ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
लक्ष्मी और श्रीकृष्णप्रिया राधा आदि उनके अनेक रूप हैं। अनेक जन्मोंतक उनकी उपासना करनेके पश्चात् उनकी कृपासे ज्ञानी होकर मनुष्य ज्ञानानन्दस्वरूप, श्रीकृष्णज्ञानके अधिदेवता सनातन महादेव कल्याणस्वरूप शिवका भजन करता है।
वे मङ्गलदायक, कल्याणकारक, परमानन्दरूप, परमानन्ददायी, सुखदायक, मोक्षदायक तथा समस्त सम्पत्तियोंके दाता हैं। अमरत्व, सुदीर्घ आयु, इन्द्रत्व तथा मनुत्वको भी वे अनायास ही देनेमें समर्थ हैं। राजेन्द्रपद, ज्ञान तथा हरिभक्तिके भी दाता हैं। तीन जन्मोंतक उनकी आराधना करके उन्हीं आशुतोष महात्मा शंकरके कृपा-प्रसादसे मनुष्य निश्चय ही हरिभक्ति प्राप्त कर लेता है। फिर श्रीकृष्ण-भक्तोंके संसर्गसे उसको कृष्णमन्त्रकी प्राप्ति होती है। तत्त्वज्ञ पुरुष निर्मल ज्ञान-दीपके प्रकाशित होनेसे ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्को मिथ्या ही देखता है। वरदाता शंकरके वरसे जब निर्मल ज्ञान और भगवद्भक्तिकी प्राप्ति हो जाती है, तब मनुष्य परात्पर निवृत्तिभावको प्राप्त हो जाता है। जिस शरीरमें उसे श्रीकृष्ण-मन्त्रकी प्राप्ति होती है, वह शरीर जबतक टिका रहता है, तभीतक उसे भारतवर्षमें रहना पड़ता है। उस पाञ्चभौतिक शरीरको त्याग देनेके पश्चात् वह दिव्य रूप धारण कर लेता है और श्रीहरिके गोलोक या वैकुण्ठधाममें उनका पार्षद बनकर उनकी सेवा किया करता है। वह परमानन्दसे सम्पन्न तथा मोह आदिसे रहित हो जाता है। इस प्राकृत जगत्में पुनः उसका आगमन नहीं होता। उसे पुनः माताका स्तन नहीं पीना पड़ता।
जो विष्णुमन्त्रके उपासक गङ्गा आदि तीर्थोंका सेवन करनेवाले तथा स्वधर्मपरायण भिक्षु हैं, उनका फिर जन्म नहीं होता। तीर्थमें पापका सर्वथा परित्याग करे और पुण्यकर्मका अनुष्ठान करते हुए श्रीहरिका भजन करे। विधाताने तीर्थसेवी पुरुषोंका यही धर्म बताया है। भगवान् विष्णुके नाम-मन्त्रका जप करे, उन्हींकी सेवा आदिमें तत्पर रहे तथा उन्हींके व्रत एवं उपवासमें संलग्न रहे। यह विष्णुसेवी पुरुषोंका धर्म बताया गया है।
जो सदन्न या कदन्नमें (उत्तम या निकृष्ट श्रेणीके अन्नमें), मिट्टीके ढेले अथवा सुवर्णमें सदा समभाव रखता है, वह संन्यासी कहा गया है। जो दण्ड, कमण्डलु तथा गेरुआ वस्त्रमात्र धारण करे, प्रतिदिन प्रवासमें रहे और एक स्थानपर अधिक दिनोंतक निवास न करे, उसे संन्यासी कहा गया है। जो लाभ आदिसे रहित होकर सदाचारी द्विजोंका दिया हुआ अन्न खाता है, किंतु किसीसे याचना नहीं करता, वह संन्यासी कहा गया है। जो व्यापार न करे, आश्रम बनाकर न रहे, समस्त वैदिक कर्मोंसे विलग रहे तथा निरन्तर नारायणका ध्यान करे, उसे सच्चा संन्यासी कहा गया है। जो सदा मौन रहे, ब्रह्मचर्यका पालन करे, दूसरोंसे बात न करे और सबको ब्रह्ममय देखे, उसे संन्यासी कहा गया है। जिसकी सर्वत्र समबुद्धि हो, जो हिंसा और माया आदिसे दूर रहता हो तथा क्रोध और अहंकारसे शून्य हो, वही सच्चा संन्यासी कहा गया है। जो बिना माँगे प्रस्तुत हुए मीठे अथवा स्वादरहित अन्नको समभावसे भोजन करता है, किंतु खानेके लिये किसीसे याचना नहीं करता, वह संन्यासी कहा गया है। जो स्त्रियोंका मुँह न देखे, उनके पास खड़ा न हो और काठकी बनी हुई नारीमूर्तिका भी स्पर्श न करे, वही सच्चा भिक्षु है। ब्रह्माजीने संन्यासियोंका यही धर्म बताया है। इसके विपरीत चलनेपर जन्म, मृत्यु और यमयातनाका भय सिरपर सवार रहता है अथवा पशु आदि क्षुद्र जन्तुओंकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। गर्भवासके समय सभी प्राणी अपने सैकड़ों