भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 254
२४४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

साथ देवराज इन्द्रने मस्तक झुकाकर भगवती महालक्ष्मीको बार-बार प्रणाम किया। उस समय उनकी आँखोंमें प्रेमानन्दके आँसू भर आये थे। देवताओंके कल्याणार्थ ब्रह्मा, शंकर, शेषनाग, धर्म तथा केशव—इन सभी महानुभावोंने भगवती महालक्ष्मीसे प्रार्थना की। तब उस देवसभामें शोभा पानेवाली भगवती प्रसन्न हो गयीं। उन्होंने देवताओंको वर दिया और भगवान् श्रीकृष्णको मनोहर पुष्पमाला समर्पण की। सभी देवता अपने-अपने स्थानपर चले गये। स्वयं भगवती महालक्ष्मी क्षीरशायी भगवान् श्रीहरिके वक्षःस्थलपर प्रसन्नतापूर्वक पधार गयीं। मुने! ब्रह्मा और शंकर भी देवताओंको शुभ आशीर्वाद देकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए अपने-अपने धामको चले गये। यह स्तोत्र महान् पवित्र है। इसका त्रिकाल पाठ करनेवाला बड़भागी पुरुष कुबेरके समान राजाधिराज हो सकता है। पाँच लाख जप करनेपर मनुष्योंके लिये यह स्तोत्र सिद्ध होता है। यदि इस सिद्ध स्तोत्रका कोई निरन्तर एक महीनेतक पाठ करे तो वह महान् सुखी एवं राजेन्द्र हो जायगा—इसमें कोई संशय नहीं है।

(अध्याय ३८-३९)


भगवती स्वाहा तथा भगवती स्वधाका उपाख्यान, उनके ध्यान, पूजा-विधान तथा स्तोत्रोंका वर्णन

नारदजीने कहा—प्रभो! मुनिवर नारायण! आप रूप, गुण, यश, तेज एवं कान्तिमें साक्षात् भगवान् नारायणके ही समान हैं। मुने! आप ही ज्ञानियों, सिद्धों, योगियों, तपस्वियों और वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। आपकी कृपासे मुझे महालक्ष्मीका महान् अद्भुत उपाख्यान ज्ञात हो गया। अब आप उचित समझें तो भगवती स्वाहा, भगवती स्वधा और भगवती दक्षिणाके चरित्र तथा उनका महत्त्व सुनायें।

सूतजी कहते हैं—मुनियो! नारदजीकी बात सुनकर मुनिवर नारायण हँस पड़े और उन्होंने पुराणोक्त प्राचीन उपाख्यान कहना आरम्भ किया।


त्वं हि विष्णुस्वरूपा च सर्वधारा वसुंधरा। शुद्धसत्त्वस्वरूपा त्वं नारायणपरायणा॥
क्रोधहिंसावर्जिता च वरदा च शुभानना। परमार्थप्रदा त्वं च हरिदास्यप्रदा परा॥
यया विना जगत्सर्वं भस्मीभूतमसारकम्। जीवन्मृतं च विश्वं च शवतुल्यं यया विना॥
सर्वेषां च परा त्वं हि सर्वबान्धवरूपिणी। यया विना न सम्भाव्यो बान्धवैर्बान्धवः सदा॥
त्वया हीनो बन्धुहीनो त्वया युक्तः सबान्धवः। धर्मार्थकाममोक्षाणां त्वं च कारणरूपिणी॥
यथा माता स्तनन्धानां शिशूनां शैशवे सदा। तथा त्वं सर्वदा माता सर्वेषां सर्वरूपतः॥
मातृहीनः स्तनान्धश्च स चेज्जीवति दैवतः। त्वया हीनो जनः कोऽपि न जीवत्येव निश्चितम्॥
सुप्रसन्नस्वरूपा त्वं मां प्रसन्ना भवाम्बिके। वैरिग्रस्तं च विषयं देहि मह्यं सनातनि॥
वयं यावत् त्वया हीना बन्धुहीनाश्च भिक्षुकाः। सर्वसम्पद्विहीनाश्च तावदेव हरिप्रिये॥
राज्यं देहि श्रियं देहि बलं देहि सुरेश्वरि। कीर्तिं देहि धनं देहि यशो मह्यं च देहि वै॥
कामं देहि मतिं देहि भोगान् देहि हरिप्रिये। ज्ञानं देहि च धर्मं च सर्वसौभाग्यमीप्सितम्॥
प्रभावं च प्रतापं च सर्वाधिकारमेव च। जयं पराक्रमं युद्धे परमैश्वर्यमेव च॥

(प्रकृतिखण्ड ४९। ५१-७१)