ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २३५
विषयी जीव भी ईश्वरकी इच्छासे गाड़ीके पहियेकी तरह सदा ही आवागमनका चक्कर काटते रहते हैं। साठ विपलोंका एक पल, साठ पलोंका एक दण्ड, दो दण्डोंका एक मुहूर्त, तीस मुहूर्तोंका एक दिन-रात, पंद्रह दिन-रातोंका एक पक्ष, शुक्ल और कृष्ण नामक दो पक्षोंका एक मास, दो मासोंकी एक ऋतु, तीन ऋतुओंका एक अयन, दो अयनोंका एक वर्ष, तैंतालीस लाख बीस हजार मानववर्षोंके चार युग तथा मनुष्योंके पचीस हजार पाँच सौ साठ चतुर्युगोंकी एक इन्द्रकी आयु होती है। यही एक मनुकी भी आयु कही गयी है। दस लाख आठ हजार इन्द्रोंका पतन हो जानेपर ब्रह्माजीकी आयु पूरी होती है। तभी 'प्राकृतिक लय' होता है। वत्स ! प्राकृतिक प्रलयके समय परमात्मा श्रीकृष्णकी पलकें गिरती हैं। जब फिर उनकी पलकें उठती या आँख खुलती है, तब पुनः नयी सृष्टिका आरम्भ होता है। श्रुतिमें ब्रह्माकी सृष्टि और प्रलयोंको असंख्य बताया गया है। जैसे पृथ्वीके धूलिकणोंकी गणना नहीं हो सकती, उसी तरह सृष्टि और प्रलयोंकी भी कोई गिनती नहीं है। यह चन्द्रशेखर शिवका कथन है। उपर्युक्त इन्द्रोंका मोक्ष नहीं होता। अतः देवराज ! तुम कोई दूसरा वर माँगो, जो सृष्टिसूत्रके अनुरूप हो।
मुने ! मुनीश्वर दुर्वासाकी यह बात सुनकर देवराजको बड़ा विस्मय हुआ। तब उन्होंने वहाँ अपने पूर्व-ऐश्वर्यका ही वरण किया। 'तुम अपने पूर्व ऐश्वर्यको शीघ्र ही प्राप्त कर लोगे'—ऐसा कहकर मुनि दुर्वासा अपने घरको चले गये।
नारदजीने पूछा—भगवान् श्रीहरिका गुणगान सुनकर इन्द्रको जब ज्ञान प्राप्त हो गया, तब उन्होंने घर जाकर क्या किया? यह मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण बोले—ब्रह्मन्! श्रीकृष्णका गुणगान सुनकर इन्द्र संसारके ऐश्वर्य-भोगसे विरक्त हो गये। वे दिनोंदिन अपने वैराग्यभावको बढ़ाने लगे। मुनिवर दुर्वासाके पाससे घर जाकर उन्होंने अपनी अमरावतीपुरीकी दशा देखी। वह दैत्यों तथा असुर-समूहोंसे भरी होनेके कारण भयसे व्याकुल जान पड़ती थी। उस पुरीमें कहीं तो उनके बन्धु-बान्धव विषादमें डूबे थे और कहीं-कहींके बन्धुजन पुरी छोड़कर बाहर चले गये थे। अपनी पुरीको पिता-माता-पत्नी आदिसे रहित, अत्यन्त हलचलसे पूर्ण तथा शत्रुओंसे आक्रान्त देखकर इन्द्रदेव गुरु बृहस्पतिके पास गये। उस समय शक्तिशाली बृहस्पतिजी मन्दाकिनीके तटपर विराजमान हो परब्रह्म परमात्माका ध्यान करते हुए देवराज इन्द्रको दृष्टिगोचर हुए। फिर देखा तो वे गङ्गाके जलमें पूर्वाभिमुख खड़े होकर सूर्यका अभिवादन कर रहे थे। उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू भरे थे। उनका शरीर पुलकित था। वे अत्यन्त आनन्दित थे। वे परम श्रेष्ठ, गाम्भीर्य-सम्पन्न, धर्मात्मा, श्रेष्ठ पुरुषोंसे सेवित, बन्धुवर्गमें आदरणीय, भ्रातृ-समुदायमें ज्येष्ठ तथा देव-शत्रुओंके लिये अनिष्टकारी गुरुवर बृहस्पतिजी मन्त्रका जप कर रहे थे। देवराज एक पहरतक उन्हें देखते रह गये। तत्पश्चात् उन्हें ध्यानसे उपरत देखकर प्रणाम किया। फिर वे गुरुदेवके चरणकमलोंमें मस्तक झुकाकर उच्चस्वरसे रोने लगे। तदनन्तर दुर्वासाजीके द्वारा दिये गये शापके सम्बन्धकी सारी बातें इन्द्रने बृहस्पतिजीको बतायीं। इन्द्रकी सारी बातें सुनकर परम बुद्धिमान् एवं वक्ताओंमें श्रेष्ठ बृहस्पतिजीने इस प्रकार कहा।
बृहस्पति बोले—सुरश्रेष्ठ ! मैं सब कुछ सुन चुका हूँ। तुम विषाद मत करो; मेरी बात सुनो। नीतिज्ञ पुरुष विपत्तिके अवसरपर कभी भी घबराता नहीं है; क्योंकि यह विपत्ति और सम्पत्ति स्वस्वरूपिणी है। इसे नश्वर कहा जाता है। यह सम्पत्ति और विपत्ति अपने ही