शेष नहीं है। अब तो मुझे भगवान् श्रीकृष्णके गुण-कीर्तनरूप कुछ धर्मकी बात बताइये। वही लाखों मनुष्योंके उद्धारका बीज है। वही नरकके समुद्रसे पार उतारनेवाला है। श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन मुक्तिके सारभूत तत्त्वकी प्राप्तिका कारण तथा समस्त अमङ्गलोंका निवारण करनेवाला है। वह कर्ममय वृक्षोंको उखाड़ फेंकनेवाला तथा किये हुए पापसमूहोंको हरनेवाला है। प्रभो! मुक्तियाँ कितने प्रकारकी हैं? उनके लक्षण क्या हैं? हरिभक्तिका स्वरूप क्या है? उसके भेद कितने हैं? तथा निषेकका भी क्या लक्षण है? वह सारभूत तत्त्वज्ञान क्या है? यह आप बताइये। अपना सर्वस्व दान कर देना, उपवास-व्रत करना, तीर्थोंमें नहाना, व्रत रखना और तप करना—ये सब-के-सब ज्ञानहीनको ज्ञान देनेसे जो पुण्य होता है, उसकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते। भगवन् ! यह निश्चय है कि गौरवकी दृष्टिसे पिताकी अपेक्षा माताका स्थान

२२२ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सौगुना ऊँचा है। परंतु ज्ञानदाता गुरु मातासे भी सौगुना अधिक पूजनीय होता है।

**यम बोले—**बेटी! मैं पहले ही तुम्हें यह वर दे चुका हूँ कि तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट प्रश्न होगा, वह सब मैं बताऊँगा—तुम जो कुछ जानना चाहोगी, उसका ज्ञान कराऊँगा। अतः इस समय मेरे वरसे तुम्हें भगवान् श्रीकृष्णकी भक्ति प्राप्त हो। कल्याणि! तुम जो भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन सुनना चाहती हो, वह बहुत ही उत्तम है। यह प्रश्न प्रश्नकर्ताके, उत्तर देनेवालेके और श्रोताओंके कुलका भी उद्धार करनेवाला है। परंतु है यह बहुत कठिन। सहस्र मुखवाले शेष भी इसे कहनेमें असमर्थ हैं। मृत्युञ्जय भगवान् शंकर यदि अपने पाँच मुखोंसे कहने लगें तो वे भी पार नहीं पा सकते। ब्रह्माजी चारों वेदों तथा अखिल जगत्‌के स्रष्टा हैं। चार मुखोंसे उनकी परम शोभा होती है। भगवान् विष्णु सर्वज्ञ हैं, परंतु ये दोनों प्रधान देव भी श्रीकृष्णके गुणोंका सम्यक् प्रकारसे वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। स्वामी कार्तिकेय अपने छः मुखोंसे वर्णन करते रहें तो भी अन्त नहीं पा सकते। महाभाग गणेशजीको योगीन्द्रोंके गुरु-का-गुरु कहा जाता है; किंतु भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन कर पाना उनके लिये भी असम्भव है। सम्पूर्ण शास्त्रोंके सारतत्त्व चार वेद हैं। ये वेद तथा इनसे परिचित विद्वान् भी श्रीकृष्णके गुणोंकी एक कला भी जाननेमें असमर्थ सिद्ध हो जाते हैं। श्रीकृष्णकी महिमाके वर्णनमें साक्षात् सरस्वती भी जड़के समान होकर असमर्थता प्रकट करने लगती हैं। सनत्कुमार, धर्म, सनक, सनातन सनन्द, कपिल तथा सूर्य—ये तथा श्रीब्रह्माजीके अन्यान्य सुयोग्य पुत्र भी उनके महत्त्वका वर्णन करनेमें सफलता नहीं प्राप्त कर सके, तब फिर अन्य व्यक्तियोंसे क्या आशा की जा सकती है? श्रीकृष्णके जिन गुणोंकी व्याख्या सिद्ध, मुनीन्द्र तथा योगीन्द्र भी नहीं कर सकते, उनका वर्णन अन्य पुरुष कैसे कर सकते हैं? तथा मैं ही कैसे कर सकता हूँ?

ब्रह्मा, विष्णु और शिव प्रभृति देवता जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते हैं, वे भक्तोंके लिये जितने सुगम हैं, उतने ही भक्तहीन जनोंके लिये दुर्लभ भी हैं। श्रीकृष्णका गुणानुवाद परम पवित्र है। कुछ लोग किंचिन्मात्र उसे जानते हैं। परम ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मा तथा उनके पुत्र आदि अधिक परिचित हैं। ज्ञानियोंके गुरु गणेशजी उनसे भी अधिक जानते हैं। सबसे अधिक सर्वज्ञ भगवान् शंकर ही जानते हैं; क्योंकि परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णने पूर्वकालमें इनको ज्ञान प्रदान किया था। गोलोकके अत्यन्त निर्जन रमणीय रासमण्डलमें श्रीकृष्णने जो शिवको अपने गुणोंके कीर्तनका महत्त्व बताया था, उसका स्वयं शिवजीने अपनी पुरीमें धर्मके प्रति उपदेश किया था। महाभाग सूर्यके पूछनेपर धर्मने पुष्करमें उनके सामने इसकी व्याख्या की थी। साध्वि! मेरे पिता भगवान् सूर्यने तपस्याद्वारा धर्मकी आराधना करके मुझे प्राप्त किया था। सुव्रते! पूर्व समयमें मेरे पिताजी यत्नपूर्वक मुझे यमपुरीका राज्य दे रहे थे; किंतु मैं लेना नहीं चाहता था। वैराग्य हो जानेके कारण मेरे मनमें तपस्या करनेकी बात आती थी। तब पिताजीने मेरे सामने भगवान्‌के गुणोंका जो वर्णन किया था, वह अत्यन्त दुर्गम है। मैं आगमके अनुसार उसे कुछ कहता हूँ, सुनो।

वरानने! श्रीकृष्णके इतने अमित गुण हैं कि उन्हें वे स्वयं ही पूरा नहीं जानते; तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है? जैसे आकाश स्वयं ही अपना अन्त नहीं जानता, उसी तरह भगवान् भी अपने गुणोंका अन्त नहीं जानते। भगवान् सबके अन्तरात्मा एवं सम्पूर्ण कारणोंके कारण हैं; वे सर्वेश्वर, सर्वाद्य, सर्ववित् और सर्वरूपधारी हैं, वे नित्यस्वरूप, नित्यविग्रह, नित्यानन्द, निराकार, निरङ्कुश,

प्रकृतिखण्ड

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निःशङ्क, निर्गुण (प्राकृतगुणरहित), निरामय, निर्लिप्त, सर्वसाक्षी, सर्वाधार एवं परात्पर हैं। प्रकृति उन्हींसे उत्पन्न हुई है और सम्पूर्ण प्राकृत पदार्थ प्रकृतिके कार्य हैं। स्वयं परमपुरुष श्रीकृष्ण ही प्रकृति हैं और वे प्रकृतिसे परे भी हैं। रूपहीन होते हुए भी भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये वे नाना प्रकारके रूप धारण करते हैं। उनका दिव्य चिन्मय स्वरूप अत्यन्त कमनीय, सुन्दर और परम मनोहर है। वे नवीन मेघमालाके समान श्याम कान्ति धारण करते हैं। उनकी किशोर अवस्था है। वे गोपवेषमें सुशोभित होते हैं। कोटि-कोटि कामदेवोंकी लावण्यलीलाके धाम हैं। उनकी मोहिनी झाँकी मनको मोहे लेती है। उनके नेत्र शरत्कालके मध्याह्नमें पूर्णतः विकसित हुए कमलोंकी शोभाको छीने लेते हैं। उनका मुख शरत्पूर्णिमाके करोड़ों चन्द्रमाओंकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाला है। अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित दिव्य आभूषण उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। मन्द मुस्कानसे सुशोभित मुख एवं सर्वाङ्ग बहुमूल्य पीताम्बरसे सतत शोभायमान है। वे परब्रह्मस्वरूप हैं और ब्रह्मतेजसे उद्भासित होते हैं। भक्तजनोंको सुखपूर्वक उनका दर्शन सुलभ होता है। वे शान्तस्वरूप राधा-वल्लभ अनन्त गुण और महिमासे सम्पन्न हैं। प्रेममयी गोपियाँ सब ओरसे घेरकर उन्हें मन्द मुस्कराहटके साथ निहारती रहती हैं। वे रासमण्डलके मध्यभागमें रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनके दो भुजाएँ हैं। वे वनमालासे विभूषित हैं और मुरली बजा रहे हैं। मणिराज कौस्तुभ सदा ही उनके वक्षःस्थलको उद्भासित करता रहता है। केसर, रोली, अबीर, कस्तूरी तथा चन्दनसे उनका श्रीविग्रह चर्चित है। वे मनोहर चम्पा, कमल और मालतीकी मालाओंसे अलंकृत हैं। चारु चम्पाके फूलोंसे सुशोभित चूड़ामणि (मुकुट)-की बंकिमा (लटक) उनके मनोहर सौन्दर्यकी वृद्धि कर रही है।

भक्ति-रससे ओतप्रोत भक्तजन भगवान् श्रीकृष्णके ऐसे ही स्वरूपका ध्यान करते हैं। जगद्धाता ब्रह्मा उन्हींका भय मानकर सृष्टिका विधान तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके भाग्यका उनके कर्मके अनुसार लेखन करते हैं। उन्हींकी आज्ञाके अनुसार सबको तपस्याओं तथा कर्मोंका फल देते हैं। उन्हींके भयसे पालक भगवान् विष्णु सदा सबका पालन करते हैं। उनसे भीत रहनेवाले कालाग्निरुद्रद्वारा अखिल जगत्का संहार होता है। जो ज्ञानियोंके गुरु-के-गुरु एवं मृत्युञ्जय नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिव हैं, वे भी उन्हींको जानने तथा उनका ज्ञान प्रदान करनेसे सिद्धेश, योगीश तथा सर्वज्ञ हुए हैं। भक्ति एवं ज्ञानसे युक्त तथा परमानन्दसे सम्पन्न हैं। साध्वि! उन्हींके कृपा-प्रसादसे शीघ्रगामियोंमें श्रेष्ठ पवनदेवता चलते तथा सूर्य उन्हींके भयसे निरन्तर तपते हैं। उन्हींकी आज्ञाके अनुसार इन्द्र वर्षा करते, मृत्यु समस्त प्राणियोंपर प्रभाव डालती, अग्नि जलाती एवं जल शीतल रहता तथा अत्यन्त भयभीत दिक्पाल दिशाओंकी रक्षा करते हैं। उन्हींके भयसे ग्रह राशिचक्रोंपर भ्रमण करते हैं। वृक्ष जो फूलते और फलते हैं, इसमें भी उनका भय ही कारण है। उन्हींकी आज्ञासे फल पकते हैं तथा बहुत-से वृक्ष फलहीन रह जाते हैं। उनकी आज्ञासे ही जलचर जीव स्थलमें और स्थलचर प्राणी जलमें जीवित नहीं रह पाते हैं। उन्हींके भयसे मैं (यमराज) धर्माधर्मके विषयमें नियन्त्रण करता हूँ। उनकी आज्ञासे ही काल सबको अपना ग्रास बनाता और सर्वत्र चक्कर लगाता ही रहता है। उन्हींके भयसे मृत्यु तथा काल किसीको असमयमें नहीं मार सकते। कोई जलती हुई आगमें या गहरे जलाशय अथवा समुद्रमें गिर जाय, वृक्षके ऊपरसे नीचे पड़ जाय, तीखी तलवारपर गिर पड़े, सर्प आदिके मुँहमें पड़ जाय, संग्राममें तथा अन्य विषम संकटोंमें फँसकर नाना प्रकारके अस्त्र-

२२४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

शस्त्रोंसे क्षत-विक्षत हो जाय तो भी जिनका भय मानकर काल उसे अकालमें नहीं ले जा सकता तथा जिनकी आज्ञा मिल जानेपर फूल और चन्दनसे सजी हुई सेजपर तन्त्र-मन्त्र तथा भाई-बन्धुओंसे सुरक्षित होकर सोते हुए मनुष्यको भी काल समय आनेपर अवश्य उठा ले जाता है, वे भगवान् ही सर्वोपरि हैं। उनके भयसे ही काल सब कुछ करता है। उन्हींकी आज्ञासे वायु जलराशिको, जलराशि कच्छपको, कच्छप शेषनागको, शेषनाग पृथ्वीको तथा क्षमारूप पृथ्वी समुद्रों, सातों पर्वतों तथा नाना प्रकारके रूपवाले चराचर जगत्को धारण करती है। उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूत प्रकट होते और अन्तमें उन्हींके भीतर लीन हो जाते हैं।

पतिव्रते ! इकहत्तर दिव्य युगोंकी इन्द्रकी आयु होती है। ऐसे अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन हो जानेपर ब्रह्माका एक दिन-रात होता है। इसी प्रकार तीस दिनोंका एक मास, दो मासोंकी एक ऋतु तथा छः ऋतुओंका एक वर्ष होता है। ऐसे सौ वर्षकी ब्रह्माकी आयु होती है। जबतक ब्रह्माका पतन नहीं होता तबतक श्रीहरिकी आँखें खुली रहती हैं—उनकी पलक उठी रहती है। जब वे आँख मूँदते या पलक गिराते हैं, तब ब्रह्माजीका पतन एवं प्रलय होता है। उसीको 'प्राकृतिक प्रलय' कहते हैं। उस प्राकृतिक प्रलयके समय सम्पूर्ण प्राकृत पदार्थ एवं देवता आदि चराचर प्राणी ब्रह्मामें लीन हो जाते हैं और ब्रह्मा भगवान् श्रीकृष्णके नाभिकमलमें लीन हो जाते हैं। क्षीरसागरमें शयन करनेवाले श्रीविष्णु तथा वैकुण्ठवासी चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णके वामपार्श्वमें लीन हो जाते हैं। रुद्र और भैरव आदि जितने भी शिवके अनुगामी हैं, वे मङ्गलाधार सनातन ज्ञानानन्दस्वरूप शिवमें लीन होते हैं। ज्ञानके अधिष्ठाता भगवान् शिव उन परमात्मा महादेव श्रीकृष्णके ज्ञानमें विलीन हो जाते हैं। सम्पूर्ण शक्तियाँ विष्णुमाया दुर्गामें तिरोहित हो जाती हैं। विष्णुमाया दुर्गा भगवान् श्रीकृष्णकी बुद्धिमें स्थान ग्रहण कर लेती हैं; क्योंकि वे उनकी बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं। नारायणके अंश स्वामिकार्तिकेय उनके वक्षःस्थलमें लीन हो जाते हैं। सुव्रते ! गणोंके स्वामी देवेश्वर गणेशको भगवान् श्रीकृष्णका अंश माना गया है। वे उनकी दोनों भुजाओंमें प्रविष्ट हो जाते हैं। लक्ष्मीकी अंशभूता देवियाँ लक्ष्मीमें तथा लक्ष्मी श्रीराधामें लीन हो जाती हैं। गोपियाँ तथा सम्पूर्ण देवपत्नियां भी श्रीराधामें ही लीन हो जाती हैं। भगवान् श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधीश्वरी देवी श्रीराधा उनके प्राणोंमें निवास कर जाती हैं। सावित्री, वेद एवं सम्पूर्ण शास्त्र सरस्वतीमें प्रवेश कर जाते हैं। सरस्वती परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णकी जिह्वामें विलीन हो जाती हैं। गोलोकके सम्पूर्ण गोप भगवान् श्रीकृष्णके रोमकूपोंमें लीन हो जाते हैं। उन प्रभुके प्राणोंमें सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राणस्वरूप वायुका, उनकी जठराग्निमें समस्त अग्नियोंका तथा उनकी जिह्वाके अग्रभागमें जलका लय हो जाता है। जो सारसे भी सारतर हैं तथा भक्तिरसामृतका पान करते हैं, वे भक्त वैष्णवजन अत्यन्त आनन्दित हो उन भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें विलीन हो जाते हैं। क्षुद्र विराट् महान् विराट्में और महान् विराट् परमात्मा श्रीकृष्णमें लीन हो जाते हैं। श्रीकृष्णके ही रोमकूपोंमें सम्पूर्ण विश्वकी स्थिति है। उन्हींके आँख मीचनेपर महाप्रलय होता है तथा उनकी आँख खुलते ही पुनः सृष्टिका कार्य आरम्भ हो जाता है। भगवान्‌की पलक जितनी देर उठी या खुली रहती है, उतनी ही देरतक बंद भी रहती है। दोनोंमें बराबर ही समय लगता है। ब्रह्माके सौ वर्षोंतक सृष्टि चालू रहती है, फिर उतने ही समयके लिये प्रलय हो जाता है। सुव्रते!

प्रकृतिखण्ड २२५

ब्रह्माकी सृष्टि और प्रलयकी कोई गिनती ही नहीं है। ठीक उसी तरह, जैसे भूमिके धूलिकणोंकी कोई गणना नहीं की जा सकती। जिन सर्वान्तरात्मा श्रीकृष्णके नेत्रोंकी पलक गिरते ही जगत्‌का प्रलय हो जाता है और पलकके उठते ही उन परमेश्वरकी इच्छासे सृष्टि आरम्भ हो जाती है, उनके गुणोंका कीर्तन करनेमें कौन समर्थ है? मैंने पिताजीके मुखसे जैसा-जैसा सुना है, वैसा-वैसा आगमोंके अनुसार वर्णन किया है।

चारों वेदोंने मुक्तिके चार भेद बतलाये हैं। उन सबसे प्रभुकी भक्तिको श्रेष्ठ माना गया है; क्योंकि इसके सामने सभी तुच्छ हैं। भक्ति मुक्तिसे भी बड़ी है। एक मुक्ति 'सालोक्य' प्रदान करनेवाली, दूसरी 'सारूप्य' देनेमें निपुण, तीसरी 'सामीप्य' प्रदान करनेवाली है और चौथी 'निर्वाणपद' पर पहुँचानेवाली कही जाती है। भक्त पुरुष परमप्रभु परमात्माकी सेवा छोड़कर इन मुक्तियोंकी इच्छा नहीं करते। वे सिद्धत्व, अमरत्व और ब्रह्मत्वकी भी अवहेलना करते हैं। मुक्ति सेवारहित होती है और भक्तिमें निरन्तर सेवाभावका उत्कर्ष होता रहता है। यही भक्ति और मुक्तिका भेद है। अब निषेकका लक्षण सुनो। विद्वान् पुरुष कहते हैं कि किये हुए कर्मोंका भोग ही निषेक है। उस कर्मभोग या प्रारब्धका भी खण्डन करके कल्याण प्रदान करनेवाली है—श्रीकृष्णकी उत्तम सेवा। साध्वि! यह तत्त्वज्ञान लोक और वेदका सार है। यह विघ्नोंका नाशक तथा शुभदायक है। बेटी! अब तुम सुखपूर्वक अपने घरको जाओ।

इस प्रकार कहकर सूर्यपुत्र यमराजने सावित्रीके पति सत्यवान्‌को जीवन प्रदान करके सावित्रीको शुभ आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् वे वहाँसे जानेके लिये उद्यत हो गये। उन्हें जाते देख सावित्री उनके चरणोंमें मस्तक झुका दोनों पैर पकड़कर रोने लगी। सच है, सत्पुरुषोंका बिछोह बड़ा ही दुःखदायक होता है। नारद! सावित्रीको रोती देख कृपानिधान यम भी रो पड़े और मन-ही-मन संतुष्ट हो उससे इस प्रकार बोले।

यमने कहा—सावित्री! तुम पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें लाख वर्षोंतक सुख भोगनेके अनन्तर भगवान् श्रीकृष्णके गोलोकधाममें जाओगी। भद्रे! अब तुम अपने घर जाओ और भगवती सावित्रीका व्रत करो। चौदह वर्षोंतक करनेपर यह व्रत नारियोंको मोक्ष प्रदान करता है। ज्येष्ठमासके कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथिको यह व्रत करना चाहिये। भाद्रपद-मासके शुक्लपक्षमें अष्टमी तिथिके दिन महालक्ष्मीका शुभ व्रत होता है। यह व्रत सोलह वर्षोंतक प्रत्येक वर्षके प्रतिमासके शुक्लपक्षमें करना चाहिये। जो नारी भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करती है, उसे भगवान् श्रीहरिका परमपद प्राप्त हो जाता है। प्रत्येक मङ्गलवारको मङ्गल प्रदान करनेवाली भगवती मङ्गलचण्डिकाकी पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक मासके शुक्लपक्षमें षष्ठीके दिन मङ्गलप्रदा भगवती षष्ठी (देवसेना)-की उपासना करनेका विधान है। इसी प्रकार आषाढ़की संक्रान्तिके अवसरपर सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करनेवाली भगवती मनसाकी पूजा होती है। कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथिको रासमण्डलमें विराजमान भगवान् श्रीकृष्णकी प्राणाधिका श्रीराधाकी उपासना करनी चाहिये तथा प्रत्येक मासकी शुक्ला अष्टमीके दिन दुर्गतिनाशिनी, विष्णुमाया भगवती दुर्गाका व्रत करना चाहिये। जो नारी विशुद्ध पतिव्रताओंमें, श्रीयन्त्र आदिमें तथा प्रतिमाओंमें पतिपुत्रवती सती प्रकृतिस्वरूपिणी भगवती जगदम्बाकी भावना करके धन और संततिकी प्राप्तिके लिये भक्तिपूर्वक पूजा करती है, वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके परमपदको प्राप्त होती है।

इस प्रकार कहकर धर्मराज अपने स्थानपर पधार गये। सावित्री भी पतिदेवको लेकर अपने घर लौट गयी। नारद! यों सावित्री और सत्यवान्

२२६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

दोनों जब घरपर चले आये, तब सावित्रीने सत्यवान्‌से तथा अन्य बान्धवोंसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। फिर वरके प्रभावसे सावित्रीके पिता क्रमशः सौ पुत्रवाले हो गये। उसके श्वशुरकी आँखें ठीक हो गयीं और वे अपना राज्य पा गये। सावित्री स्वयं भी बहुत-से पुत्रोंकी जननी बन गयी। उस पतिव्रता सावित्रीने पुण्यभूमि भारतवर्षमें अनेक वर्षोंतक सुख-भोग किया। तत्पश्चात् वह अपने पतिके साथ गोलोकधाममें चली गयी। जो सविताकी अधिदेवी, सवितृदेवताके मन्त्रोंकी अधिष्ठात्री तथा वेदोंकी सावित्री (जननी) हैं, वे देवी इन्हीं गुणोंके कारण ‘सावित्री’ कही गयी हैं।

वत्स! इस प्रकार सावित्रीका श्रेष्ठ उपाख्यान तथा प्राणियोंके कर्मविपाक—ये प्रसङ्ग तुम्हें बता दिये। अब पुनः क्या सुनना चाहते हो?

(अध्याय ३४)


भगवती महालक्ष्मीके प्राकट्य तथा विभिन्न व्यक्तियोंसे उनके पूजित होनेका तथा दुर्वासाके शापसे महालक्ष्मीके देवलोक-त्याग और इन्द्रके दुःखी होकर बृहस्पतिके पास जानेका वर्णन

नारदजीने कहा— भगवन्! मैं धर्मराज और सावित्रीके संवादमें निर्गुण-निराकार परमात्मा श्रीकृष्णका निर्मल यश सुन चुका। वास्तवमें उनके गुणोंका कीर्तन मङ्गलोंका भी मङ्गल है। प्रभो! अब मैं भगवती लक्ष्मीका उपाख्यान सुनना चाहता हूँ। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! सर्वप्रथम भगवती लक्ष्मीकी किसने पूजा की? इन देवीका कैसा स्वरूप है और किस मन्त्रसे इनकी पूजा होती है? आप मुझे इनका गुणानुवाद सुनानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायण बोले— ब्रह्मन्! प्राचीन समयकी बात है। सृष्टिके आदिमें परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णके वामभागसे रासमण्डलमें भगवती श्रीराधा प्रकट हुईं। उन परम सुन्दरी श्रीराधाके चारों ओर वटवृक्ष शोभा दे रहे थे। उनकी अवस्था ऐसी थी, मानो द्वादशवर्षीया देवी हों। निरन्तर रहनेवाला तारुण्य उनकी शोभा बढ़ा रहा था। उनका दिव्य विग्रह ऐसा प्रकाशमान था, मानो श्वेत चम्पकका पुष्प हो। उन मनोहारिणी देवीके दर्शन परम सुखी बनानेवाले थे। उनका प्रसन्नमुख शरत्पूर्णिमाके कोटि-कोटि चन्द्रमाओंकी प्रभासे पूर्ण था। उनके विकसित नेत्रोंके सामने शरत्कालके मध्याह्नकालिक कमलोंकी शोभा छिप जाती थी। परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णके साथ विराजमान रहनेवाली वे देवी उनकी इच्छाके अनुसार दो रूप हो गयीं। रूप, वर्ण, तेज, अवस्था, कान्ति, यश, वस्त्र, आकृति, आभूषण, गुण, मुस्कान, अवलोकन, वाणी, गति, मधुर-स्वर, नीति तथा अनुनय-विनयमें दोनों (राधा तथा लक्ष्मी) समान थीं। श्रीराधाके बाँयें अंशसे लक्ष्मीका प्रादुर्भाव हुआ और अपने दाहिने अंशमें श्रीराधा स्वयं ही विद्यमान रहीं। श्रीराधाने प्रथम परात्पर प्रभु द्विभुज भगवान् श्रीकृष्णको पतिरूपसे स्वीकार कर लिया। भगवान्‌का वह विग्रह अत्यन्त कमनीय था। महालक्ष्मीने भी श्रीराधाके वर लेनेके पश्चात् उन्हींको पति बनानेकी इच्छा की। तब भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें गौरव प्रदान करनेके विचारसे ही स्वयं दो रूपोंमें प्रकट हो गये। अपने दक्षिण अंशसे वे दो भुजाधारी श्रीकृष्ण ही बने रहे और वाम अंशसे चतुर्भुज विष्णुके रूपमें परिणत हो गये। उन्होंने महालक्ष्मीको भगवान् विष्णुकी सेवामें समर्पित कर दिया। जो देवी अपनी स्नेहभरी दृष्टिसे विश्वको माताकी भाँति निरन्तर देखती-भालती

प्रकृतिखण्ड २२७

रहती हैं, वे ही देवियोंमें महती होनेके कारण महालक्ष्मीके नामसे प्रसिद्ध हुईं। इस प्रकार द्विभुज भगवान् श्रीकृष्ण श्रीराधाके प्राणपति बने और चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु लक्ष्मीके। द्विभुज श्रीकृष्ण गोपों और गोपियोंसे आवृत हो गोलोकमें अत्यन्त शोभा पाने लगे और चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु भगवती लक्ष्मीसहित वैकुण्ठधामको चले गये। ये भगवान् श्रीविष्णु और भगवान् श्रीकृष्ण दोनों समस्त अंशोंमें एक समान ही हैं।

भगवती श्रीमहालक्ष्मी योगबलसे नाना रूपोंमें विराजमान हुईं। वे सम्पूर्ण सौभाग्योंसे सम्पन्न होकर परम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा, परिपूर्णतमा 'महालक्ष्मी' के नामसे प्रसिद्ध हो वैकुण्ठधाममें निवास करने लगीं। प्रेमके कारण समस्त नारीसमुदायमें वे प्रधान हुईं। वे स्वर्गमें इन्द्रकी सम्पत्तिस्वरूपिणी होकर 'स्वर्गलक्ष्मी' के नामसे प्रसिद्ध हुईं। पातालमें तथा मर्त्यलोकमें राजाओंके यहाँ 'राजलक्ष्मी' हुईं। गृहस्थोंके यहाँ 'गृह-लक्ष्मी' के नामसे पूजित हुईं। अपने कलांशसे ये ही गृहिणी भी कहलाती हैं। वे गृहस्थोंके लिये सम्पत्स्वरूपा तथा सर्वमङ्गलमङ्गला हैं। गौओंकी जननी सुरभि तथा यज्ञपत्नी दक्षिणा भी वे ही हैं। क्षीरसागरके यहाँ उसकी कन्या हैं। कमलोंमें 'श्री' तथा चन्द्रमा और सूर्यमें 'शोभा' रूपसे उन्हींका निवास है। वे सूर्यमण्डलका अलंकार हैं। भूषण, रत्न, फल, जल, राजा, रानी, दिव्य नारी, गृह, सम्पूर्ण धान्य, वस्त्र, पवित्र स्थान, देवताओंकी प्रतिमा, मङ्गल-कलश, माणिक्य, मोतियोंकी सुन्दर मालाएँ, बहुमूल्य हीरे, चन्दन-वृक्षोंकी सुरम्य शाखा तथा नूतन मेघ—इन सभी वस्तुओंमें भगवती श्रीलक्ष्मीका अंश विद्यमान है।

मुने! सर्वप्रथम भगवान् नारायणने वैकुण्ठधाममें इन महालक्ष्मीकी पूजा की। दूसरी बार ब्रह्माजीने भक्तिपूर्वक इनका अर्चन किया। तीसरी बार भगवान् श्रीशिवने इनकी आराधना की। मुने! फिर भगवान् विष्णुने क्षीरसागरमें इनकी पूजा की। तदनन्तर स्वायम्भुव मनु, मानवेन्द्र, ऋषीश्वर, मुनीश्वर तथा साधु गृहस्थ—इन लोगोंने महालक्ष्मीकी उपासना की है। गन्धर्व और नाग आदिने पाताललोकमें इनका पूजन किया। भाद्रपदमासकी शुक्ल अष्टमीके सुअवसरपर ब्रह्माद्वारा ये सुपूजित हुईं। नारद! फिर भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें पूरे पक्षतक त्रिलोकीमें इनकी भक्तिपूर्वक पूजा होने लगी। चैत्र, पौष तथा भाद्रपदमासके पवित्र मङ्गलवारको भगवान् विष्णुने भक्तिपूर्वक तीनों लोकोंमें इनकी पूजाका महोत्सव चालू किया। वर्षके अन्तमें पौषकी संक्रान्तिके दिन मनुने अपने प्राङ्गणमें इनकी प्रतिमाका आवाहन करके इनकी पूजा की। तत्पश्चात् तीनों लोकोंमें वह पूजा प्रचलित हो गयी। राजेन्द्र! मङ्गल, केदार, नील, नल, सुबल, उत्तानपाद-पुत्र ध्रुव, इन्द्र, बलि, कश्यप, दक्ष, मनु, विवस्वान् (सूर्य), प्रियव्रत, चन्द्रमा, कुबेर, वायु, यम, अग्नि और वरुणने मङ्गलमयी देवीकी उपासना की। इस प्रकार ये भगवती महालक्ष्मी सर्वत्र सब लोगोंसे सदा सुपूजित हुई हैं। ये सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी अधिष्ठात्री देवी हैं। समस्त सम्पत्तियाँ इन्हींका स्वरूप हैं।

नारदजीने पूछा— भगवन्! श्रीमहालक्ष्मी भगवान् नारायणकी प्रिया होकर सदा वैकुण्ठमें विराजती हैं। उन सनातनीदेवीको वैकुण्ठकी अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। फिर वे देवी पृथ्वीपर सिन्धुकन्याके रूपमें कैसे प्रकट हुईं? उनका ध्यान, कवच और पूजनसम्बन्धी सम्पूर्ण विधान क्या है? पूर्वकालमें सबसे पहले उन महालक्ष्मीका स्तवन किसने किया था? इन सब बातोंका मेरे लिये विशद विवेचन कीजिये।

भगवान् नारायणने कहा— नारद! पूर्वसमयकी बात है। दुर्वासाके शापसे इन्द्र, देवसमुदाय तथा मर्त्यलोक—सभी श्रीहीन हो गये थे। रूठी हुई लक्ष्मी स्वर्ग आदिका त्याग करके

२९- भगवती लक्ष्मीका समुद्रसे प्रकट होना और इन्द्रके द्वारा महालक्ष्मीके ध्यान तथा स्तवन किये जाने और पुनः अधिकार प्राप्त किये जानेका वर्णन

२२८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

बड़े दुःखके साथ वैकुण्ठमें गयीं और महालक्ष्मीमें अपने-आपको विलीन कर दिया। उस समय सम्पूर्ण देवताओंके शोककी सीमा नहीं रही। वे परम दुःखी होकर भगवान् ब्रह्माकी सभामें गये। वहाँ पहुँचकर ब्रह्माजीको आगे करके वे सब वैकुण्ठमें गये। वहाँ भगवान् नारायण विराजमान थे। अत्यन्त दैन्यभाव प्रकट करते हुए देवताओंने उनकी शरण ग्रहण की। वस्तुतः देवता बहुत दुःखी थे। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे। तब पुराणपुरुष भगवान् श्रीहरिकी आज्ञा मानकर वे इन्द्रसम्पत्तिस्वरूपा लक्ष्मी अपनी कलासे समुद्रकी कन्या हुईं।

देवताओं और दैत्योंने मिलकर क्षीरसागरका मन्थन किया था। उससे महालक्ष्मीका प्रादुर्भाव हुआ। देवताओंने वहाँ उन्हें देखा और उनसे वर प्राप्त किया। देवता आदिको वर देकर उन प्रसन्नवदना देवीने क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुको वरमाला अर्पित की। नारद! उनकी कृपासे देवताओंको असुरोंके हाथमें गया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हो गया। देवता उनकी भलीभाँति पूजा और स्तुति करके सर्वत्र निरापद हो गये।

नारदजीने पूछा— ब्रह्मन्! ब्रह्मनिष्ठ और तत्त्वज्ञ मुनिवर दुर्वासाने कब, क्यों और किस अपराधके कारण इन्द्रको शाप दे दिया था? देवता आदिने किस रूपसे समुद्रका मन्थन किया? किस स्तोत्रसे प्रसन्न होकर देवीने इन्द्रको साक्षात् दर्शन दिये थे? प्रभो! किस प्रकार उन दोनोंका संवाद हुआ था? यह सब बतानेकी कृपा करें।

भगवान् नारायण कहते हैं— नारद! प्राचीन कालकी बात है। मुनिवर दुर्वासाजी वैकुण्ठसे कैलासके शिखरपर जा रहे थे। इन्द्रने उन्हें देखा। मुनिवरका शरीर ब्रह्मतेजसे प्रदीप्त हो रहा था। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सूर्यकी सहस्रों किरणोंसे सम्पन्न हों। उनकी अत्यन्त स्वच्छ जटाएँ तपाये हुए सुवर्णके समान चमक रही थीं। वे श्वेतवर्णका यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे तथा उनके हाथोंमें चीर, दण्ड और कमण्डलु शोभा पा रहे थे। उनके ललाटपर महान् उज्ज्वल तिलक चन्द्रमाके सदृश जान पड़ता था। वेद-वेदाङ्गके पारगामी असंख्य शिष्य उनके साथ विद्यमान थे। उन्हें देखकर इन्द्रने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। उनके शिष्योंको भी भक्तिपूर्वक प्रसन्नताके साथ इन्द्रने संतुष्ट किया। तब शिष्योंसहित मुनिवर दुर्वासाने इन्द्रको शुभ-आशीर्वाद दिया; साथ ही भगवान् विष्णुद्वारा प्राप्त परम मनोहर पारिजात-पुष्प भी उन्हें समर्पित किये। राज्यश्रीके गर्वमें गर्वित इन्द्रने जरा, मृत्यु एवं शोकका विनाश करनेवाले तथा मोक्षदायी उस पुष्पको लेकर अपने ऐरावत हाथीके मस्तकपर रख दिया। उस पुष्पका स्पर्श होते ही रूप, गुण, तेज और अवस्था—इन सबसे सम्पन्न होकर ऐरावत सहसा भगवान् विष्णुके समान हो गया। फिर तो इन्द्रको छोड़कर वह घोर वनमें चला गया। मुने! उस समय इन्द्र तेजसे युक्त उस ऐरावतपर शासन नहीं कर सके। इन्द्रने इस दिव्य पुष्पका परित्याग कर तिरस्कार किया है—यह जानकर मुनिवर दुर्वासाके रोषकी सीमा न रही। उन्होंने क्रोधमें भरकर शाप देते हुए कहा।

मुनिवर दुर्वासा बोले— अरे! राज्यश्रीके अभिमानमें प्रमत्त होकर तुम क्यों मेरा अपमान कर रहे हो? मैंने तुम्हें यह पारिजात-पुष्प दिया और तुमने गर्वके कारण स्वयं इसका उपयोग न करके हाथीके मस्तकपर रख दिया! नियम तो यह है कि श्रीविष्णुको समर्पित किये हुए नैवेद्य, फल अथवा जलके प्राप्त होते ही उनका उपभोग करना चाहिये। त्याग करनेसे ब्रह्महत्याके सदृश दोष लगता है। सौभाग्यवश प्राप्त हुए भगवान् विष्णुके पावन नैवेद्यका जो त्याग करता

•••• प्रकृतिखण्ड २२९

है, वह पुरुष श्री, बुद्धि और ज्ञानसे भ्रष्ट हो जाता है। भगवान् विष्णुके लिये अर्पित की हुई वस्तुको पाते ही उसे पा लेनेवाला बड़भागी पुरुष अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करके स्वयं मुक्त हो जाता है। जो पुरुष नैवेद्य भोजन करके निरन्तर भगवान् श्रीहरिकी भक्तिपूर्वक पूजा और स्तुति करता है, वह भगवान् विष्णुके समान हो जाता है। उसका स्पर्श करके चलनेवाली वायुका संयोग पाकर तीर्थोंका समूह पवित्र हो जाता है। उसकी चरणरज लगते ही पृथ्वी पवित्र हो जाती है। श्रीहरिको भोग न लगाया हुआ अन्न मांसके समान अभक्ष्य है। शिव-लिङ्गके लिये अर्पण किया हुआ अन्न तथा शूद्रयाजी, चिकित्सक, देवल, कन्याविक्रयी और योनि-जीविका अन्न, ठंडा, बासी, सबके भोजन करनेपर बचा हुआ अन्न, शूद्रापति एवं वृषवाही, अदीक्षित, शवदाही, अगम्यागामी, मित्रद्रोही, विश्वासघाती, कृतघ्न तथा झूठी गवाही देनेवाले ब्राह्मणोंका अन्न अत्यन्त दूषित समझा जाता है; परंतु ये सब भी भगवान् विष्णुको अर्पण करके भोजन करनेसे शुद्ध हो जाते हैं। यदि चाण्डाल भी भगवान् विष्णुकी उपासना करता है तो वह करोड़ों वंशजोंका उद्धार कर सकता है। श्रीहरिकी भक्तिसे विमुख मानव स्वयं अपनी भी रक्षा नहीं कर सकता। यदि अज्ञानमें भी भगवान् विष्णुको समर्पित नैवेद्य ग्रहण कर लिया जाय तो वह पुरुष अपने सात जन्मोंके उपार्जित पापोंसे मुक्त हो जाता है। जान-बूझकर भक्तिपूर्वक जो श्रीहरिका प्रसाद ग्रहण करता है, उसके तो अनेक जन्मोंके पाप निश्चितरूपसे भस्म हो जाते हैं। इन्द्र ! तुमने जो अभिमानमें आकर भगवान्‌के प्रसादरूप पारिजातके पुष्पको हाथीके मस्तकपर रख दिया, इस अपराधके फलस्वरूप लक्ष्मी तुम्हें छोड़कर भगवान् श्रीहरिके समीप चली जाय। मैं भगवान् नारायणका भक्त हूँ। मुझे शिव तथा ब्रह्मासे भी किंचित् भी भय नहीं है। काल, मृत्यु और जरासे भी मैं नहीं डरता, फिर दूसरोंकी तो गिनती ही क्या है? तुम्हारे पिता प्रजापति कश्यप भी मेरा क्या करेंगे? देवराज ! तुम्हारे गुरु बृहस्पति भी मुझ निःशङ्क पुरुषका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। देखो, यह पुष्प जिसके मस्तकपर है, उसीकी पूजा श्रेष्ठ मानी जाती है। शिवके पुत्रका मस्तक कट जानेपर उसके पुनरुज्जीवनके लिये यही मस्तक (हाथीका सिर) जोड़ा जायगा।

मुनिवर दुर्वासाके ये वचन सुनकर देवराज इन्द्रने उनके चरण पकड़ लिये। भयके कारण उनके मनमें घबराहट छा गयी। शोकातुर होकर उच्च स्वरसे रोते हुए वे मुनिसे कहने लगे।

इन्द्रने कहा- प्रभो ! आपने मुझ मतवालेको यह शाप देकर बहुत ही उचित किया है। यदि आपने मेरी सम्पत्ति हर ली तो अब आप मुझे कुछ ज्ञानोपदेश करनेकी कृपा कीजिये। ऐश्वर्य तो विपत्तियोंका बीज है। उससे ज्ञान ढक जाता है। इसीसे इसको मुक्तिमार्गकी अर्गला कहा जाता है। इसके कारण हरि-भक्तिमें पद-पदपर बाधा उपस्थित हुआ करती है। सम्पत्ति जन्म, मृत्यु, जरा, रोग, शोक और दुःखके बीजका उत्तम अङ्कुर है। धनरूपी रतौंधीसे अन्धा हुआ मानव मुक्तिके मार्गको नहीं देख सकता।* जो सम्पत्तिसे प्रमत्त हो गया है, उसे मदिरासे मत्त हुआ समझना चाहिये। उसे बान्धवजन घेरे रहते हैं; परंतु वह बन्धुजनोंसे द्वेष रखता है। वैभवमत्त, विषयान्ध, विह्वल, महाकामी और राजसिक व्यक्तिमें सत्त्वमार्गका अवलोकन करनेकी योग्यता नहीं रह जाती।


* ऐश्वर्यं विपदां बीजं प्रच्छन्नज्ञानकारणम्। मुक्तिमार्गार्गलं दाढ्यं हरिभक्तिव्यवाय कम् ॥
जन्ममृत्युजरारोगशोकदुःखाङ्कुरं परम्। सम्पत्तितिमिरान्धं च मुक्तिमार्गं न पश्यति ॥
(प्रकृतिखण्ड ३६। ४८-४९)

२३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण विषयान्ध दो प्रकारके बताये गये हैं - राजस और बात है कि तुम अभीष्ट (मोक्ष)- मार्गका साक्षात्कार तामस । जिसमें शास्त्रका ज्ञान नहीं है, वह तामस करना चाहते हो। यह पहले तो दुःखका कारण कहलाता है और शास्त्रज्ञ राजस । मुनिश्रेष्ठ ! शास्त्र जान पड़ता है; परंतु परिणाममें सुख देनेवाला है। दो प्रकारके मार्ग दिखलाते हैं - एक प्रवृत्ति - बीज जीवको जो गर्भकी यातना तथा मृत्युकष्ट सहन और दूसरा निवृत्ति-बीज। पहला जो प्रवृत्तिमार्ग करने पड़ते हैं, उन सबका खण्डन करनेवाला यह है, वह दुःखका रास्ता है, परंतु जीव क्लेशमें ही ज्ञान बताया जा रहा है। जिससे पार पाना कठिन सुख मानकर पहले उसीपर चलते हैं। वह मार्ग है, उस दुर्वार एवं असार संसार-पारावारसे उद्धार स्वच्छन्द, प्रसन्नतापूर्ण, विरोधशून्य एवं आपात- करनेवाला यह ज्ञान ही है। इससे कर्मरूपी वृक्षके मधुर होनेपर भी परिणाममें नाशका बीज तथा अङ्कुरका उच्छेद हो जाता है। यह सबका उद्धार जन्म-मृत्यु और जराके चक्करमें डालनेवाला है। करनेवाला है। ज्ञानका यह मार्ग सब मार्गोंसे श्रेष्ठ जीव अनेक जन्मोंतक अपने विहित कर्मके है। इससे संतोष और संततिकी प्राप्ति होती है। परिणामस्वरूप नाना प्रकारकी योनियोंमें क्रमशः दान, तप, व्रत और उपवास आदि कर्मसे भ्रमण करनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे जीवधारियोंको स्वर्गभोग आदि सुखकी उपलब्धि मानव होकर सत्सङ्गका सुअवसर प्राप्त करता है। होती है। पहलेके सकाम कर्मोंका यत्नपूर्वक सैकड़ों और सहस्रों पुरुषोंमें कोई विरला ही मूलोच्छेद करके यह ज्ञान मोक्षका बीज वपन साधुपुरुष भवसागरसे पार उतारनेमें कारण बनता करता है। संकल्पका अभाव ही मोक्षका बीज है। है। साधुपुरुष सत्त्वगुणके प्रकाशसे मुक्तिमार्गका मनुष्य जो भी सात्त्विक कर्म करे, उसे कामना या दर्शन कराता है। तब जीवके हृदयमें बन्धनको संकल्पसे शून्य ही रखे। समस्त कर्मोंको श्रीकृष्णके तोड़नेके लिये यत्न करनेकी भावना उत्पन्न होती चरणोंमें समर्पित करके ज्ञानी पुरुष परब्रह्म है। जब अनेक जन्मोंके पुण्य एवं तपस्या और परमात्मामें लीन हो जाता है। संसारी पुरुषोंके उपवास सहायक होते हैं तब प्राणीको निर्विघ्न लिये इस गतिको निर्वाण- मोक्ष कहा गया है। और परम सुखद मुक्तिमार्गकी उपलब्धि होती है। परंतु वैष्णव पुरुष भगवत्सेवासे विरह होनेके यह बात मैंने विभिन्न प्रसङ्गों और अवसरोंपर गुरु भयसे कातर हो इस निर्वाण-मुक्तिकी इच्छा (बृहस्पति) - जी के मुखसे सुनी है। अब विधाताने नहीं करते हैं। वे उत्तम देह धारण करके गोलोक इस विपत्तिके समय मुझे ज्ञानका समुद्र प्रदान अथवा वैकुण्ठधाममें उन्हीं परमात्माकी नित्य किया है। मेरा उद्धार करनेवाली यह विपत्ति सेवा करते हैं। इन्द्र ! वैष्णवजन भगवत्सेवारूप वास्तवमें सम्पत्तिरूपिणी है। ज्ञानसिन्धो ! दीनबन्धो ! मुक्तिकी ही अभिलाषा रखते हैं। वे जीवन्मुक्त हैं दयानिधे ! इस समय मुझ दीनको कुछ ऐसा और अपने समस्त कुलका उद्धार कर देते हैं। सारभूत ज्ञान दीजिये, जो मुझे भवसागरसे पार भगवान् विष्णुका स्मरण, कीर्तन, अर्चन, पादसेवन, कर दे। वन्दन, स्तवन, नित्य भक्तिभावसे उनके नैवेद्यका इन्द्रकी यह बात सुनकर ज्ञानियोंके गुरु भक्षण, चरणोदकका पान तथा उनके मन्त्रका सनातन मुनि दुर्वासा जोर-जोरसे हँस पड़े और जप - यही जीवके उद्धारका बीज है, जो सबके अत्यन्त संतुष्ट होकर इन्द्रको ज्ञानका उपदेश लिये अभीष्ट हो सकता है। यह मृत्युञ्जय-ज्ञान है, देने लगे। जिसे भगवान् मृत्युञ्जयने मुझे दिया था। मैं उनका मुनि बोले- अहो महेन्द्र ! यह बड़े मङ्गलकी शिष्य हूँ। इसलिये उन्हींके कृपा-प्रसादसे सर्वत्र

३२- वैकुण्ठमें श्रीहरिका देवताओंको समझाकर लक्ष्मीदेवीसे क्षीरसमुद्रके यहाँ जाकर जन्म धारण करनेको स्वीकार करनेके लिये कहना

प्रकृतिखण्ड २३१ निर्भय विचरता हूँ। जो तीनों लोकोंमें परम दुर्लभ हरिभक्ति प्रदान करता है, वही जन्मदाता पिता है, वही ज्ञानदाता गुरु है, वही बन्धु है और वही सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ है* । जो श्रीकृष्ण-सेवाके सिवा दूसरा कोई मार्ग दिखाता है, वह उस शिष्यका विनाश ही करता है। निश्चय ही उस गुरुको उसके वधके पापका भागी होना पड़ता है। भगवान् श्रीकृष्णका नाम ही सदा समस्त लोकोंके लिये मङ्गलकारक है। जो कृष्ण-नाम लेता है, उसके मङ्गलकी सदा वृद्धि होती है। उसकी आयुका अपव्यय नहीं होता। श्रीकृष्णभक्तोंसे काल, मृत्यु, रोग, संताप और शोक उसी तरह दूर भागते हैं, जैसे गरुड़से सर्प । श्रीकृष्ण-मन्त्रका उपासक ब्राह्मण हो या चाण्डाल, वह ब्रह्मलोकको लाँघकर उत्तम गोलोकमें चला जाता है। ब्रह्माजी मधुपर्क आदिके द्वारा उसकी पूजा करते हैं तथा देवताओं और सिद्धोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ वह परमानन्दका अनुभव करता है। भगवान् शिवने श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी सेवाको ही ज्ञान, तप, वेद तथा योगका सार बताया है। वही परम कल्याणस्वरूप है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सारा जगत् स्वप्नके समान मिथ्या ही है। केवल परब्रह्म परमात्मा राधावल्लभ श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं। वे प्रकृतिसे भी परे हैं। अतः तुम उन्हींकी आराधना करो। भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त सुखदायक, सारतत्त्वस्वरूप, भक्तिदाता, मोक्षदाता, सिद्धिदाता, योगप्रदाता तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता हैं। योगी, यती, सिद्ध और तपस्वी सबके लिये कर्मोंका भोग अनिवार्य है, परंतु नारायणके भक्तोंके लिये कर्मभोग नहीं है। जैसे प्रज्वलित अग्निमें डाला गया सूखा ईंधन शीघ्र ही जल जाता है, उसी प्रकार भगवद्भक्तोंके स्पर्शमात्रसे सारा पाप तत्काल भस्म हो जाता है। श्रीकृष्ण-भक्तसे रोग, पाप और भय सभी थर-थर काँपते हैं। यमदूत भी उससे डरकर दूर भागते हैं। विधाताके कारागाररूपी इस संसारमें मनुष्य तभीतक बँधा रहता है, जबतक कि गुरुके मुखसे उसको श्रीकृष्ण-मन्त्रका उपदेश नहीं प्राप्त होता। श्रीकृष्णका नाम किये हुए कर्मोंके भोगरूपी बेड़ीका उच्छेद करनेवाला, मायाजालको छिन्न-भिन्न कर देनेवाला तथा मायापाशका विनाशक है। गोलोकके मार्गका सोपान, उद्धारका बीज तथा भक्तिका नित्य बढ़नेवाला अविनाशी अङ्कुर है। पुरन्दर ! सम्पूर्ण तप, योग, सिद्धि, वेदाध्ययन, व्रत, दान, तीर्थ- स्नान, यज्ञ, पूजन और उपवास-इन सबका वही सार है, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। श्रीकृष्णके मन्त्रको ग्रहण करनेमात्रसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। उसके स्पर्शसे तीर्थोंके समुदाय तथा सारी पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। अनेक जन्मोंतक जिसे कोई दीक्षा नहीं प्राप्त हुई है, वह लेशमात्र पुण्यके प्रभावसे किसी अन्य देवताका मन्त्र पाता है। अनेक जन्मोंतक अन्य देवताओंकी सेवाके फलस्वरूप उसको समस्त कर्मोंके साक्षी सूर्यदेवका मन्त्र प्राप्त होता है। तीन जन्मोंतक सूर्यकी सेवासे शुद्ध हुआ मनुष्य गणेशजीके सर्वविघ्नहारी मन्त्रका उपदेश पाता है। अनेक जन्मोंतक उनकी सेवासे मनुष्यकी सारी विघ्न- बाधाएँ दूर हो जाती हैं। फिर वह गणेशजीके कृपा-प्रसादसे दिव्य ज्ञान प्राप्त करता है। उस ज्ञानके प्रकाशमें भलीभाँति विचार करके अज्ञानान्धकारका निवारण करनेके पश्चात् मनुष्य विष्णुमायास्वरूपिणी प्रकृतिदेवी दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका भजन करता है। वे सिद्धिदायिनी, सिद्धिरूपिणी तथा परमा सिद्धियोगिनी हैं। वाणी,

  • स जन्मदाता स गुरुः स च बन्धुः सतां परः । यो ददाति हरेर्भक्तिं त्रैलोक्ये च सुदुर्लभाम् ॥ (प्रकृतिखण्ड ३६। ७६)

२३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


लक्ष्मी और श्रीकृष्णप्रिया राधा आदि उनके अनेक रूप हैं। अनेक जन्मोंतक उनकी उपासना करनेके पश्चात् उनकी कृपासे ज्ञानी होकर मनुष्य ज्ञानानन्दस्वरूप, श्रीकृष्णज्ञानके अधिदेवता सनातन महादेव कल्याणस्वरूप शिवका भजन करता है।

वे मङ्गलदायक, कल्याणकारक, परमानन्दरूप, परमानन्ददायी, सुखदायक, मोक्षदायक तथा समस्त सम्पत्तियोंके दाता हैं। अमरत्व, सुदीर्घ आयु, इन्द्रत्व तथा मनुत्वको भी वे अनायास ही देनेमें समर्थ हैं। राजेन्द्रपद, ज्ञान तथा हरिभक्तिके भी दाता हैं। तीन जन्मोंतक उनकी आराधना करके उन्हीं आशुतोष महात्मा शंकरके कृपा-प्रसादसे मनुष्य निश्चय ही हरिभक्ति प्राप्त कर लेता है। फिर श्रीकृष्ण-भक्तोंके संसर्गसे उसको कृष्णमन्त्रकी प्राप्ति होती है। तत्त्वज्ञ पुरुष निर्मल ज्ञान-दीपके प्रकाशित होनेसे ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्‌को मिथ्या ही देखता है। वरदाता शंकरके वरसे जब निर्मल ज्ञान और भगवद्भक्तिकी प्राप्ति हो जाती है, तब मनुष्य परात्पर निवृत्तिभावको प्राप्त हो जाता है। जिस शरीरमें उसे श्रीकृष्ण-मन्त्रकी प्राप्ति होती है, वह शरीर जबतक टिका रहता है, तभीतक उसे भारतवर्षमें रहना पड़ता है। उस पाञ्चभौतिक शरीरको त्याग देनेके पश्चात् वह दिव्य रूप धारण कर लेता है और श्रीहरिके गोलोक या वैकुण्ठधाममें उनका पार्षद बनकर उनकी सेवा किया करता है। वह परमानन्दसे सम्पन्न तथा मोह आदिसे रहित हो जाता है। इस प्राकृत जगत्में पुनः उसका आगमन नहीं होता। उसे पुनः माताका स्तन नहीं पीना पड़ता।

जो विष्णुमन्त्रके उपासक गङ्गा आदि तीर्थोंका सेवन करनेवाले तथा स्वधर्मपरायण भिक्षु हैं, उनका फिर जन्म नहीं होता। तीर्थमें पापका सर्वथा परित्याग करे और पुण्यकर्मका अनुष्ठान करते हुए श्रीहरिका भजन करे। विधाताने तीर्थसेवी पुरुषोंका यही धर्म बताया है। भगवान् विष्णुके नाम-मन्त्रका जप करे, उन्हींकी सेवा आदिमें तत्पर रहे तथा उन्हींके व्रत एवं उपवासमें संलग्न रहे। यह विष्णुसेवी पुरुषोंका धर्म बताया गया है।

जो सदन्न या कदन्नमें (उत्तम या निकृष्ट श्रेणीके अन्नमें), मिट्टीके ढेले अथवा सुवर्णमें सदा समभाव रखता है, वह संन्यासी कहा गया है। जो दण्ड, कमण्डलु तथा गेरुआ वस्त्रमात्र धारण करे, प्रतिदिन प्रवासमें रहे और एक स्थानपर अधिक दिनोंतक निवास न करे, उसे संन्यासी कहा गया है। जो लाभ आदिसे रहित होकर सदाचारी द्विजोंका दिया हुआ अन्न खाता है, किंतु किसीसे याचना नहीं करता, वह संन्यासी कहा गया है। जो व्यापार न करे, आश्रम बनाकर न रहे, समस्त वैदिक कर्मोंसे विलग रहे तथा निरन्तर नारायणका ध्यान करे, उसे सच्चा संन्यासी कहा गया है। जो सदा मौन रहे, ब्रह्मचर्यका पालन करे, दूसरोंसे बात न करे और सबको ब्रह्ममय देखे, उसे संन्यासी कहा गया है। जिसकी सर्वत्र समबुद्धि हो, जो हिंसा और माया आदिसे दूर रहता हो तथा क्रोध और अहंकारसे शून्य हो, वही सच्चा संन्यासी कहा गया है। जो बिना माँगे प्रस्तुत हुए मीठे अथवा स्वादरहित अन्नको समभावसे भोजन करता है, किंतु खानेके लिये किसीसे याचना नहीं करता, वह संन्यासी कहा गया है। जो स्त्रियोंका मुँह न देखे, उनके पास खड़ा न हो और काठकी बनी हुई नारीमूर्तिका भी स्पर्श न करे, वही सच्चा भिक्षु है। ब्रह्माजीने संन्यासियोंका यही धर्म बताया है। इसके विपरीत चलनेपर जन्म, मृत्यु और यमयातनाका भय सिरपर सवार रहता है अथवा पशु आदि क्षुद्र जन्तुओंकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। गर्भवासके समय सभी प्राणी अपने सैकड़ों

प्रकृतिखण्ड

२३३

जन्मोंके कर्मोंका स्मरण करते हैं; किंतु गर्भसे निकलते ही जीव विष्णुकी मायासे मोहित हो सब कुछ भूल जाता है।

देवता हो या कीट सभी यत्नपूर्वक अपने शरीरकी रक्षा करते हैं। स्त्रीकी योनिके भीतर जब पुरुषका वीर्य पड़ता है तो वह तत्काल उसके रक्तमें मिल जाता है। रक्तकी मात्रा अधिक होनेपर संतान माताके समान होती है और वीर्यकी अधिकता होनेपर संतानकी आकृति पितासे अधिक मिलती-जुलती है। ऋतुकालके बाद यदि युग्म दिनोंमें गर्भाधान हो तो पुत्रका जन्म होता है और विषम दिनोंमें आधान होनेपर कन्याकी उत्पत्ति होती है। युग्म दिनोंमें तथा रवि, मङ्गल और गुरुका वार होनेपर आधान हो तो पुत्र होता है। अन्य वारों तथा विषम दिनोंमें आधानसे कन्याका जन्म होता है। जिसका जन्म पहले पहरमें होता है, वह अल्पायु होता है, दूसरे पहरमें जन्म लेनेवालेकी आयु मध्यम होती है तथा तीसरे पहरमें जिसका जन्म होता है, वह दीर्घायु होता है। चतुर्थ पहरमें जन्म लेनेवाला चिरंजीवी माना जाता है। जिस क्षण या लग्नमें बालकका जन्म होता है, उस समयकी ग्रहस्थितिके अनुरूप उसका भावी जीवन हुआ करता है। वह पूर्वकर्मोंके अनुसार सुखी या दुःखी होता है। जैसे क्षणमें जन्म होता है, वैसे ही संतान होती है। प्रसवके क्षणकी चर्चा विद्वान् पुरुष ही करते हैं। रज-वीर्य परस्पर संयुक्त हो एक रातमें कललका आकार धारण करते हैं। फिर वह कलल दिनों-दिन बढ़ने लगता है। सातवें दिन उसकी आकृति बेरके समान होती है और एक मासमें वह लट्टूके समान हो जाता है। तीन महीना बीतते-बीतते वह बिना हाथ-पैरके मांसपिण्डके रूपमें परिणत हो जाता है। पाँचवें मासमें देहधारी जीवके सारे अवयव प्रकट हो जाते हैं। छठे महीनेमें जीवका संचार होता है। फिर वह सब तत्त्वोंको समझने लगता है। थोड़ी-सी जगहमें उसे रहना और सोना पड़ता है, इस बातको समझकर वह पिंजड़ेमें बँधे हुए पक्षीके समान दुःखी हो जाता है। अपवित्र स्थानमें रहकर वह माताके खाये हुए अन्न-पानका ही आहार करता है और 'हाय! हाय!' करके परमेश्वरका चिन्तन करने लगता है। इस तरह चार मासतक बड़ी भारी यातना भोगकर यथासमय वायुसे प्रेरित हो वह गर्भसे बाहर निकलता है। उस समय उसे दिशा, देश और कालका भान नहीं होता। विष्णुमायासे मोहित हो वह सब कुछ भूल जाता है। शैशवकालकी सीमातक वह शिशु सदा मल-मूत्रसे लिपटा रहता है। दूसरेके अधीन होता है। उसमें मच्छर आदिको हटानेकी भी शक्ति नहीं रहती। जब उसे कीड़े आदि काट खाते हैं, तब वह दुःखी होकर बारंबार रोता है। स्तन-पान करनेमें भी असमर्थ ही रहता है। अभीष्ट वस्तुकी याचना करनेके लिये उसकी वाणी नहीं निकलती। पौगण्डावस्थातक वह स्पष्ट बोल नहीं पाता। पौगण्डावस्थामें भी अनेक प्रकारकी यातना भोगकर जवान होता है। उस समय मायासे मोहित देहधारी जीव गर्भादिकी यातनाको भूल जाता है। आहार और मैथुनकी चिन्तासे पीड़ित तथा नाना प्रकारके मोह आदिसे वेष्टित होकर वह पुत्र, पत्नी तथा अनुचरोंका यत्नपूर्वक पालन करता है। जबतक वह उनके पालनमें समर्थ रहता है, तभीतक घरमें उसकी पूजा होती है—आदर-सत्कार होता है। असमर्थ हो जानेपर तो भाई-बन्धु उसे बूढ़े बैलकी भाँति व्यर्थका भार समझने लगते हैं। जब अत्यन्त जरा-जर्जर, जड एवं बधिर हो जाता है, खाँसी और दमा आदि रोग सताने लगते हैं तथा वह अत्यन्त मूढवत् हो सर्वथा दूसरोंके अधीन हो जाता है, तब सदा बारंबार पश्चात्ताप करने लगता है। वह कहता है—'अहो! मैंने श्रीहरिके तीर्थका तथा

२३४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सत्संगका भी स्वेच्छापूर्वक कभी सेवन नहीं किया। यदि पुनः भारतवर्षमें मनुष्यका जन्म पाऊँगा, तब तीर्थोंमें जाऊँगा और भगवान् श्रीकृष्णकी सेवा करूँगा।' देवेन्द्र! इस तरह संकल्प करते हुए उस जडको यथासमय आकर अत्यन्त भयंकर यमदूत पकड़ लेता है। वह उस दूतको देखता है। उसके हाथोंमें पाश और दण्ड होते हैं। उसकी आँखें अत्यन्त क्रोधसे लाल होती हैं, आकृति विकराल एवं भयंकर होती है। उसे किन्हीं भी उपायोंद्वारा रोक पाना कठिन होता है। वह बलिष्ठ, भयानक, दुर्दर्श, सम्पूर्ण सिद्धियोंका ज्ञाता तथा अन्य सबकी दृष्टिसे ओझल होता है। सामने खड़े हुए उस दूतपर दृष्टि पड़ते ही वह अत्यन्त भयभीत हो मल-मूत्रका त्याग करने लग जाता है। फिर तत्काल ही प्राणों तथा पाञ्चभौतिक देहको भी त्याग देता है।

यमदूत अंगूठेके बराबर आकारवाले जीवको लेकर भोगदेह (या यातना-शरीर)-में स्थापित कर देता है; तब उसे तीव्रगतिसे अपने स्थानपर ले जाता है। जीव वहाँ पहुँचकर सब धर्मोंके ज्ञाता यमराजको देखता है। वे रत्नसिंहासनपर सुस्थिरभावसे बैठकर मन्द-मन्द मुस्कराते दिखायी देते हैं। वे सर्वज्ञ हैं, धर्माधर्मके विचारको जानते हैं तथा सब ओर उनका मुख है। विधाताने पूर्वकालसे ही यमको सम्पूर्ण विश्वके नियमनका एकमात्र अधिकार दे रखा है। वे अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण करते हैं। रत्नमय आभूषणोंसे भूषित हैं, तीन करोड़ दूत और पार्षदगण उन्हें सदा घेरे रहते हैं। वे शुद्ध स्फटिकमणिकी माला लेकर उसके द्वारा श्रीकृष्णके नामोंका जप करते रहते हैं तथा रोमाञ्चित शरीरसे मन-ही-मन उनके युगल चरणारविन्दोंका ध्यान किया करते हैं। उस समय उनकी वाणी गद्गद होती है, नेत्रोंसे अश्रुधारा बहती रहती है। भगवान् यम सबपर समान दृष्टि रखते हैं। उनका रूप बहुत ही सुन्दर एवं कमनीय है। उनका शरीर सदा सुस्थिर यौवनसे सुशोभित होता है। वे अपने तेजसे उद्भासित होते रहते हैं। उनकी कान्ति शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी शोभाको लज्जित कर देती है। उनकी ओर सुखपूर्वक देखा जा सकता है। वे बड़े बुद्धिमान् हैं और चित्रगुप्तके सामने विराजमान रहते हैं। पुण्यात्माओंके समक्ष उनका रूप उपर्युक्त रूपसे शान्त ही रहता है, परंतु पापियोंको वे बड़े भयानक दिखायी देते हैं। उन्हें देखकर देहधारी जीव प्रणाम करता है और अत्यन्त भयभीत होकर खड़ा हो जाता है। सूर्यनन्दन यम चित्रगुप्तके साथ विचार करके जिनके लिये जो उचित होता है, वैसा ही शुभ या अशुभ फल प्रदान करते हैं। इस प्रकार उन जीवोंको आवागमनके चक्करसे कभी छुटकारा नहीं मिलता। श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंका सेवन ही जीवको उससे छुटकारा दिला सकता है।

देवराज! ये सब बातें मैंने आनुषङ्गिकरूपसे तुम्हें बतायी हैं, अब मनोवाञ्छित वर माँगो। वत्स! मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा। मेरे लिये कुछ भी असाध्य नहीं है।

महेन्द्रने कहा— याचकोंके लिये कल्पवृक्षस्वरूप मुनिश्रेष्ठ! मेरा इन्द्रत्व तो चला ही गया। अब ऐश्वर्यसे क्या प्रयोजन है? आप मुझे परमपद प्रदान कीजिये।

महेन्द्रकी यह बात सुनकर मुनिवर दुर्वासा हँसे और वेदोक्त सारतत्त्वस्वरूप सत्य वचन बोले।

मुनिने कहा— महेन्द्र! विषयी पुरुषोंके लिये परमपद अत्यन्त दुर्लभ है। तुम-जैसे लोगोंको तो प्राकृत प्रलय-कालमें भी मुक्ति नहीं मिल सकती। सृष्टिकालमें जीवोंका आविर्भाव तथा प्रलयकालमें तिरोभावमात्र होता है। ठीक उसी तरह, जैसे प्रातःकाल प्राणियोंका जागरण और रात्रिकालमें शयन हुआ करता है। जैसे काल-चक्र भ्रमण करता रहता है, उसी प्रकार

प्रकृतिखण्ड २३५

विषयी जीव भी ईश्वरकी इच्छासे गाड़ीके पहियेकी तरह सदा ही आवागमनका चक्कर काटते रहते हैं। साठ विपलोंका एक पल, साठ पलोंका एक दण्ड, दो दण्डोंका एक मुहूर्त, तीस मुहूर्तोंका एक दिन-रात, पंद्रह दिन-रातोंका एक पक्ष, शुक्ल और कृष्ण नामक दो पक्षोंका एक मास, दो मासोंकी एक ऋतु, तीन ऋतुओंका एक अयन, दो अयनोंका एक वर्ष, तैंतालीस लाख बीस हजार मानववर्षोंके चार युग तथा मनुष्योंके पचीस हजार पाँच सौ साठ चतुर्युगोंकी एक इन्द्रकी आयु होती है। यही एक मनुकी भी आयु कही गयी है। दस लाख आठ हजार इन्द्रोंका पतन हो जानेपर ब्रह्माजीकी आयु पूरी होती है। तभी 'प्राकृतिक लय' होता है। वत्स ! प्राकृतिक प्रलयके समय परमात्मा श्रीकृष्णकी पलकें गिरती हैं। जब फिर उनकी पलकें उठती या आँख खुलती है, तब पुनः नयी सृष्टिका आरम्भ होता है। श्रुतिमें ब्रह्माकी सृष्टि और प्रलयोंको असंख्य बताया गया है। जैसे पृथ्वीके धूलिकणोंकी गणना नहीं हो सकती, उसी तरह सृष्टि और प्रलयोंकी भी कोई गिनती नहीं है। यह चन्द्रशेखर शिवका कथन है। उपर्युक्त इन्द्रोंका मोक्ष नहीं होता। अतः देवराज ! तुम कोई दूसरा वर माँगो, जो सृष्टिसूत्रके अनुरूप हो।

मुने ! मुनीश्वर दुर्वासाकी यह बात सुनकर देवराजको बड़ा विस्मय हुआ। तब उन्होंने वहाँ अपने पूर्व-ऐश्वर्यका ही वरण किया। 'तुम अपने पूर्व ऐश्वर्यको शीघ्र ही प्राप्त कर लोगे'—ऐसा कहकर मुनि दुर्वासा अपने घरको चले गये।

नारदजीने पूछा—भगवान् श्रीहरिका गुणगान सुनकर इन्द्रको जब ज्ञान प्राप्त हो गया, तब उन्होंने घर जाकर क्या किया? यह मुझे बतानेकी कृपा करें।

भगवान् नारायण बोले—ब्रह्मन्! श्रीकृष्णका गुणगान सुनकर इन्द्र संसारके ऐश्वर्य-भोगसे विरक्त हो गये। वे दिनोंदिन अपने वैराग्यभावको बढ़ाने लगे। मुनिवर दुर्वासाके पाससे घर जाकर उन्होंने अपनी अमरावतीपुरीकी दशा देखी। वह दैत्यों तथा असुर-समूहोंसे भरी होनेके कारण भयसे व्याकुल जान पड़ती थी। उस पुरीमें कहीं तो उनके बन्धु-बान्धव विषादमें डूबे थे और कहीं-कहींके बन्धुजन पुरी छोड़कर बाहर चले गये थे। अपनी पुरीको पिता-माता-पत्नी आदिसे रहित, अत्यन्त हलचलसे पूर्ण तथा शत्रुओंसे आक्रान्त देखकर इन्द्रदेव गुरु बृहस्पतिके पास गये। उस समय शक्तिशाली बृहस्पतिजी मन्दाकिनीके तटपर विराजमान हो परब्रह्म परमात्माका ध्यान करते हुए देवराज इन्द्रको दृष्टिगोचर हुए। फिर देखा तो वे गङ्गाके जलमें पूर्वाभिमुख खड़े होकर सूर्यका अभिवादन कर रहे थे। उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू भरे थे। उनका शरीर पुलकित था। वे अत्यन्त आनन्दित थे। वे परम श्रेष्ठ, गाम्भीर्य-सम्पन्न, धर्मात्मा, श्रेष्ठ पुरुषोंसे सेवित, बन्धुवर्गमें आदरणीय, भ्रातृ-समुदायमें ज्येष्ठ तथा देव-शत्रुओंके लिये अनिष्टकारी गुरुवर बृहस्पतिजी मन्त्रका जप कर रहे थे। देवराज एक पहरतक उन्हें देखते रह गये। तत्पश्चात् उन्हें ध्यानसे उपरत देखकर प्रणाम किया। फिर वे गुरुदेवके चरणकमलोंमें मस्तक झुकाकर उच्चस्वरसे रोने लगे। तदनन्तर दुर्वासाजीके द्वारा दिये गये शापके सम्बन्धकी सारी बातें इन्द्रने बृहस्पतिजीको बतायीं। इन्द्रकी सारी बातें सुनकर परम बुद्धिमान् एवं वक्ताओंमें श्रेष्ठ बृहस्पतिजीने इस प्रकार कहा।

बृहस्पति बोले—सुरश्रेष्ठ ! मैं सब कुछ सुन चुका हूँ। तुम विषाद मत करो; मेरी बात सुनो। नीतिज्ञ पुरुष विपत्तिके अवसरपर कभी भी घबराता नहीं है; क्योंकि यह विपत्ति और सम्पत्ति स्वस्वरूपिणी है। इसे नश्वर कहा जाता है। यह सम्पत्ति और विपत्ति अपने ही

३०- भगवती स्वाहा तथा भगवती स्वधाका उपाख्यान, उनके ध्यान, पूजा-विधान तथा स्तोत्रोंका वर्णन

२३६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मका फल है। जीव स्वयं ही उन दोनोंका निर्माता है। प्रायः सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये प्रत्येक जन्ममें यही शाश्वत नियम है। चक्रकी भाँति वह सदा घूमता रहता है; फिर इस विषयमें चिन्ता किस बातकी ? शुभ हो अथवा अशुभ, जिस-किसी प्रकारके अपने कर्मफलको भोगनेके लिये ही पुरुष शरीर प्राप्त करता है। शतकोटि कल्प क्यों न बीत जायँ, किंतु बिना भोग किये कर्मका अन्त नहीं होता। अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। इस प्रकारकी बातें परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माजीको सम्बोधित करके सामवेदकी कौथुमी शाखामें कही हैं। किये हुए सम्पूर्ण कर्मोंका भोग शेष रह जानेपर कर्मानुसार प्राणियोंका भारतवर्षमें अथवा कहीं अन्यत्र जन्म होता है। करोड़ों जन्मोंके किये हुए कर्म प्राणीके पीछे लगे रहते हैं। पुरन्दर ! छायाकी भाँति वे बिना भोगे अलग नहीं होते। काल, देश और पात्रके भेदसे कर्मोंमें न्यूनाधिकता हुआ ही करती है। जिस प्रकार कुशल कुम्भकार दण्ड, चक्र, शराव और भ्रमणके द्वारा क्रमशः मिट्टीसे सुन्दर घटका निर्माण कर लेता है, उसी प्रकार विधाता कर्मसूत्रसे प्राणियोंको फल प्रदान करते हैं। अतः देवराज ! जिनकी आज्ञासे इस जगत्की सृष्टि हुई है, उन भगवान् नारायणकी तुम उपासना करो। वे प्रभु त्रिलोकीमें विधाताके विधाता, रक्षकके रक्षक, स्रष्टाके स्रष्टा, संहर्ताके संहारकर्ता तथा कालके भी काल हैं। जो पुरुष महान् विपत्तिके अवसरपर उन भगवान् मधुसूदनका स्मरण करता है, उसके लिये उस विपत्तिमें भी सम्पत्तिकी ही भावना उत्पन्न हो जाती है; ऐसा भगवान् शंकरने आदेश दिया है*।

नारद! इस प्रकार कहकर तत्त्वज्ञानी बृहस्पतिजीने देवराज इन्द्रको हृदयसे लगा लिया और शुभाशीर्वाद देकर उन्हें पूर्णरूपसे सारी बातें समझा दीं।

(अध्याय ३५—३७)

भगवती लक्ष्मीका समुद्रसे प्रकट होना और इन्द्रके द्वारा महालक्ष्मीके ध्यान तथा स्तवन किये जाने और पुनः अधिकार प्राप्त किये जानेका वर्णन

**भगवान् नारायण कहते हैं—**नारद! तदनन्तर भगवान् श्रीहरिका ध्यान करके देवराज इन्द्रने बृहस्पतिजीको आगे करके सम्पूर्ण देवताओंके साथ ब्रह्माकी सभाके लिये प्रस्थान किया। वे शीघ्र ही वहाँ पहुँच गये। सबको ब्रह्माजीके दर्शन हुए। इन्द्र और बृहस्पतिसहित समस्त देवताओंने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् देवगुरु बृहस्पतिजीने ब्रह्माजीको सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उनकी बात सुनकर ब्रह्माजी हँस पड़े। उन्होंने देवराजसे कहा।

**ब्रह्माजी बोले—**वत्स ! तुम मेरे वंशज हो। तुम्हें उत्तम बुद्धि प्राप्त है। मेरे प्रपौत्र हो। बृहस्पतिजी तुम्हारे गुरु हैं और तुम स्वयं भी देवताओंके स्वामी हो। परम प्रतापी विष्णुभक्त दक्ष प्रजापति तुम्हारे मातामह हैं। भला, जिसके तीनों कुल ऐसे पवित्र हों, वह सुयोग्य पुरुष अहंकार क्यों करे ? जिसकी माता परम पतिव्रता, पिता शुद्धस्वरूप और मातामह एवं मातुल जितेन्द्रिय हों, वह व्यक्ति अहंकारी क्यों बन जाय ? क्योंकि यदि पिता, मातामह और गुरु—ये तीन दोषी हों


* महाविपत्तौ संसारे यः स्मरेन्मधुसूदनम्। विपत्तौ तस्य सम्पत्तिर्भवेदित्याह शङ्करः॥
(प्रकृतिखण्ड ३७। ४०)

प्रकृतिखण्ड २३७

तो इन्हींके दोषसे सम्पन्न होकर पुरुष भगवान् श्रीहरिका द्रोही बन सकता है—यह निश्चित है। सर्वान्तरात्मा भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरमें विराजमान रहते हैं। उनके देहसे निकल जानेपर उसी क्षण प्राणी शव बन जाता है। वे स्वामी हैं और हम सब लोग उनके अनुचर हैं। मैं प्राणियोंके शरीरमें इन्द्रियोंका स्वामी मन होकर रहता हूँ। शंकर ज्ञानका रूप धारण करके रहते हैं। विष्णुके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी भगवती श्रीराधा प्रकृतिके रूपमें विराजमान रहती हैं। बुद्धिको साध्वी दुर्गाका रूप माना गया है। निद्रा एवं क्षुधा आदि—ये सभी भगवती प्रकृतिकी कलाएँ हैं। आत्माका जो बुद्धिमें प्रतिबिम्ब है, वही जीव है। उसीने इस भोग-शरीरको धारण कर रखा है। जब शरीरका स्वामी आत्मा देहसे निकलकर जाने लगता है, तब ये सब भी तुरंत उसीके साथ-साथ चल पड़ते हैं; जैसे रास्तेमें वरके आगे चलनेपर सभी बराती सज्जन उसका अनुसरण करते हैं। मैं, शिव, शेषनाग, विष्णु, धर्म एवं महाविराट् तथा तुम सब लोग—ये सब जिनके अंश और भक्त हैं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके निर्माल्यरूप पुष्पका तुमने अपमान कर दिया है। भगवान् शिवने जिस पुष्पसे उन श्रीहरिके चरणकमलोंकी पूजा की थी, वही पुष्प सौभाग्यवश मुनिवर दुर्वासाकी कृपासे तुम्हें प्राप्त हुआ था; परंतु तुमने उसका सम्मान नहीं किया। भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलसे च्युत पुष्प जिसके मस्तकपर स्थान पाता है, वह सौभाग्यशाली व्यक्ति सम्पूर्ण देवताओंमें प्रधान माना जाता है और उसीकी पहले पूजा होती है। हाय! दैवने तुम्हें ठग लिया। वास्तवमें दैव बड़ा प्रबल होता है। इस समय भगवान् श्रीकृष्णके निर्माल्यका परित्याग करनेसे रोषमें आकर भगवती श्रीदेवी तुम्हारे पाससे चली गयी हैं। अब तुम मेरे तथा बृहस्पतिके साथ वैकुण्ठमें चलो। मैं वर देता हूँ, अतः तुम वहाँ लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरिकी सेवा करके लक्ष्मीको अवश्य प्राप्त कर लोगे।

नारद! इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओंको साथ ले वैकुण्ठलोकमें गये। वहाँ जानेपर उन्हें परब्रह्म सनातन भगवान् श्रीहरिके दर्शन हुए। उस समय वे तेजःपुञ्ज प्रभु अपने ही तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उनका श्रीविग्रह ऐसा जान पड़ता था, मानो ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक असंख्य सूर्य एक साथ चमक रहे हों। वे आदि, मध्य और अन्तसे रहित लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरि शान्तरूपसे विराजमान थे। वे चार भुजावाले पार्षदोंसे और भगवती सरस्वतीसे युक्त थे। चारों वेदोंसहित भगवती गङ्गा भक्ति प्रदर्शित करती हुई उनके पास विराजमान थीं। उन्हें देखकर ब्रह्माके अनुयायी सम्पूर्ण देवताओंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। उनके प्रत्येक अङ्गमें भक्ति और विनयका विकास हो चुका था। आँखोंमें आँसू भरकर वे परम प्रभु भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करने लगे। स्वयं ब्रह्माजीने हाथ जोड़कर भगवान्‌से यथावत् समस्त वृत्तान्त कह सुनाया। उस समय समस्त देवता अपने अधिकारसे च्युत होनेके कारण रो रहे थे। विपत्तिने उनके हृदयमें भलीभाँति स्थान प्राप्त कर लिया था। भयके कारण उनमें घबराहटकी सीमा नहीं थी। उनके शरीरपर एक भी रत्न या आभूषण नहीं था। वे सवारीसे भी रहित थे। उन सभीके मुख म्लान थे। श्री तो पहले ही उनका साथ छोड़ चुकी थी। वे निस्तेज एवं भयग्रस्त थे। कुछ भी करनेकी शक्ति उनमें नहीं रह गयी थी। देवताओंको ऐसी दीन दशामें पड़े हुए देखकर भयको दूर करनेवाले भगवान् श्रीहरिने उनसे कहा।

भगवान् श्रीहरि बोले—ब्रह्मन् तथा देवताओ! भय मत करो। मेरे रहते तुमलोगोंको किस बातका भय है। मैं तुम्हें परम ऐश्वर्यको बढ़ानेवाली अचल लक्ष्मी प्रदान करूँगा; परंतु मैं कुछ

३३- भगवती स्वाहाको श्रीकृष्णका प्रत्यक्ष दर्शन

२३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण समयोचित बात कहता हूँ, तुमलोग उसपर ध्यान दो। मेरे वचन हितकर, सत्य, सारभूत एवं परिणाममें सुखावह हैं। जैसे अखिल विश्वके सम्पूर्ण प्राणी निरन्तर मेरे अधीन रहते हैं, वैसे ही मैं भी अपने भक्तोंके अधीन हूँ। मैं अपनी इच्छासे कभी कुछ नहीं कर सकता। सदा मेरे भजन- चिन्तनमें लगे रहनेवाला निरङ्कुश भक्त जिसपर रुष्ट हो जाता है, उसके घर लक्ष्मीसहित मैं नहीं ठहर सकता-यह बिलकुल निश्चित है। मुनिवर दुर्वासा महाभाग शंकरके अंश एवं वैष्णव पुरुष हैं। उनके हृदयमें मेरे प्रति अटूट श्रद्धा भी है। उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया है। अतएव तुम्हारे घरसे लक्ष्मीसहित मैं चला आया हूँ; क्योंकि जहाँ शङ्खध्वनि नहीं होती, तुलसीका निवास नहीं रहता, शंकरकी पूजा नहीं होती तथा ब्राह्मणोंको भोजन नहीं कराया जाता, वहाँ लक्ष्मी नहीं रहतीं। ब्रह्मन् तथा देवताओ ! जहाँ मेरे भक्तोंकी निन्दा होती है, वहाँ रहनेवाली महालक्ष्मीके मनमें अपार क्रोध उत्पन्न हो जाता है। अतः वे उस स्थानको छोड़कर चल देती हैं। जो मेरी उपासना नहीं करता तथा एकादशी और जन्माष्टमीके दिन अन्न खाता है, उस मूर्ख व्यक्तिके घरसे भी लक्ष्मी चली जाती हैं। जो मेरे नामका तथा अपनी कन्याका विक्रय करता है एवं जहाँ अतिथि भोजन नहीं पाता, उस घरको त्यागकर मेरी प्रिया लक्ष्मी अन्यत्र चली जाती हैं। जो ब्राह्मण पुंश्चलीके उदरसे उत्पन्न हुआ है अथवा पुंश्चलीका पति है, उसे 'महापापी' कहा गया है। उसके घर लक्ष्मी नहीं ठहर सकतीं। जो ब्राह्मण बैल जोतता है, वह कमलालया भगवती लक्ष्मीका प्रेमभाजन नहीं हो सकता। अतः उसके यहाँसे वे चल देती हैं। जो अशुद्धहृदय, क्रूर, हिंसक और निन्दक है, उस ब्राह्मणके हाथका जल पीनेमें भगवती लक्ष्मी डरती हैं, अतः उसके घरसे वे चल देती हैं। जो शूद्रोंसे यज्ञ कराता है, कायर व्यक्तियोंका अन्न खाता है, निष्प्रयोजन तृण तोड़ता है, नखोंसे पृथ्वीको कुरेदता रहता है; जो निराशावादी है, सूर्योदयके समय भोजन करता है, दिनमें सोता और मैथुन करता है और जो सदाचारहीन है, ऐसे मूर्खोंके घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं। जो अल्पज्ञानी व्यक्ति भीगे पैर अथवा नंगा होकर सोता है तथा निरन्तर बेसिर-पैरकी बातें बकता रहता है, उसके घरसे साध्वी लक्ष्मी चली जाती हैं। जो सिरपर तैल लगाकर उसीसे दूसरेके अङ्गको स्पर्श करता है अर्थात् अपने सिरका तैल दूसरेको लगाता है तथा अपनी गोदमें बाजा लेकर उसे बजाता है, उसके घरसे रुष्ट होकर लक्ष्मी चली जाती हैं। जो द्विज व्रत, उपवास, संध्या और विष्णुभक्तिसे हीन है, उस अपवित्र पुरुषके घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं। जो ब्राह्मणोंकी निन्दा तथा उनसे द्वेष करता है, जीवोंकी सदा हिंसा करता है और दयारहित है, उसके घरसे जगज्जननी लक्ष्मी चली जाती हैं। जिस स्थानपर भगवान् श्रीहरिकी चर्चा होती है और उनके गुणोंका कीर्तन होता है, वहींपर सम्पूर्ण मङ्गलोंको भी मङ्गल प्रदान करनेवाली भगवती लक्ष्मी निवास करती हैं। पितामह ! जहाँ भगवान् श्रीकृष्णका तथा उनके भक्तोंका यश गाया जाता है, वहीं उनकी प्राणप्रिया भगवती लक्ष्मी सदा विराजती हैं। जहाँ शङ्खध्वनि होती है तथा शङ्ख, शालग्राम, तुलसी-इनका निवास रहता है एवं उनकी सेवा, वन्दना और ध्यान होता है, वहाँ लक्ष्मी सदा विद्यमान रहती हैं। जहाँ शिवलिङ्गकी पूजा और पवित्र कीर्तन तथा दुर्गापूजन एवं कीर्तन होता है, वहाँ कमलालया लक्ष्मी निवास करती हैं। जहाँ ब्राह्मणोंकी सेवा होती है, उन्हें उत्तम पदार्थ भोजन कराये जाते हैं तथा सम्पूर्ण देवताओंका अर्चन होता है, वहाँ

प्रकृतिखण्ड २३९

पद्ममुखी साध्वी लक्ष्मी विराजती हैं।

नारद! रमापति भगवान् श्रीहरिने सम्पूर्ण देवताओंसे यों कहकर श्रीलक्ष्मीसे कहा—'देवि! तुम अपनी कलासे क्षीरसमुद्रके यहाँ जाकर जन्म धारण करना स्वीकार कर लो।' इस प्रकार लक्ष्मीसे कहनेके पश्चात् उन जगत्प्रभुने पुनः ब्रह्मासे कहा—'पद्मज! तुम समुद्रका मन्थन करो, उससे लक्ष्मी प्रकट होंगी। तब उन्हें देवताओंको सौंप देना।' मुने! यों अपना प्रवचन समाप्त करके कमलाकान्त भगवान् श्रीहरि अन्तःपुरमें चले गये। देवता उसी क्षण क्षीरसागरकी ओर चल पड़े। वहाँ सभी देवता और दानव एकत्रित हुए। मन्दराचल पर्वतको मन्थनकाष्ठ, कच्छपको पात्र तथा शेषनागको मन्थनकी रस्सी बनाकर वे क्षीरसमुद्रको मथने लगे। फलस्वरूप धन्वन्तरि वैद्य, अमृत, उच्चैःश्रवा घोड़ा, विविध रत्न, हाथियोंमें रत्न ऐरावत, लक्ष्मी, सुदर्शनचक्र तथा वनमाला—ये अमूल्य पदार्थ उन्हें प्राप्त हुए। मुने! उस समय भगवान् विष्णुमें अपार श्रद्धा रखनेवाली साध्वी श्रीलक्ष्मीने क्षीरशायी सर्वेश्वर श्रीहरिके गलेमें वनमाला पहना दी। फिर देवता, ब्रह्मा और शंकरके पूजन एवं स्तवन करनेपर उन्होंने देवताओंके भवनपर केवल दृष्टि फैला दी। इतनेमें ही देवताओंने दुर्वासामु निके शापसे मुक्त होकर दैत्योंके हाथमें गये हुए अपने राज्यको प्राप्त कर लिया। नारद! यों महालक्ष्मीकी कृपासे वर पाकर वे परम सुखी हो गये।

इस प्रकार महालक्ष्मीका सम्पूर्ण श्रेष्ठ उपाख्यान मैंने बतला दिया। इस सारभूत उपाख्यानके प्रभावसे समस्त सुख प्राप्त हो जाता है। अब पुनः तुम क्या सुनना चाहते हो ?

नारदजीने कहा— प्रभो! मैं भगवान् श्रीहरिका मङ्गलमय गुणानुवर्णन, उत्तम ज्ञान तथा भगवती लक्ष्मीका अभीष्ट उपाख्यान सुन चुका। अब आप ध्यान और स्तोत्रका प्रसङ्ग बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायण कहते हैं— नारद! प्राचीन समयकी बात है, देवराज इन्द्रने क्षीर-समुद्रके तटपर तीर्थमें स्नान किया, दो स्वच्छ वस्त्र पहने, एक कलश स्थापित किया और छः देवताओंकी पूजा की। वे छः देवता हैं—गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और दुर्गा। इन देवताओंकी गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंसे भक्तिपूर्वक भलीभाँति पूजा करनेके पश्चात् इन्द्रने परम ऐश्वर्यस्वरूपिणी भगवती महालक्ष्मीका आवाहन किया। अपने पुरोहित बृहस्पति तथा ब्रह्माजीके बताये अनुसार पूजा सम्पन्न की। मुने! उस समय उस पवित्र देशमें अनेक मुनिगण, ब्राह्मण-समाज, गुरुदेव, श्रीहरि, देववृन्द तथा आनन्दमय ज्ञानस्वरूप भगवान् शंकर विराजमान थे। नारद! देवराजने पारिजातका चन्दन-चर्चित पुष्प लेकर भगवती महालक्ष्मीका ध्यान किया और उनकी पूजा की। पूर्वकालमें भगवान् श्रीहरिने ब्रह्माजीको जो ध्यान बतलाया था, उसी सामवेदोक्त ध्यानसे इन्द्रने भगवतीका चिन्तन किया। मैं वह ध्यान तुम्हें बताता हूँ, सुनो—'परम-पूज्या भगवती महालक्ष्मी सहस्र दलवाले कमलकी कर्णिकाओंपर विराजमान हैं। इनकी सुन्दर साड़ी शरत्पूर्णिमाके करोड़ों चन्द्रमाओंकी शोभासे सम्पन्न है। ये परम साध्वी

३४- पितरोंकी प्रार्थनापर ब्रह्माजीद्वारा मानसी कन्या (स्वधा)-को प्रकट करना तथा उसे पत्नीरूपमें पितरोंको सौंपना

२४० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


देवी स्वयं अपने तेजसे प्रकाशित हो रही हैं। इन परम मनोहर देवीका दर्शन पाकर मन आनन्दसे खिल उठता है। इनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है। रत्नमय भूषण इनकी छवि बढ़ा रहे हैं। इन्होंने पीताम्बर पहन रखा है। इन प्रसन्न वदनवाली भगवती महालक्ष्मीके मुखपर मुस्कान छा रही है। ये सदा युवावस्थासे सम्पन्न रहती हैं और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको देनेवाली हैं। ऐसी कल्याणस्वरूपिणी भगवती महालक्ष्मीकी मैं उपासना करता हूँ।'

नारद! इस प्रकार ध्यान करके ब्रह्माजीके आज्ञानुसार सोलह प्रकारके उपचारोंसे देवराज इन्द्रने असंख्य गुणोंवाली उन भगवती महालक्ष्मीकी पूजा की। प्रत्येक वस्तुको भक्तिपूर्वक मन्त्र पढ़ते हुए विधिके साथ समर्पण किया। अनेक प्रकारकी उत्तम वस्तुएँ प्रचुर मात्रामें उपस्थित कीं। [आसन—] 'भगवती महालक्ष्मी! जो अमूल्य रत्नोंका सार है तथा विश्वकर्मा जिसके निर्माता हैं, ऐसा यह विचित्र आसन सेवामें प्रस्तुत है, इसे स्वीकार कीजिये। [पाद्य—] कमलालये! इस शुद्ध गङ्गा-जलको सब लोग मस्तकपर चढ़ाते हैं। सभीको इसे पानेकी इच्छा लगी रहती है। पापरूपी ईंधनको जलानेके लिये यह अग्निस্বরূপ है। आप इसे पाद्यरूपमें स्वीकार करें। [अर्घ्य—] पद्मवासिनि! शङ्खमें पुष्प, चन्दन, दूर्वा आदि श्रेष्ठ वस्तुएँ तथा गङ्गाजल रखकर शुद्ध अर्घ्य प्रस्तुत है। इसे ग्रहण कीजिये। [सुगन्धित तैल—] श्रीहरिप्रिये! यह उत्तम गन्धवाले पुष्पोंसे सुवासित तैल तथा सुगन्धपूर्ण आमलकी फल शरीरकी सुन्दरता बढ़ानेका परम साधन है। आप इस स्नानोपयोगी वस्तुको स्वीकार करें। [धूप—] श्रीकृष्णकान्ते! वृक्षका रस सूखकर निर्यास (गोंद)-के रूपमें परिणत हो गया है। इसमें सुगन्धित द्रव्य मिला दिये गये हैं। ऐसा यह पवित्र धूप स्वीकार कीजिये। [चन्दन—] देवि! यह मनोहर चन्दन मलयगिरिसे उत्पन्न हुआ है। यह चन्दन-वृक्षका सार तत्त्व है, सुगन्धयुक्त एवं सुखदायक है। सेवामें समर्पित हुए इस चन्दनको स्वीकार करें। [दीप—] परमेश्वरि! जो जगत्के लिये चक्षुःस्वरूप है, जिसके सामने अन्धकार टिक नहीं सकता तथा जो शुद्धस्वरूप है, ऐसे इस प्रज्वलित दीपको स्वीकार कीजिये। [नैवेद्य—] देवि! यह नाना प्रकारका उपहारस्वरूप नैवेद्य नाना प्रकारके रससे पूर्ण तथा विविध स्वादसे युक्त है। इसे स्वीकार कीजिये। [अन्न—] देवि! अन्नको ब्रह्मस्वरूप माना गया है। प्राणकी रक्षा इसीपर निर्भर है। तृप्ति और पुष्टि प्रदान करना इसका सहज गुण है। आप इसे ग्रहण कीजिये। [खीर—]महालक्ष्मी! यह उत्तम पक्वान्न (खीर) चीनी और घृतसे युक्त है, इसे अगहनीके चावलसे तैयार किया गया है। आप कृपया इसे स्वीकार कीजिये। [स्वस्तिक नामक मिष्टान्न—] लक्ष्मि! शर्करा और घृतमें सिद्ध किया हुआ यह परम मनोहर स्वादिष्ट स्वस्तिक नामक नैवेद्य है। इसे आपकी सेवामें समर्पित किया गया है, स्वीकार करें। [फल—] कमले! ये अनेक प्रकारके सुन्दर पके हुए फल हैं, जो स्वादिष्ट होनेके साथ ही मनोवाञ्छित फल देनेवाले हैं। इन्हें ग्रहण कीजिये। [दुग्ध—] अच्युतप्रिये! सुरभी गौके स्तनसे निकला हुआ यह मृत्युलोकके लिये अमृतस्वरूप परम सुस्वादु दुग्ध है। आप इसे स्वीकार कीजिये। [गुड़—] देवि! ईखके स्वादभरे रसको अग्निपर पकाकर बनाया गया यह गुड़ है। इसे ग्रहण कीजिये। [मिष्टान्न—] देवि! जौ, गेहूँ आदिके