ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २४१
चूर्णसे तैयार किया हुआ यह मिष्टान्न है। गुड़ और घृतके साथ अग्निपर यह सिद्ध किया गया है। इसे आप स्वीकार करें। [पिष्टक—] देवि! धान्यके चूर्णसे बनाये गये स्वस्तिक आदि चिह्नोंसे युक्त इस पिष्टकको भक्तिपूर्वक आपकी सेवामें समर्पित किया है; स्वीकार कीजिये। [ईख—] देवि! ईख इस भूतलका एक विशिष्ट वृक्ष है, इससे गुड़ आदि अनेक पदार्थ तैयार किये जाते हैं; अतः यह सुस्वादु रससे युक्त ईख सेवामें अर्पित है। इसे ग्रहण करें। [व्यजन—] कमले! शीतल वायु प्रदान करनेवाला यह व्यजन तथा स्वच्छ चँवर उष्णकालके लिये परम सुखदायी है। इसे ग्रहण कीजिये। [ताम्बूल—] देवि! यह उत्तम ताम्बूल कर्पूर आदि सुगन्धित वस्तुओंसे सुवासित एवं जिह्वाको स्फूर्ति प्रदान करनेवाला है। इसे आप स्वीकार कीजिये। [जल—] देवि! प्यासको शान्त करनेवाला अत्यन्त शीतल, सुवासित एवं जगत्के लिये जीवन-स्वरूप यह जल स्वीकार कीजिये। [माल्य—] देवि! विविध ऋतुओंके पुष्पोंसे गूँथी गयी, असीम शोभाको देनेवाली तथा देवराजके लिये भी परम प्रिय इस पवित्र मालाको स्वीकार करें। [आचमनीय—] कृष्णकान्ते! यह पवित्र तीर्थ-जल, स्वयं शुद्ध तथा अन्यको भी सदा शुद्ध करनेवाला है। इसे आप रम्य आचमनीयके रूपमें स्वीकार करें। [शय्या—] देवि! यह अमूल्य रत्नोंसे बनी हुई सुन्दर शय्या वस्त्र और आभूषणोंसे सजायी गयी है, पुष्प और चन्दनसे चर्चित है। इसे आप स्वीकार करें। [अपूर्व द्रव्य—] देवि! यही नहीं, किंतु पृथ्वीपर जितने भी अपूर्व द्रव्य शरीरको सजानेके लिये परम उपयोगी हैं तथा देवराज इन्द्रके भी योग्य हैं, वे दुर्लभ वस्तुएँ आपकी सेवामें उपस्थित हैं। इन्हें स्वीकार करें*।'
मुने! देवराज इन्द्रने इस सूत्ररूप मन्त्रको
* प्रशस्यानि प्रकृष्टानि दुर्लभानि वराणि च। अमूल्यरत्नसारं च निर्मितं विश्वकर्मणा ॥
आसनं च विचित्रं च महालक्ष्मि प्रगृह्यताम् ॥
शुद्धं गङ्गोदकमिदं सर्ववन्दितमीप्सितम्। पापेन्धनवह्निरूपं च गृह्यतां कमलालये ॥
पुष्पचन्दनदूर्वादिसंयुतं जाह्नवीजलम्। शङ्खगर्भस्थितं शुद्धं गृह्यतां पद्मवासिनि ॥
सुगन्धिपुष्पतैलं च सुगन्धामलकीफलम्। देहसौन्दर्यबीजं च गृह्यतां श्रीहरेः प्रिये ॥
वृक्षनिर्यासस्वरूपं च गन्धद्रव्यादिसंयुतम्। श्रीकृष्णकान्ते धूपं च पवित्रं प्रतिगृह्यताम् ॥
मलयाचलसम्भूतं वृक्षसारं मनोहरम्। सुगन्धयुक्तं सुखदं चन्दनं देवि गृह्यताम् ॥
जगच्चक्षुःस्वरूपं च ध्वान्तप्रध्वंसकारणम्। प्रदीपं शुद्धरूपं च गृह्यतां परमेश्वरि ॥
नानोपहाररूपं च नानारससमन्वितम्। नानास्वादुकरं चैव नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
अन्नं ब्रह्मस्वरूपं च प्राणरक्षणकारणम्। तुष्टिदं पुष्टिदं चैव देव्यन्नं प्रतिगृह्यताम् ॥
शाल्यक्षतसुपक्वं च शर्करागव्यसंयुक्तम्। स्वादुयुक्तं महालक्ष्मि परमान्नं प्रगृह्यताम् ॥
शर्करागव्यपक्वं च सुस्वादु सुमनोहरम्। मया निवेदितं लक्ष्मि स्वस्तिकं प्रतिगृह्यताम् ॥
नानाविधानि रम्याणि पक्वानि च फलानि च। स्वादुयुक्तानि कमले गृह्यतां फलदानि च ॥
सुरभिस्तनसम्भूतं सुस्वादु सुमनोहरम्। मर्त्यामृतं सुगव्यं च गृह्यतामच्युतप्रिये ॥
सुस्वादुरससंयुक्तमिक्षुवृक्षसमुद्भवम् । अग्निपक्वमतिस्वादु गुडं च प्रतिगृह्यताम् ॥
यवगोधूमशस्यानां चूर्णीणुसमुद्भवम्। सुपक्वं गुडगव्याक्तं मिष्टान्नं देवि गृह्यताम् ॥
शस्यचूर्णोद्भवं पक्वं स्वस्तिकादिसमन्वितम्। मया निवेदितं देवि पिष्टकं प्रतिगृह्यताम् ॥
पार्थिवो वृक्षभेदश्च विविधद्रव्यकारणम्। सुस्वादुरससंयुक्तं ईक्षुश्च प्रतिगृह्यताम् ॥