भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 235

प्रकृतिखण्ड २२५

ब्रह्माकी सृष्टि और प्रलयकी कोई गिनती ही नहीं है। ठीक उसी तरह, जैसे भूमिके धूलिकणोंकी कोई गणना नहीं की जा सकती। जिन सर्वान्तरात्मा श्रीकृष्णके नेत्रोंकी पलक गिरते ही जगत्‌का प्रलय हो जाता है और पलकके उठते ही उन परमेश्वरकी इच्छासे सृष्टि आरम्भ हो जाती है, उनके गुणोंका कीर्तन करनेमें कौन समर्थ है? मैंने पिताजीके मुखसे जैसा-जैसा सुना है, वैसा-वैसा आगमोंके अनुसार वर्णन किया है।

चारों वेदोंने मुक्तिके चार भेद बतलाये हैं। उन सबसे प्रभुकी भक्तिको श्रेष्ठ माना गया है; क्योंकि इसके सामने सभी तुच्छ हैं। भक्ति मुक्तिसे भी बड़ी है। एक मुक्ति 'सालोक्य' प्रदान करनेवाली, दूसरी 'सारूप्य' देनेमें निपुण, तीसरी 'सामीप्य' प्रदान करनेवाली है और चौथी 'निर्वाणपद' पर पहुँचानेवाली कही जाती है। भक्त पुरुष परमप्रभु परमात्माकी सेवा छोड़कर इन मुक्तियोंकी इच्छा नहीं करते। वे सिद्धत्व, अमरत्व और ब्रह्मत्वकी भी अवहेलना करते हैं। मुक्ति सेवारहित होती है और भक्तिमें निरन्तर सेवाभावका उत्कर्ष होता रहता है। यही भक्ति और मुक्तिका भेद है। अब निषेकका लक्षण सुनो। विद्वान् पुरुष कहते हैं कि किये हुए कर्मोंका भोग ही निषेक है। उस कर्मभोग या प्रारब्धका भी खण्डन करके कल्याण प्रदान करनेवाली है—श्रीकृष्णकी उत्तम सेवा। साध्वि! यह तत्त्वज्ञान लोक और वेदका सार है। यह विघ्नोंका नाशक तथा शुभदायक है। बेटी! अब तुम सुखपूर्वक अपने घरको जाओ।

इस प्रकार कहकर सूर्यपुत्र यमराजने सावित्रीके पति सत्यवान्‌को जीवन प्रदान करके सावित्रीको शुभ आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् वे वहाँसे जानेके लिये उद्यत हो गये। उन्हें जाते देख सावित्री उनके चरणोंमें मस्तक झुका दोनों पैर पकड़कर रोने लगी। सच है, सत्पुरुषोंका बिछोह बड़ा ही दुःखदायक होता है। नारद! सावित्रीको रोती देख कृपानिधान यम भी रो पड़े और मन-ही-मन संतुष्ट हो उससे इस प्रकार बोले।

यमने कहा—सावित्री! तुम पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें लाख वर्षोंतक सुख भोगनेके अनन्तर भगवान् श्रीकृष्णके गोलोकधाममें जाओगी। भद्रे! अब तुम अपने घर जाओ और भगवती सावित्रीका व्रत करो। चौदह वर्षोंतक करनेपर यह व्रत नारियोंको मोक्ष प्रदान करता है। ज्येष्ठमासके कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथिको यह व्रत करना चाहिये। भाद्रपद-मासके शुक्लपक्षमें अष्टमी तिथिके दिन महालक्ष्मीका शुभ व्रत होता है। यह व्रत सोलह वर्षोंतक प्रत्येक वर्षके प्रतिमासके शुक्लपक्षमें करना चाहिये। जो नारी भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करती है, उसे भगवान् श्रीहरिका परमपद प्राप्त हो जाता है। प्रत्येक मङ्गलवारको मङ्गल प्रदान करनेवाली भगवती मङ्गलचण्डिकाकी पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक मासके शुक्लपक्षमें षष्ठीके दिन मङ्गलप्रदा भगवती षष्ठी (देवसेना)-की उपासना करनेका विधान है। इसी प्रकार आषाढ़की संक्रान्तिके अवसरपर सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करनेवाली भगवती मनसाकी पूजा होती है। कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथिको रासमण्डलमें विराजमान भगवान् श्रीकृष्णकी प्राणाधिका श्रीराधाकी उपासना करनी चाहिये तथा प्रत्येक मासकी शुक्ला अष्टमीके दिन दुर्गतिनाशिनी, विष्णुमाया भगवती दुर्गाका व्रत करना चाहिये। जो नारी विशुद्ध पतिव्रताओंमें, श्रीयन्त्र आदिमें तथा प्रतिमाओंमें पतिपुत्रवती सती प्रकृतिस्वरूपिणी भगवती जगदम्बाकी भावना करके धन और संततिकी प्राप्तिके लिये भक्तिपूर्वक पूजा करती है, वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके परमपदको प्राप्त होती है।

इस प्रकार कहकर धर्मराज अपने स्थानपर पधार गये। सावित्री भी पतिदेवको लेकर अपने घर लौट गयी। नारद! यों सावित्री और सत्यवान्