भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

२३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण समयोचित बात कहता हूँ, तुमलोग उसपर ध्यान दो। मेरे वचन हितकर, सत्य, सारभूत एवं परिणाममें सुखावह हैं। जैसे अखिल विश्वके सम्पूर्ण प्राणी निरन्तर मेरे अधीन रहते हैं, वैसे ही मैं भी अपने भक्तोंके अधीन हूँ। मैं अपनी इच्छासे कभी कुछ नहीं कर सकता। सदा मेरे भजन- चिन्तनमें लगे रहनेवाला निरङ्कुश भक्त जिसपर रुष्ट हो जाता है, उसके घर लक्ष्मीसहित मैं नहीं ठहर सकता-यह बिलकुल निश्चित है। मुनिवर दुर्वासा महाभाग शंकरके अंश एवं वैष्णव पुरुष हैं। उनके हृदयमें मेरे प्रति अटूट श्रद्धा भी है। उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया है। अतएव तुम्हारे घरसे लक्ष्मीसहित मैं चला आया हूँ; क्योंकि जहाँ शङ्खध्वनि नहीं होती, तुलसीका निवास नहीं रहता, शंकरकी पूजा नहीं होती तथा ब्राह्मणोंको भोजन नहीं कराया जाता, वहाँ लक्ष्मी नहीं रहतीं। ब्रह्मन् तथा देवताओ ! जहाँ मेरे भक्तोंकी निन्दा होती है, वहाँ रहनेवाली महालक्ष्मीके मनमें अपार क्रोध उत्पन्न हो जाता है। अतः वे उस स्थानको छोड़कर चल देती हैं। जो मेरी उपासना नहीं करता तथा एकादशी और जन्माष्टमीके दिन अन्न खाता है, उस मूर्ख व्यक्तिके घरसे भी लक्ष्मी चली जाती हैं। जो मेरे नामका तथा अपनी कन्याका विक्रय करता है एवं जहाँ अतिथि भोजन नहीं पाता, उस घरको त्यागकर मेरी प्रिया लक्ष्मी अन्यत्र चली जाती हैं। जो ब्राह्मण पुंश्चलीके उदरसे उत्पन्न हुआ है अथवा पुंश्चलीका पति है, उसे 'महापापी' कहा गया है। उसके घर लक्ष्मी नहीं ठहर सकतीं। जो ब्राह्मण बैल जोतता है, वह कमलालया भगवती लक्ष्मीका प्रेमभाजन नहीं हो सकता। अतः उसके यहाँसे वे चल देती हैं। जो अशुद्धहृदय, क्रूर, हिंसक और निन्दक है, उस ब्राह्मणके हाथका जल पीनेमें भगवती लक्ष्मी डरती हैं, अतः उसके घरसे वे चल देती हैं। जो शूद्रोंसे यज्ञ कराता है, कायर व्यक्तियोंका अन्न खाता है, निष्प्रयोजन तृण तोड़ता है, नखोंसे पृथ्वीको कुरेदता रहता है; जो निराशावादी है, सूर्योदयके समय भोजन करता है, दिनमें सोता और मैथुन करता है और जो सदाचारहीन है, ऐसे मूर्खोंके घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं। जो अल्पज्ञानी व्यक्ति भीगे पैर अथवा नंगा होकर सोता है तथा निरन्तर बेसिर-पैरकी बातें बकता रहता है, उसके घरसे साध्वी लक्ष्मी चली जाती हैं। जो सिरपर तैल लगाकर उसीसे दूसरेके अङ्गको स्पर्श करता है अर्थात् अपने सिरका तैल दूसरेको लगाता है तथा अपनी गोदमें बाजा लेकर उसे बजाता है, उसके घरसे रुष्ट होकर लक्ष्मी चली जाती हैं। जो द्विज व्रत, उपवास, संध्या और विष्णुभक्तिसे हीन है, उस अपवित्र पुरुषके घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं। जो ब्राह्मणोंकी निन्दा तथा उनसे द्वेष करता है, जीवोंकी सदा हिंसा करता है और दयारहित है, उसके घरसे जगज्जननी लक्ष्मी चली जाती हैं। जिस स्थानपर भगवान् श्रीहरिकी चर्चा होती है और उनके गुणोंका कीर्तन होता है, वहींपर सम्पूर्ण मङ्गलोंको भी मङ्गल प्रदान करनेवाली भगवती लक्ष्मी निवास करती हैं। पितामह ! जहाँ भगवान् श्रीकृष्णका तथा उनके भक्तोंका यश गाया जाता है, वहीं उनकी प्राणप्रिया भगवती लक्ष्मी सदा विराजती हैं। जहाँ शङ्खध्वनि होती है तथा शङ्ख, शालग्राम, तुलसी-इनका निवास रहता है एवं उनकी सेवा, वन्दना और ध्यान होता है, वहाँ लक्ष्मी सदा विद्यमान रहती हैं। जहाँ शिवलिङ्गकी पूजा और पवित्र कीर्तन तथा दुर्गापूजन एवं कीर्तन होता है, वहाँ कमलालया लक्ष्मी निवास करती हैं। जहाँ ब्राह्मणोंकी सेवा होती है, उन्हें उत्तम पदार्थ भोजन कराये जाते हैं तथा सम्पूर्ण देवताओंका अर्चन होता है, वहाँ