भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 250

२४० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


देवी स्वयं अपने तेजसे प्रकाशित हो रही हैं। इन परम मनोहर देवीका दर्शन पाकर मन आनन्दसे खिल उठता है। इनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है। रत्नमय भूषण इनकी छवि बढ़ा रहे हैं। इन्होंने पीताम्बर पहन रखा है। इन प्रसन्न वदनवाली भगवती महालक्ष्मीके मुखपर मुस्कान छा रही है। ये सदा युवावस्थासे सम्पन्न रहती हैं और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको देनेवाली हैं। ऐसी कल्याणस्वरूपिणी भगवती महालक्ष्मीकी मैं उपासना करता हूँ।'

नारद! इस प्रकार ध्यान करके ब्रह्माजीके आज्ञानुसार सोलह प्रकारके उपचारोंसे देवराज इन्द्रने असंख्य गुणोंवाली उन भगवती महालक्ष्मीकी पूजा की। प्रत्येक वस्तुको भक्तिपूर्वक मन्त्र पढ़ते हुए विधिके साथ समर्पण किया। अनेक प्रकारकी उत्तम वस्तुएँ प्रचुर मात्रामें उपस्थित कीं। [आसन—] 'भगवती महालक्ष्मी! जो अमूल्य रत्नोंका सार है तथा विश्वकर्मा जिसके निर्माता हैं, ऐसा यह विचित्र आसन सेवामें प्रस्तुत है, इसे स्वीकार कीजिये। [पाद्य—] कमलालये! इस शुद्ध गङ्गा-जलको सब लोग मस्तकपर चढ़ाते हैं। सभीको इसे पानेकी इच्छा लगी रहती है। पापरूपी ईंधनको जलानेके लिये यह अग्निस্বরূপ है। आप इसे पाद्यरूपमें स्वीकार करें। [अर्घ्य—] पद्मवासिनि! शङ्खमें पुष्प, चन्दन, दूर्वा आदि श्रेष्ठ वस्तुएँ तथा गङ्गाजल रखकर शुद्ध अर्घ्य प्रस्तुत है। इसे ग्रहण कीजिये। [सुगन्धित तैल—] श्रीहरिप्रिये! यह उत्तम गन्धवाले पुष्पोंसे सुवासित तैल तथा सुगन्धपूर्ण आमलकी फल शरीरकी सुन्दरता बढ़ानेका परम साधन है। आप इस स्नानोपयोगी वस्तुको स्वीकार करें। [धूप—] श्रीकृष्णकान्ते! वृक्षका रस सूखकर निर्यास (गोंद)-के रूपमें परिणत हो गया है। इसमें सुगन्धित द्रव्य मिला दिये गये हैं। ऐसा यह पवित्र धूप स्वीकार कीजिये। [चन्दन—] देवि! यह मनोहर चन्दन मलयगिरिसे उत्पन्न हुआ है। यह चन्दन-वृक्षका सार तत्त्व है, सुगन्धयुक्त एवं सुखदायक है। सेवामें समर्पित हुए इस चन्दनको स्वीकार करें। [दीप—] परमेश्वरि! जो जगत्के लिये चक्षुःस्वरूप है, जिसके सामने अन्धकार टिक नहीं सकता तथा जो शुद्धस्वरूप है, ऐसे इस प्रज्वलित दीपको स्वीकार कीजिये। [नैवेद्य—] देवि! यह नाना प्रकारका उपहारस्वरूप नैवेद्य नाना प्रकारके रससे पूर्ण तथा विविध स्वादसे युक्त है। इसे स्वीकार कीजिये। [अन्न—] देवि! अन्नको ब्रह्मस्वरूप माना गया है। प्राणकी रक्षा इसीपर निर्भर है। तृप्ति और पुष्टि प्रदान करना इसका सहज गुण है। आप इसे ग्रहण कीजिये। [खीर—]महालक्ष्मी! यह उत्तम पक्वान्न (खीर) चीनी और घृतसे युक्त है, इसे अगहनीके चावलसे तैयार किया गया है। आप कृपया इसे स्वीकार कीजिये। [स्वस्तिक नामक मिष्टान्न—] लक्ष्मि! शर्करा और घृतमें सिद्ध किया हुआ यह परम मनोहर स्वादिष्ट स्वस्तिक नामक नैवेद्य है। इसे आपकी सेवामें समर्पित किया गया है, स्वीकार करें। [फल—] कमले! ये अनेक प्रकारके सुन्दर पके हुए फल हैं, जो स्वादिष्ट होनेके साथ ही मनोवाञ्छित फल देनेवाले हैं। इन्हें ग्रहण कीजिये। [दुग्ध—] अच्युतप्रिये! सुरभी गौके स्तनसे निकला हुआ यह मृत्युलोकके लिये अमृतस्वरूप परम सुस्वादु दुग्ध है। आप इसे स्वीकार कीजिये। [गुड़—] देवि! ईखके स्वादभरे रसको अग्निपर पकाकर बनाया गया यह गुड़ है। इसे ग्रहण कीजिये। [मिष्टान्न—] देवि! जौ, गेहूँ आदिके