भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२३६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मका फल है। जीव स्वयं ही उन दोनोंका निर्माता है। प्रायः सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये प्रत्येक जन्ममें यही शाश्वत नियम है। चक्रकी भाँति वह सदा घूमता रहता है; फिर इस विषयमें चिन्ता किस बातकी ? शुभ हो अथवा अशुभ, जिस-किसी प्रकारके अपने कर्मफलको भोगनेके लिये ही पुरुष शरीर प्राप्त करता है। शतकोटि कल्प क्यों न बीत जायँ, किंतु बिना भोग किये कर्मका अन्त नहीं होता। अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। इस प्रकारकी बातें परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माजीको सम्बोधित करके सामवेदकी कौथुमी शाखामें कही हैं। किये हुए सम्पूर्ण कर्मोंका भोग शेष रह जानेपर कर्मानुसार प्राणियोंका भारतवर्षमें अथवा कहीं अन्यत्र जन्म होता है। करोड़ों जन्मोंके किये हुए कर्म प्राणीके पीछे लगे रहते हैं। पुरन्दर ! छायाकी भाँति वे बिना भोगे अलग नहीं होते। काल, देश और पात्रके भेदसे कर्मोंमें न्यूनाधिकता हुआ ही करती है। जिस प्रकार कुशल कुम्भकार दण्ड, चक्र, शराव और भ्रमणके द्वारा क्रमशः मिट्टीसे सुन्दर घटका निर्माण कर लेता है, उसी प्रकार विधाता कर्मसूत्रसे प्राणियोंको फल प्रदान करते हैं। अतः देवराज ! जिनकी आज्ञासे इस जगत्की सृष्टि हुई है, उन भगवान् नारायणकी तुम उपासना करो। वे प्रभु त्रिलोकीमें विधाताके विधाता, रक्षकके रक्षक, स्रष्टाके स्रष्टा, संहर्ताके संहारकर्ता तथा कालके भी काल हैं। जो पुरुष महान् विपत्तिके अवसरपर उन भगवान् मधुसूदनका स्मरण करता है, उसके लिये उस विपत्तिमें भी सम्पत्तिकी ही भावना उत्पन्न हो जाती है; ऐसा भगवान् शंकरने आदेश दिया है*।

नारद! इस प्रकार कहकर तत्त्वज्ञानी बृहस्पतिजीने देवराज इन्द्रको हृदयसे लगा लिया और शुभाशीर्वाद देकर उन्हें पूर्णरूपसे सारी बातें समझा दीं।

(अध्याय ३५—३७)

भगवती लक्ष्मीका समुद्रसे प्रकट होना और इन्द्रके द्वारा महालक्ष्मीके ध्यान तथा स्तवन किये जाने और पुनः अधिकार प्राप्त किये जानेका वर्णन

**भगवान् नारायण कहते हैं—**नारद! तदनन्तर भगवान् श्रीहरिका ध्यान करके देवराज इन्द्रने बृहस्पतिजीको आगे करके सम्पूर्ण देवताओंके साथ ब्रह्माकी सभाके लिये प्रस्थान किया। वे शीघ्र ही वहाँ पहुँच गये। सबको ब्रह्माजीके दर्शन हुए। इन्द्र और बृहस्पतिसहित समस्त देवताओंने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् देवगुरु बृहस्पतिजीने ब्रह्माजीको सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उनकी बात सुनकर ब्रह्माजी हँस पड़े। उन्होंने देवराजसे कहा।

**ब्रह्माजी बोले—**वत्स ! तुम मेरे वंशज हो। तुम्हें उत्तम बुद्धि प्राप्त है। मेरे प्रपौत्र हो। बृहस्पतिजी तुम्हारे गुरु हैं और तुम स्वयं भी देवताओंके स्वामी हो। परम प्रतापी विष्णुभक्त दक्ष प्रजापति तुम्हारे मातामह हैं। भला, जिसके तीनों कुल ऐसे पवित्र हों, वह सुयोग्य पुरुष अहंकार क्यों करे ? जिसकी माता परम पतिव्रता, पिता शुद्धस्वरूप और मातामह एवं मातुल जितेन्द्रिय हों, वह व्यक्ति अहंकारी क्यों बन जाय ? क्योंकि यदि पिता, मातामह और गुरु—ये तीन दोषी हों


* महाविपत्तौ संसारे यः स्मरेन्मधुसूदनम्। विपत्तौ तस्य सम्पत्तिर्भवेदित्याह शङ्करः॥
(प्रकृतिखण्ड ३७। ४०)