ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २४३ बारंबार प्रणाम है। रत्नपद्मे ! शोभने ! तुम श्रीकृष्णकी शोभास्वरूपा हो, सम्पूर्ण सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री देवी एवं महादेवी हो; तुम्हें मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ। शस्यकी अधिष्ठात्री देवी एवं शस्यस्वरूपा हो, तुम्हें बारंबार नमस्कार है। बुद्धिस্বরূপा एवं बुद्धिप्रदा भगवतीके लिये अनेकशः प्रणाम है। देवि ! तुम वैकुण्ठमें महालक्ष्मी, क्षीरसमुद्रमें लक्ष्मी, राजाओंके भवनमें राजलक्ष्मी, इन्द्रके स्वर्गमें स्वर्गलक्ष्मी, गृहस्थोंके घरमें गृहलक्ष्मी, प्रत्येक घरमें गृहदेवता, गोमाता सुरभि और यज्ञकी पत्नी दक्षिणाके रूपमें विराजमान रहती हो। तुम देवताओंकी माता अदिति हो। कमलालयवासिनी कमला भी तुम्हीं हो। हव्य प्रदान करते समय 'स्वाहा' और कव्य प्रदान करनेके अवसरपर 'स्वधा' का जो उच्चारण होता है, वह तुम्हारा ही नाम है। सबको धारण करनेवाली विष्णुस्वरूपा पृथ्वी तुम्हीं हो। भगवान् नारायणकी उपासनामें सदा तत्पर रहनेवाली देवि ! तुम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा हो। तुममें क्रोध और हिंसाके लिये किञ्चिन्मात्र भी स्थान नहीं है। तुम्हें वरदा, शारदा, शुभा, परमार्थदा एवं हरिदास्यप्रदा कहते हैं। तुम्हारे बिना सारा जगत् भस्मीभूत एवं निःसार है। जीते-जी ही मृतक है, शवके तुल्य है। तुम सम्पूर्ण प्राणियोंकी श्रेष्ठ माता हो। सबके बान्धवरूपमें तुम्हारा ही पधारना हुआ है। तुम्हारे बिना भाई भी भाई-बन्धुओंके लिये बात करने योग्य भी नहीं रहता है। जो तुमसे हीन है, वह बन्धुजनोंसे हीन है तथा जो तुमसे युक्त है, वह बन्धुजनोंसे भी युक्त है। तुम्हारी ही कृपासे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त होते हैं। जिस प्रकार बचपनमें दुधमुँहे बच्चोंके लिये माता है, वैसे ही तुम अखिल जगत्की जननी होकर सबकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण किया करती हो। स्तनपायी बालक माताके न रहनेपर भाग्यवश जी भी सकता है; परंतु तुम्हारे बिना कोई भी नहीं जी सकता। यह बिलकुल निश्चित है। अम्बिके! सदा प्रसन्न रहना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। अतः मुझपर प्रसन्न हो जाओ। सनातनी ! मेरा राज्य शत्रुओंके हाथमें चला गया है, तुम्हारी कृपासे वह मुझे पुनः प्राप्त हो जाय। हरिप्रीये ! मुझे जबतक तुम्हारा दर्शन नहीं मिला था, तभीतक मैं बन्धुहीन, भिक्षुक तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंसे शून्य था। सुरेश्वरि ! अब तो मुझे राज्य दो, श्री दो, बल दो, कीर्ति दो, धन दो और यश भी प्रदान करो। हरिप्रीये ! मनोवाञ्छित वस्तुएँ दो, बुद्धि दो, भोग दो, ज्ञान दो, धर्म दो तथा सम्पूर्ण अभिलषित सौभाग्य दो। इसके सिवा मुझे प्रभाव, प्रताप, सम्पूर्ण अधिकार, युद्धमें विजय, पराक्रम तथा परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति भी कराओ।* नारद! इस प्रकार कहकर सम्पूर्ण देवताओंके
- इन्द्र उवाच ॐ नमो महालक्ष्म्यै ॥ ॐ नमः कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नमः। कृष्णप्रियायै सारायै पद्मायै च नमो नमः ॥ पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नमः। पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नमः ॥ सर्वसम्पत्स्वरूपायै सर्वदात्र्यै नमो नमः। सुखदायै मोक्षदायै सिद्धिदायै नमो नमः ॥ हरिभक्तिप्रदात्र्यै च हर्षदात्र्यै नमो नमः। कृष्णवक्षःस्थितायै च कृष्णेशायै नमो नमः ॥ कृष्णशोभास्वरूपायै रत्नपद्मे च शोभने। सम्पत्त्यधिष्ठातृदेव्यै महादेव्यै नमो नमः ॥ शस्याधिष्ठातृदेव्यै च शस्यायै च नमो नमः। नमो बुद्धिस্বরূপायै बुद्धिदायै नमो नमः ॥ वैकुण्ठे या महालक्ष्मीर्या लक्ष्मीः क्षीरसागरे। स्वर्गलक्ष्मीरिन्द्रगेहे राजलक्ष्मीर्नृपालये ॥ गृहलक्ष्मीश्च गृहिणां गेहे च गृहदेवता। सुरभिः सा गवां माता दक्षिणा यज्ञकामिनी ॥ अदितिर्देवमाता त्वं कमला कमलालये। स्वाहा त्वं च हविर्दाने कव्यदाने स्वधा स्मृता ॥