ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
सत्संगका भी स्वेच्छापूर्वक कभी सेवन नहीं किया। यदि पुनः भारतवर्षमें मनुष्यका जन्म पाऊँगा, तब तीर्थोंमें जाऊँगा और भगवान् श्रीकृष्णकी सेवा करूँगा।' देवेन्द्र! इस तरह संकल्प करते हुए उस जडको यथासमय आकर अत्यन्त भयंकर यमदूत पकड़ लेता है। वह उस दूतको देखता है। उसके हाथोंमें पाश और दण्ड होते हैं। उसकी आँखें अत्यन्त क्रोधसे लाल होती हैं, आकृति विकराल एवं भयंकर होती है। उसे किन्हीं भी उपायोंद्वारा रोक पाना कठिन होता है। वह बलिष्ठ, भयानक, दुर्दर्श, सम्पूर्ण सिद्धियोंका ज्ञाता तथा अन्य सबकी दृष्टिसे ओझल होता है। सामने खड़े हुए उस दूतपर दृष्टि पड़ते ही वह अत्यन्त भयभीत हो मल-मूत्रका त्याग करने लग जाता है। फिर तत्काल ही प्राणों तथा पाञ्चभौतिक देहको भी त्याग देता है।
यमदूत अंगूठेके बराबर आकारवाले जीवको लेकर भोगदेह (या यातना-शरीर)-में स्थापित कर देता है; तब उसे तीव्रगतिसे अपने स्थानपर ले जाता है। जीव वहाँ पहुँचकर सब धर्मोंके ज्ञाता यमराजको देखता है। वे रत्नसिंहासनपर सुस्थिरभावसे बैठकर मन्द-मन्द मुस्कराते दिखायी देते हैं। वे सर्वज्ञ हैं, धर्माधर्मके विचारको जानते हैं तथा सब ओर उनका मुख है। विधाताने पूर्वकालसे ही यमको सम्पूर्ण विश्वके नियमनका एकमात्र अधिकार दे रखा है। वे अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण करते हैं। रत्नमय आभूषणोंसे भूषित हैं, तीन करोड़ दूत और पार्षदगण उन्हें सदा घेरे रहते हैं। वे शुद्ध स्फटिकमणिकी माला लेकर उसके द्वारा श्रीकृष्णके नामोंका जप करते रहते हैं तथा रोमाञ्चित शरीरसे मन-ही-मन उनके युगल चरणारविन्दोंका ध्यान किया करते हैं। उस समय उनकी वाणी गद्गद होती है, नेत्रोंसे अश्रुधारा बहती रहती है। भगवान् यम सबपर समान दृष्टि रखते हैं। उनका रूप बहुत ही सुन्दर एवं कमनीय है। उनका शरीर सदा सुस्थिर यौवनसे सुशोभित होता है। वे अपने तेजसे उद्भासित होते रहते हैं। उनकी कान्ति शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी शोभाको लज्जित कर देती है। उनकी ओर सुखपूर्वक देखा जा सकता है। वे बड़े बुद्धिमान् हैं और चित्रगुप्तके सामने विराजमान रहते हैं। पुण्यात्माओंके समक्ष उनका रूप उपर्युक्त रूपसे शान्त ही रहता है, परंतु पापियोंको वे बड़े भयानक दिखायी देते हैं। उन्हें देखकर देहधारी जीव प्रणाम करता है और अत्यन्त भयभीत होकर खड़ा हो जाता है। सूर्यनन्दन यम चित्रगुप्तके साथ विचार करके जिनके लिये जो उचित होता है, वैसा ही शुभ या अशुभ फल प्रदान करते हैं। इस प्रकार उन जीवोंको आवागमनके चक्करसे कभी छुटकारा नहीं मिलता। श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंका सेवन ही जीवको उससे छुटकारा दिला सकता है।
देवराज! ये सब बातें मैंने आनुषङ्गिकरूपसे तुम्हें बतायी हैं, अब मनोवाञ्छित वर माँगो। वत्स! मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा। मेरे लिये कुछ भी असाध्य नहीं है।
महेन्द्रने कहा— याचकोंके लिये कल्पवृक्षस्वरूप मुनिश्रेष्ठ! मेरा इन्द्रत्व तो चला ही गया। अब ऐश्वर्यसे क्या प्रयोजन है? आप मुझे परमपद प्रदान कीजिये।
महेन्द्रकी यह बात सुनकर मुनिवर दुर्वासा हँसे और वेदोक्त सारतत्त्वस्वरूप सत्य वचन बोले।
मुनिने कहा— महेन्द्र! विषयी पुरुषोंके लिये परमपद अत्यन्त दुर्लभ है। तुम-जैसे लोगोंको तो प्राकृत प्रलय-कालमें भी मुक्ति नहीं मिल सकती। सृष्टिकालमें जीवोंका आविर्भाव तथा प्रलयकालमें तिरोभावमात्र होता है। ठीक उसी तरह, जैसे प्रातःकाल प्राणियोंका जागरण और रात्रिकालमें शयन हुआ करता है। जैसे काल-चक्र भ्रमण करता रहता है, उसी प्रकार