ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड
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निःशङ्क, निर्गुण (प्राकृतगुणरहित), निरामय, निर्लिप्त, सर्वसाक्षी, सर्वाधार एवं परात्पर हैं। प्रकृति उन्हींसे उत्पन्न हुई है और सम्पूर्ण प्राकृत पदार्थ प्रकृतिके कार्य हैं। स्वयं परमपुरुष श्रीकृष्ण ही प्रकृति हैं और वे प्रकृतिसे परे भी हैं। रूपहीन होते हुए भी भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये वे नाना प्रकारके रूप धारण करते हैं। उनका दिव्य चिन्मय स्वरूप अत्यन्त कमनीय, सुन्दर और परम मनोहर है। वे नवीन मेघमालाके समान श्याम कान्ति धारण करते हैं। उनकी किशोर अवस्था है। वे गोपवेषमें सुशोभित होते हैं। कोटि-कोटि कामदेवोंकी लावण्यलीलाके धाम हैं। उनकी मोहिनी झाँकी मनको मोहे लेती है। उनके नेत्र शरत्कालके मध्याह्नमें पूर्णतः विकसित हुए कमलोंकी शोभाको छीने लेते हैं। उनका मुख शरत्पूर्णिमाके करोड़ों चन्द्रमाओंकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाला है। अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित दिव्य आभूषण उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। मन्द मुस्कानसे सुशोभित मुख एवं सर्वाङ्ग बहुमूल्य पीताम्बरसे सतत शोभायमान है। वे परब्रह्मस्वरूप हैं और ब्रह्मतेजसे उद्भासित होते हैं। भक्तजनोंको सुखपूर्वक उनका दर्शन सुलभ होता है। वे शान्तस्वरूप राधा-वल्लभ अनन्त गुण और महिमासे सम्पन्न हैं। प्रेममयी गोपियाँ सब ओरसे घेरकर उन्हें मन्द मुस्कराहटके साथ निहारती रहती हैं। वे रासमण्डलके मध्यभागमें रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनके दो भुजाएँ हैं। वे वनमालासे विभूषित हैं और मुरली बजा रहे हैं। मणिराज कौस्तुभ सदा ही उनके वक्षःस्थलको उद्भासित करता रहता है। केसर, रोली, अबीर, कस्तूरी तथा चन्दनसे उनका श्रीविग्रह चर्चित है। वे मनोहर चम्पा, कमल और मालतीकी मालाओंसे अलंकृत हैं। चारु चम्पाके फूलोंसे सुशोभित चूड़ामणि (मुकुट)-की बंकिमा (लटक) उनके मनोहर सौन्दर्यकी वृद्धि कर रही है।
भक्ति-रससे ओतप्रोत भक्तजन भगवान् श्रीकृष्णके ऐसे ही स्वरूपका ध्यान करते हैं। जगद्धाता ब्रह्मा उन्हींका भय मानकर सृष्टिका विधान तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके भाग्यका उनके कर्मके अनुसार लेखन करते हैं। उन्हींकी आज्ञाके अनुसार सबको तपस्याओं तथा कर्मोंका फल देते हैं। उन्हींके भयसे पालक भगवान् विष्णु सदा सबका पालन करते हैं। उनसे भीत रहनेवाले कालाग्निरुद्रद्वारा अखिल जगत्का संहार होता है। जो ज्ञानियोंके गुरु-के-गुरु एवं मृत्युञ्जय नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिव हैं, वे भी उन्हींको जानने तथा उनका ज्ञान प्रदान करनेसे सिद्धेश, योगीश तथा सर्वज्ञ हुए हैं। भक्ति एवं ज्ञानसे युक्त तथा परमानन्दसे सम्पन्न हैं। साध्वि! उन्हींके कृपा-प्रसादसे शीघ्रगामियोंमें श्रेष्ठ पवनदेवता चलते तथा सूर्य उन्हींके भयसे निरन्तर तपते हैं। उन्हींकी आज्ञाके अनुसार इन्द्र वर्षा करते, मृत्यु समस्त प्राणियोंपर प्रभाव डालती, अग्नि जलाती एवं जल शीतल रहता तथा अत्यन्त भयभीत दिक्पाल दिशाओंकी रक्षा करते हैं। उन्हींके भयसे ग्रह राशिचक्रोंपर भ्रमण करते हैं। वृक्ष जो फूलते और फलते हैं, इसमें भी उनका भय ही कारण है। उन्हींकी आज्ञासे फल पकते हैं तथा बहुत-से वृक्ष फलहीन रह जाते हैं। उनकी आज्ञासे ही जलचर जीव स्थलमें और स्थलचर प्राणी जलमें जीवित नहीं रह पाते हैं। उन्हींके भयसे मैं (यमराज) धर्माधर्मके विषयमें नियन्त्रण करता हूँ। उनकी आज्ञासे ही काल सबको अपना ग्रास बनाता और सर्वत्र चक्कर लगाता ही रहता है। उन्हींके भयसे मृत्यु तथा काल किसीको असमयमें नहीं मार सकते। कोई जलती हुई आगमें या गहरे जलाशय अथवा समुद्रमें गिर जाय, वृक्षके ऊपरसे नीचे पड़ जाय, तीखी तलवारपर गिर पड़े, सर्प आदिके मुँहमें पड़ जाय, संग्राममें तथा अन्य विषम संकटोंमें फँसकर नाना प्रकारके अस्त्र-