भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२२४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

शस्त्रोंसे क्षत-विक्षत हो जाय तो भी जिनका भय मानकर काल उसे अकालमें नहीं ले जा सकता तथा जिनकी आज्ञा मिल जानेपर फूल और चन्दनसे सजी हुई सेजपर तन्त्र-मन्त्र तथा भाई-बन्धुओंसे सुरक्षित होकर सोते हुए मनुष्यको भी काल समय आनेपर अवश्य उठा ले जाता है, वे भगवान् ही सर्वोपरि हैं। उनके भयसे ही काल सब कुछ करता है। उन्हींकी आज्ञासे वायु जलराशिको, जलराशि कच्छपको, कच्छप शेषनागको, शेषनाग पृथ्वीको तथा क्षमारूप पृथ्वी समुद्रों, सातों पर्वतों तथा नाना प्रकारके रूपवाले चराचर जगत्को धारण करती है। उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूत प्रकट होते और अन्तमें उन्हींके भीतर लीन हो जाते हैं।

पतिव्रते ! इकहत्तर दिव्य युगोंकी इन्द्रकी आयु होती है। ऐसे अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन हो जानेपर ब्रह्माका एक दिन-रात होता है। इसी प्रकार तीस दिनोंका एक मास, दो मासोंकी एक ऋतु तथा छः ऋतुओंका एक वर्ष होता है। ऐसे सौ वर्षकी ब्रह्माकी आयु होती है। जबतक ब्रह्माका पतन नहीं होता तबतक श्रीहरिकी आँखें खुली रहती हैं—उनकी पलक उठी रहती है। जब वे आँख मूँदते या पलक गिराते हैं, तब ब्रह्माजीका पतन एवं प्रलय होता है। उसीको 'प्राकृतिक प्रलय' कहते हैं। उस प्राकृतिक प्रलयके समय सम्पूर्ण प्राकृत पदार्थ एवं देवता आदि चराचर प्राणी ब्रह्मामें लीन हो जाते हैं और ब्रह्मा भगवान् श्रीकृष्णके नाभिकमलमें लीन हो जाते हैं। क्षीरसागरमें शयन करनेवाले श्रीविष्णु तथा वैकुण्ठवासी चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णके वामपार्श्वमें लीन हो जाते हैं। रुद्र और भैरव आदि जितने भी शिवके अनुगामी हैं, वे मङ्गलाधार सनातन ज्ञानानन्दस्वरूप शिवमें लीन होते हैं। ज्ञानके अधिष्ठाता भगवान् शिव उन परमात्मा महादेव श्रीकृष्णके ज्ञानमें विलीन हो जाते हैं। सम्पूर्ण शक्तियाँ विष्णुमाया दुर्गामें तिरोहित हो जाती हैं। विष्णुमाया दुर्गा भगवान् श्रीकृष्णकी बुद्धिमें स्थान ग्रहण कर लेती हैं; क्योंकि वे उनकी बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं। नारायणके अंश स्वामिकार्तिकेय उनके वक्षःस्थलमें लीन हो जाते हैं। सुव्रते ! गणोंके स्वामी देवेश्वर गणेशको भगवान् श्रीकृष्णका अंश माना गया है। वे उनकी दोनों भुजाओंमें प्रविष्ट हो जाते हैं। लक्ष्मीकी अंशभूता देवियाँ लक्ष्मीमें तथा लक्ष्मी श्रीराधामें लीन हो जाती हैं। गोपियाँ तथा सम्पूर्ण देवपत्नियां भी श्रीराधामें ही लीन हो जाती हैं। भगवान् श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधीश्वरी देवी श्रीराधा उनके प्राणोंमें निवास कर जाती हैं। सावित्री, वेद एवं सम्पूर्ण शास्त्र सरस्वतीमें प्रवेश कर जाते हैं। सरस्वती परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णकी जिह्वामें विलीन हो जाती हैं। गोलोकके सम्पूर्ण गोप भगवान् श्रीकृष्णके रोमकूपोंमें लीन हो जाते हैं। उन प्रभुके प्राणोंमें सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राणस्वरूप वायुका, उनकी जठराग्निमें समस्त अग्नियोंका तथा उनकी जिह्वाके अग्रभागमें जलका लय हो जाता है। जो सारसे भी सारतर हैं तथा भक्तिरसामृतका पान करते हैं, वे भक्त वैष्णवजन अत्यन्त आनन्दित हो उन भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें विलीन हो जाते हैं। क्षुद्र विराट् महान् विराट्में और महान् विराट् परमात्मा श्रीकृष्णमें लीन हो जाते हैं। श्रीकृष्णके ही रोमकूपोंमें सम्पूर्ण विश्वकी स्थिति है। उन्हींके आँख मीचनेपर महाप्रलय होता है तथा उनकी आँख खुलते ही पुनः सृष्टिका कार्य आरम्भ हो जाता है। भगवान्‌की पलक जितनी देर उठी या खुली रहती है, उतनी ही देरतक बंद भी रहती है। दोनोंमें बराबर ही समय लगता है। ब्रह्माके सौ वर्षोंतक सृष्टि चालू रहती है, फिर उतने ही समयके लिये प्रलय हो जाता है। सुव्रते!