ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें•••• प्रकृतिखण्ड २२९
है, वह पुरुष श्री, बुद्धि और ज्ञानसे भ्रष्ट हो जाता है। भगवान् विष्णुके लिये अर्पित की हुई वस्तुको पाते ही उसे पा लेनेवाला बड़भागी पुरुष अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करके स्वयं मुक्त हो जाता है। जो पुरुष नैवेद्य भोजन करके निरन्तर भगवान् श्रीहरिकी भक्तिपूर्वक पूजा और स्तुति करता है, वह भगवान् विष्णुके समान हो जाता है। उसका स्पर्श करके चलनेवाली वायुका संयोग पाकर तीर्थोंका समूह पवित्र हो जाता है। उसकी चरणरज लगते ही पृथ्वी पवित्र हो जाती है। श्रीहरिको भोग न लगाया हुआ अन्न मांसके समान अभक्ष्य है। शिव-लिङ्गके लिये अर्पण किया हुआ अन्न तथा शूद्रयाजी, चिकित्सक, देवल, कन्याविक्रयी और योनि-जीविका अन्न, ठंडा, बासी, सबके भोजन करनेपर बचा हुआ अन्न, शूद्रापति एवं वृषवाही, अदीक्षित, शवदाही, अगम्यागामी, मित्रद्रोही, विश्वासघाती, कृतघ्न तथा झूठी गवाही देनेवाले ब्राह्मणोंका अन्न अत्यन्त दूषित समझा जाता है; परंतु ये सब भी भगवान् विष्णुको अर्पण करके भोजन करनेसे शुद्ध हो जाते हैं। यदि चाण्डाल भी भगवान् विष्णुकी उपासना करता है तो वह करोड़ों वंशजोंका उद्धार कर सकता है। श्रीहरिकी भक्तिसे विमुख मानव स्वयं अपनी भी रक्षा नहीं कर सकता। यदि अज्ञानमें भी भगवान् विष्णुको समर्पित नैवेद्य ग्रहण कर लिया जाय तो वह पुरुष अपने सात जन्मोंके उपार्जित पापोंसे मुक्त हो जाता है। जान-बूझकर भक्तिपूर्वक जो श्रीहरिका प्रसाद ग्रहण करता है, उसके तो अनेक जन्मोंके पाप निश्चितरूपसे भस्म हो जाते हैं। इन्द्र ! तुमने जो अभिमानमें आकर भगवान्के प्रसादरूप पारिजातके पुष्पको हाथीके मस्तकपर रख दिया, इस अपराधके फलस्वरूप लक्ष्मी तुम्हें छोड़कर भगवान् श्रीहरिके समीप चली जाय। मैं भगवान् नारायणका भक्त हूँ। मुझे शिव तथा ब्रह्मासे भी किंचित् भी भय नहीं है। काल, मृत्यु और जरासे भी मैं नहीं डरता, फिर दूसरोंकी तो गिनती ही क्या है? तुम्हारे पिता प्रजापति कश्यप भी मेरा क्या करेंगे? देवराज ! तुम्हारे गुरु बृहस्पति भी मुझ निःशङ्क पुरुषका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। देखो, यह पुष्प जिसके मस्तकपर है, उसीकी पूजा श्रेष्ठ मानी जाती है। शिवके पुत्रका मस्तक कट जानेपर उसके पुनरुज्जीवनके लिये यही मस्तक (हाथीका सिर) जोड़ा जायगा।
मुनिवर दुर्वासाके ये वचन सुनकर देवराज इन्द्रने उनके चरण पकड़ लिये। भयके कारण उनके मनमें घबराहट छा गयी। शोकातुर होकर उच्च स्वरसे रोते हुए वे मुनिसे कहने लगे।
इन्द्रने कहा- प्रभो ! आपने मुझ मतवालेको यह शाप देकर बहुत ही उचित किया है। यदि आपने मेरी सम्पत्ति हर ली तो अब आप मुझे कुछ ज्ञानोपदेश करनेकी कृपा कीजिये। ऐश्वर्य तो विपत्तियोंका बीज है। उससे ज्ञान ढक जाता है। इसीसे इसको मुक्तिमार्गकी अर्गला कहा जाता है। इसके कारण हरि-भक्तिमें पद-पदपर बाधा उपस्थित हुआ करती है। सम्पत्ति जन्म, मृत्यु, जरा, रोग, शोक और दुःखके बीजका उत्तम अङ्कुर है। धनरूपी रतौंधीसे अन्धा हुआ मानव मुक्तिके मार्गको नहीं देख सकता।* जो सम्पत्तिसे प्रमत्त हो गया है, उसे मदिरासे मत्त हुआ समझना चाहिये। उसे बान्धवजन घेरे रहते हैं; परंतु वह बन्धुजनोंसे द्वेष रखता है। वैभवमत्त, विषयान्ध, विह्वल, महाकामी और राजसिक व्यक्तिमें सत्त्वमार्गका अवलोकन करनेकी योग्यता नहीं रह जाती।
* ऐश्वर्यं विपदां बीजं प्रच्छन्नज्ञानकारणम्। मुक्तिमार्गार्गलं दाढ्यं हरिभक्तिव्यवाय कम् ॥
जन्ममृत्युजरारोगशोकदुःखाङ्कुरं परम्। सम्पत्तितिमिरान्धं च मुक्तिमार्गं न पश्यति ॥
(प्रकृतिखण्ड ३६। ४८-४९)