ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २३७
तो इन्हींके दोषसे सम्पन्न होकर पुरुष भगवान् श्रीहरिका द्रोही बन सकता है—यह निश्चित है। सर्वान्तरात्मा भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरमें विराजमान रहते हैं। उनके देहसे निकल जानेपर उसी क्षण प्राणी शव बन जाता है। वे स्वामी हैं और हम सब लोग उनके अनुचर हैं। मैं प्राणियोंके शरीरमें इन्द्रियोंका स्वामी मन होकर रहता हूँ। शंकर ज्ञानका रूप धारण करके रहते हैं। विष्णुके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी भगवती श्रीराधा प्रकृतिके रूपमें विराजमान रहती हैं। बुद्धिको साध्वी दुर्गाका रूप माना गया है। निद्रा एवं क्षुधा आदि—ये सभी भगवती प्रकृतिकी कलाएँ हैं। आत्माका जो बुद्धिमें प्रतिबिम्ब है, वही जीव है। उसीने इस भोग-शरीरको धारण कर रखा है। जब शरीरका स्वामी आत्मा देहसे निकलकर जाने लगता है, तब ये सब भी तुरंत उसीके साथ-साथ चल पड़ते हैं; जैसे रास्तेमें वरके आगे चलनेपर सभी बराती सज्जन उसका अनुसरण करते हैं। मैं, शिव, शेषनाग, विष्णु, धर्म एवं महाविराट् तथा तुम सब लोग—ये सब जिनके अंश और भक्त हैं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके निर्माल्यरूप पुष्पका तुमने अपमान कर दिया है। भगवान् शिवने जिस पुष्पसे उन श्रीहरिके चरणकमलोंकी पूजा की थी, वही पुष्प सौभाग्यवश मुनिवर दुर्वासाकी कृपासे तुम्हें प्राप्त हुआ था; परंतु तुमने उसका सम्मान नहीं किया। भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलसे च्युत पुष्प जिसके मस्तकपर स्थान पाता है, वह सौभाग्यशाली व्यक्ति सम्पूर्ण देवताओंमें प्रधान माना जाता है और उसीकी पहले पूजा होती है। हाय! दैवने तुम्हें ठग लिया। वास्तवमें दैव बड़ा प्रबल होता है। इस समय भगवान् श्रीकृष्णके निर्माल्यका परित्याग करनेसे रोषमें आकर भगवती श्रीदेवी तुम्हारे पाससे चली गयी हैं। अब तुम मेरे तथा बृहस्पतिके साथ वैकुण्ठमें चलो। मैं वर देता हूँ, अतः तुम वहाँ लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरिकी सेवा करके लक्ष्मीको अवश्य प्राप्त कर लोगे।
नारद! इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओंको साथ ले वैकुण्ठलोकमें गये। वहाँ जानेपर उन्हें परब्रह्म सनातन भगवान् श्रीहरिके दर्शन हुए। उस समय वे तेजःपुञ्ज प्रभु अपने ही तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उनका श्रीविग्रह ऐसा जान पड़ता था, मानो ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक असंख्य सूर्य एक साथ चमक रहे हों। वे आदि, मध्य और अन्तसे रहित लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरि शान्तरूपसे विराजमान थे। वे चार भुजावाले पार्षदोंसे और भगवती सरस्वतीसे युक्त थे। चारों वेदोंसहित भगवती गङ्गा भक्ति प्रदर्शित करती हुई उनके पास विराजमान थीं। उन्हें देखकर ब्रह्माके अनुयायी सम्पूर्ण देवताओंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। उनके प्रत्येक अङ्गमें भक्ति और विनयका विकास हो चुका था। आँखोंमें आँसू भरकर वे परम प्रभु भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करने लगे। स्वयं ब्रह्माजीने हाथ जोड़कर भगवान्से यथावत् समस्त वृत्तान्त कह सुनाया। उस समय समस्त देवता अपने अधिकारसे च्युत होनेके कारण रो रहे थे। विपत्तिने उनके हृदयमें भलीभाँति स्थान प्राप्त कर लिया था। भयके कारण उनमें घबराहटकी सीमा नहीं थी। उनके शरीरपर एक भी रत्न या आभूषण नहीं था। वे सवारीसे भी रहित थे। उन सभीके मुख म्लान थे। श्री तो पहले ही उनका साथ छोड़ चुकी थी। वे निस्तेज एवं भयग्रस्त थे। कुछ भी करनेकी शक्ति उनमें नहीं रह गयी थी। देवताओंको ऐसी दीन दशामें पड़े हुए देखकर भयको दूर करनेवाले भगवान् श्रीहरिने उनसे कहा।
भगवान् श्रीहरि बोले—ब्रह्मन् तथा देवताओ! भय मत करो। मेरे रहते तुमलोगोंको किस बातका भय है। मैं तुम्हें परम ऐश्वर्यको बढ़ानेवाली अचल लक्ष्मी प्रदान करूँगा; परंतु मैं कुछ