ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड
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जन्मोंके कर्मोंका स्मरण करते हैं; किंतु गर्भसे निकलते ही जीव विष्णुकी मायासे मोहित हो सब कुछ भूल जाता है।
देवता हो या कीट सभी यत्नपूर्वक अपने शरीरकी रक्षा करते हैं। स्त्रीकी योनिके भीतर जब पुरुषका वीर्य पड़ता है तो वह तत्काल उसके रक्तमें मिल जाता है। रक्तकी मात्रा अधिक होनेपर संतान माताके समान होती है और वीर्यकी अधिकता होनेपर संतानकी आकृति पितासे अधिक मिलती-जुलती है। ऋतुकालके बाद यदि युग्म दिनोंमें गर्भाधान हो तो पुत्रका जन्म होता है और विषम दिनोंमें आधान होनेपर कन्याकी उत्पत्ति होती है। युग्म दिनोंमें तथा रवि, मङ्गल और गुरुका वार होनेपर आधान हो तो पुत्र होता है। अन्य वारों तथा विषम दिनोंमें आधानसे कन्याका जन्म होता है। जिसका जन्म पहले पहरमें होता है, वह अल्पायु होता है, दूसरे पहरमें जन्म लेनेवालेकी आयु मध्यम होती है तथा तीसरे पहरमें जिसका जन्म होता है, वह दीर्घायु होता है। चतुर्थ पहरमें जन्म लेनेवाला चिरंजीवी माना जाता है। जिस क्षण या लग्नमें बालकका जन्म होता है, उस समयकी ग्रहस्थितिके अनुरूप उसका भावी जीवन हुआ करता है। वह पूर्वकर्मोंके अनुसार सुखी या दुःखी होता है। जैसे क्षणमें जन्म होता है, वैसे ही संतान होती है। प्रसवके क्षणकी चर्चा विद्वान् पुरुष ही करते हैं। रज-वीर्य परस्पर संयुक्त हो एक रातमें कललका आकार धारण करते हैं। फिर वह कलल दिनों-दिन बढ़ने लगता है। सातवें दिन उसकी आकृति बेरके समान होती है और एक मासमें वह लट्टूके समान हो जाता है। तीन महीना बीतते-बीतते वह बिना हाथ-पैरके मांसपिण्डके रूपमें परिणत हो जाता है। पाँचवें मासमें देहधारी जीवके सारे अवयव प्रकट हो जाते हैं। छठे महीनेमें जीवका संचार होता है। फिर वह सब तत्त्वोंको समझने लगता है। थोड़ी-सी जगहमें उसे रहना और सोना पड़ता है, इस बातको समझकर वह पिंजड़ेमें बँधे हुए पक्षीके समान दुःखी हो जाता है। अपवित्र स्थानमें रहकर वह माताके खाये हुए अन्न-पानका ही आहार करता है और 'हाय! हाय!' करके परमेश्वरका चिन्तन करने लगता है। इस तरह चार मासतक बड़ी भारी यातना भोगकर यथासमय वायुसे प्रेरित हो वह गर्भसे बाहर निकलता है। उस समय उसे दिशा, देश और कालका भान नहीं होता। विष्णुमायासे मोहित हो वह सब कुछ भूल जाता है। शैशवकालकी सीमातक वह शिशु सदा मल-मूत्रसे लिपटा रहता है। दूसरेके अधीन होता है। उसमें मच्छर आदिको हटानेकी भी शक्ति नहीं रहती। जब उसे कीड़े आदि काट खाते हैं, तब वह दुःखी होकर बारंबार रोता है। स्तन-पान करनेमें भी असमर्थ ही रहता है। अभीष्ट वस्तुकी याचना करनेके लिये उसकी वाणी नहीं निकलती। पौगण्डावस्थातक वह स्पष्ट बोल नहीं पाता। पौगण्डावस्थामें भी अनेक प्रकारकी यातना भोगकर जवान होता है। उस समय मायासे मोहित देहधारी जीव गर्भादिकी यातनाको भूल जाता है। आहार और मैथुनकी चिन्तासे पीड़ित तथा नाना प्रकारके मोह आदिसे वेष्टित होकर वह पुत्र, पत्नी तथा अनुचरोंका यत्नपूर्वक पालन करता है। जबतक वह उनके पालनमें समर्थ रहता है, तभीतक घरमें उसकी पूजा होती है—आदर-सत्कार होता है। असमर्थ हो जानेपर तो भाई-बन्धु उसे बूढ़े बैलकी भाँति व्यर्थका भार समझने लगते हैं। जब अत्यन्त जरा-जर्जर, जड एवं बधिर हो जाता है, खाँसी और दमा आदि रोग सताने लगते हैं तथा वह अत्यन्त मूढवत् हो सर्वथा दूसरोंके अधीन हो जाता है, तब सदा बारंबार पश्चात्ताप करने लगता है। वह कहता है—'अहो! मैंने श्रीहरिके तीर्थका तथा