ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 240, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें२३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण विषयान्ध दो प्रकारके बताये गये हैं - राजस और बात है कि तुम अभीष्ट (मोक्ष)- मार्गका साक्षात्कार तामस । जिसमें शास्त्रका ज्ञान नहीं है, वह तामस करना चाहते हो। यह पहले तो दुःखका कारण कहलाता है और शास्त्रज्ञ राजस । मुनिश्रेष्ठ ! शास्त्र जान पड़ता है; परंतु परिणाममें सुख देनेवाला है। दो प्रकारके मार्ग दिखलाते हैं - एक प्रवृत्ति - बीज जीवको जो गर्भकी यातना तथा मृत्युकष्ट सहन और दूसरा निवृत्ति-बीज। पहला जो प्रवृत्तिमार्ग करने पड़ते हैं, उन सबका खण्डन करनेवाला यह है, वह दुःखका रास्ता है, परंतु जीव क्लेशमें ही ज्ञान बताया जा रहा है। जिससे पार पाना कठिन सुख मानकर पहले उसीपर चलते हैं। वह मार्ग है, उस दुर्वार एवं असार संसार-पारावारसे उद्धार स्वच्छन्द, प्रसन्नतापूर्ण, विरोधशून्य एवं आपात- करनेवाला यह ज्ञान ही है। इससे कर्मरूपी वृक्षके मधुर होनेपर भी परिणाममें नाशका बीज तथा अङ्कुरका उच्छेद हो जाता है। यह सबका उद्धार जन्म-मृत्यु और जराके चक्करमें डालनेवाला है। करनेवाला है। ज्ञानका यह मार्ग सब मार्गोंसे श्रेष्ठ जीव अनेक जन्मोंतक अपने विहित कर्मके है। इससे संतोष और संततिकी प्राप्ति होती है। परिणामस्वरूप नाना प्रकारकी योनियोंमें क्रमशः दान, तप, व्रत और उपवास आदि कर्मसे भ्रमण करनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे जीवधारियोंको स्वर्गभोग आदि सुखकी उपलब्धि मानव होकर सत्सङ्गका सुअवसर प्राप्त करता है। होती है। पहलेके सकाम कर्मोंका यत्नपूर्वक सैकड़ों और सहस्रों पुरुषोंमें कोई विरला ही मूलोच्छेद करके यह ज्ञान मोक्षका बीज वपन साधुपुरुष भवसागरसे पार उतारनेमें कारण बनता करता है। संकल्पका अभाव ही मोक्षका बीज है। है। साधुपुरुष सत्त्वगुणके प्रकाशसे मुक्तिमार्गका मनुष्य जो भी सात्त्विक कर्म करे, उसे कामना या दर्शन कराता है। तब जीवके हृदयमें बन्धनको संकल्पसे शून्य ही रखे। समस्त कर्मोंको श्रीकृष्णके तोड़नेके लिये यत्न करनेकी भावना उत्पन्न होती चरणोंमें समर्पित करके ज्ञानी पुरुष परब्रह्म है। जब अनेक जन्मोंके पुण्य एवं तपस्या और परमात्मामें लीन हो जाता है। संसारी पुरुषोंके उपवास सहायक होते हैं तब प्राणीको निर्विघ्न लिये इस गतिको निर्वाण- मोक्ष कहा गया है। और परम सुखद मुक्तिमार्गकी उपलब्धि होती है। परंतु वैष्णव पुरुष भगवत्सेवासे विरह होनेके यह बात मैंने विभिन्न प्रसङ्गों और अवसरोंपर गुरु भयसे कातर हो इस निर्वाण-मुक्तिकी इच्छा (बृहस्पति) - जी के मुखसे सुनी है। अब विधाताने नहीं करते हैं। वे उत्तम देह धारण करके गोलोक इस विपत्तिके समय मुझे ज्ञानका समुद्र प्रदान अथवा वैकुण्ठधाममें उन्हीं परमात्माकी नित्य किया है। मेरा उद्धार करनेवाली यह विपत्ति सेवा करते हैं। इन्द्र ! वैष्णवजन भगवत्सेवारूप वास्तवमें सम्पत्तिरूपिणी है। ज्ञानसिन्धो ! दीनबन्धो ! मुक्तिकी ही अभिलाषा रखते हैं। वे जीवन्मुक्त हैं दयानिधे ! इस समय मुझ दीनको कुछ ऐसा और अपने समस्त कुलका उद्धार कर देते हैं। सारभूत ज्ञान दीजिये, जो मुझे भवसागरसे पार भगवान् विष्णुका स्मरण, कीर्तन, अर्चन, पादसेवन, कर दे। वन्दन, स्तवन, नित्य भक्तिभावसे उनके नैवेद्यका इन्द्रकी यह बात सुनकर ज्ञानियोंके गुरु भक्षण, चरणोदकका पान तथा उनके मन्त्रका सनातन मुनि दुर्वासा जोर-जोरसे हँस पड़े और जप - यही जीवके उद्धारका बीज है, जो सबके अत्यन्त संतुष्ट होकर इन्द्रको ज्ञानका उपदेश लिये अभीष्ट हो सकता है। यह मृत्युञ्जय-ज्ञान है, देने लगे। जिसे भगवान् मृत्युञ्जयने मुझे दिया था। मैं उनका मुनि बोले- अहो महेन्द्र ! यह बड़े मङ्गलकी शिष्य हूँ। इसलिये उन्हींके कृपा-प्रसादसे सर्वत्र