ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पढ़कर भगवती महालक्ष्मीको उपर्युक्त द्रव्य समर्पण | रत्नमय भूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके करनेके पश्चात् भक्तिपूर्वक विधिसहित उनके | मुखपर मुस्कान छायी थी। भक्तपर कृपा करनेके मूलमन्त्रका दस लाख जप किया, जिसके फलस्वरूप | लिये वे परम आतुर थीं। उनके गलेमें रत्नोंका हार उन्हें मन्त्रसिद्धि प्राप्त हो गयी। यह मूल-मन्त्र | शोभा पा रहा था। असंख्य चन्द्रमाके समान सभीके लिये कल्पवृक्षके समान है। ब्रह्माजीकी | उनकी प्रभा थी। ऐसी शान्तस्वरूपा जगदम्बा कृपासे यह उन्हें प्राप्त हुआ था। पूर्वमें श्रीबीज | भगवती महालक्ष्मीको देखकर देवराज इन्द्र उनकी (श्रीं), मायाबीज (ह्रीं), कामबीज (क्लीं) और | स्तुति करने लगे। उस समय इन्द्रके सर्वाङ्गमें वाणीबीज (ऐं) का प्रयोग करके 'कमलवासिनी' | पुलकावली छा गयी थी। उनके नेत्र आनन्दके इस शब्दके अन्तमें 'ङे' विभक्ति लगानेपर | आँसुओंसे पूर्ण थे और उनकी अञ्जलि बँधी थी। अन्तमें 'स्वाहा' शब्द जोड़ दिया जाय (श्रीं ह्रीं | ब्रह्माजीकी कृपासे सम्पूर्ण अभीष्ट प्रदान करनेवाला क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा) - यही इस मन्त्रराजका | वैदिक स्तोत्रराज उन्हें स्मरण था। इसीको पढ़कर स्वरूप है। कुबेरने इसी मन्त्रसे भगवती महालक्ष्मीकी | उन्होंने स्तुति आरम्भ की। आराधना करके परम ऐश्वर्य प्राप्त किया। | देवराज इन्द्र बोले- भगवती कमलवासिनीको इसी मन्त्रके प्रभावसे दक्षसावर्णि मनुको | नमस्कार है। देवी नारायणीको बार-बार नमस्कार राजाधिराजकी पदवी प्राप्त हुई है तथा मङ्गल सातों | है। संसारकी सारभूता कृष्णप्रिया भगवती पद्माको द्वीपोंके राजा हुए हैं। | अनेकशः नमस्कार है। कमलरत्नके समान नेत्रवाली नारद ! प्रियव्रत, उत्तानपाद तथा राजा केदार- | कमलमुखी भगवती महालक्ष्मीको नमस्कार है। इन सिद्धपुरुषोंको राजेन्द्र कहलानेका सौभाग्य | पद्मासना, पद्मिनी एवं वैष्णवी नामसे प्रसिद्ध भगवती इसी मन्त्रने दिया है। | महालक्ष्मीको बार-बार नमस्कार है। इस मन्त्रके सिद्ध हो जानेपर भगवती | सर्वसम्पत्स्वरूपिणी सर्वदात्री देवीको नमस्कार है। महालक्ष्मीने इन्द्रको दर्शन दिये। उस समय वे | सुखदायिनी, मोक्षदायिनी और सिद्धिदायिनी देवीको वरदायिनी सर्वोत्तम रत्नसे निर्मित विमानपर | बारंबार नमस्कार है। भगवान् श्रीहरिमें भक्ति उत्पन्न विराजमान थीं और अपनी प्रभासे सप्तद्वीपवती | करनेवाली तथा हर्ष प्रदान करनेमें परम कुशल पृथ्वीको आच्छादित कर रही थीं। उनकी | देवीको बार-बार नमस्कार है। भगवान् श्रीकृष्णके अङ्गकान्ति श्वेत चम्पाके पुष्पके समान थी। | वक्षःस्थलपर विराजमान एवं उनकी हृदयेश्वरी देवीको शीतवायुप्रदं चैव दाहे च सुखदं परम्। कमले गृह्यतां चेदं व्यजनं श्वेतचामरम्॥ ताम्बूलं च वरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम्। जिह्वाजाड्यच्छेदकरं ताम्बूलं देवि गृह्यताम्॥ सुवासितं शीतलं च पिपासानाशनकारणम्। जगज्जीवनरूपं च जीवनं देवि गृह्यताम्॥ देहसौन्दर्यबीजं च सदा शोभाविवर्धनम्। कार्पासजं च कृमिजं वसनं देवि गृह्यताम् ॥ रत्नस्वर्णविकारं च देहभूषाविवर्धनम्। शोभाधानं श्रीकरं च भूषणं प्रतिगृह्यताम्॥ नानाकुसुवनिर्माणं बहुशोभाप्रदं परम्। सुरभूपप्रियं शुद्धं माल्यं देवि प्रगृह्यताम्॥ पुण्यतीर्थोदकं चैव विशुद्धं शुद्धिदं सदा। गृह्यतां कृष्णकान्ते त्वं रम्याचमनीयकम्॥ रत्नसारादिनिर्माणं पुष्पचन्दनसंयुतम्। रत्नभूषणभूषाढ्यं सुतल्पं देवि गृह्यताम्॥ यद्यद् द्रव्यमपूर्वं च पृथिव्यामपि दुर्लभम् । देवभूपार्हभोग्यं च तद्द्रव्यं देवि गृह्यताम्॥ (प्रकृतिखण्ड ३९। १५-४०)