ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 255, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २४५
भगवान् नारायण कहते हैं—मुने! सृष्टिके प्रारम्भिक समयकी बात है—देवता भोजनकी व्यवस्थाके लिये ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीकी मनोहारिणी सभामें गये। मुने! वहाँ जाकर उन्होंने अपने आहारके लिये ब्रह्माजीसे प्रार्थना की। उनकी बात सुनकर ब्रह्माजीने उन्हें भोजन देनेकी प्रतिज्ञा करके श्रीहरिके चरणोंकी आराधना की। तब भगवान् श्रीहरि अपनी कलासे यज्ञरूपमें प्रकट हुए। उस यज्ञमें जिस-जिस हविष्यकी आहुति दी गयी, वह सब ब्रह्माजीने देवताओंको दिया; किंतु ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि वर्ण भक्तिपूर्वक जो हवन करते थे, वह देवताओंको उपलब्ध नहीं होता था। इसीसे सब उदास होकर ब्रह्मसभामें गये थे और वहाँ जाकर उन्होंने आहार न मिलनेकी बात बतलायी। ब्रह्माजीने देवताओंकी प्रार्थना सुनकर ध्यानके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी शरण ली। फिर भगवान्की आज्ञासे उन्होंने ध्यानके द्वारा ही मूलप्रकृतिकी पूजा की। तब सर्वशक्तिस्वरूपिणी भगवती प्रकृति अपनी कलाद्वारा अग्निकी दाहिकाशक्ति ‘स्वाहा’ के रूपमें प्रकट हुई। उन परम सुन्दरी देवीके विग्रहकी सुन्दर श्याम कान्ति थी। वे मनोहारिणी देवी मुस्करा रही थीं। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्यग्रचित्तवाली उन भगवती स्वाहाने ब्रह्माजीके सम्मुख उपस्थित होकर उनसे कहा—‘पद्मयोने! तुम वर माँगो!’ तदनन्तर ब्रह्माजीने भगवतीका वचन सुनकर सम्भ्रमपूर्वक कहा।
ब्रह्माजी बोले—तुम अग्निकी दाहिकाशक्ति तथा उनकी परम सुन्दरी पत्नी होनेकी कृपा करो। तुम्हारे बिना अग्नि आहुतियोंको भस्म करनेमें असमर्थ हैं। जो मानव मन्त्रके अन्तमें तुम्हारे नामका उच्चारण करके देवताओंके लिये हवनीय पदार्थ अर्पण करें, उनका वह हविष्य देवताओंको सहज ही उपलब्ध हो जाय। अम्बिके! तुम अग्निदेवकी सर्वसम्पत्स्वरूपा एवं श्रीरूपिणी गृहस्वामिनी बनो। देवता और मनुष्य सदा तुम्हारी पूजा करेंगे।
ब्रह्माजीकी बात सुनकर भगवती स्वाहा देवी उदास हो गयीं। उन्होंने स्वयं ब्रह्माजीसे अपना अभिप्राय इस प्रकार व्यक्त किया।
स्वाहा बोलीं—ब्रह्मन्! मैं दीर्घकालतक तपस्या करके भगवान् श्रीकृष्णकी सेवाका सौभाग्य प्राप्त करूँगी। उन परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णके अतिरिक्त जो कुछ भी है सब स्वप्नके समान भ्रममात्र है। तुम जो जगत्की सृष्टि करते हो, भगवान् शंकरने जो मृत्युपर विजय प्राप्त की है, शेषनाग जो अखिल विश्वको धारण करते हैं, धर्म जो समस्त देहधारियोंके साक्षी हैं, गणेशजी जो सम्पूर्ण देव-समाजमें सर्वप्रथम पूजा प्राप्त करते हैं तथा जगदम्बा प्रकृतिदेवी जो सर्वपूज्या हुई हैं—यह सब उन भगवान् श्रीकृष्णके कृपा-प्रसादका ही फल है। भगवान् श्रीकृष्णके सेवक होनेसे ही ऋषियों और मुनियोंका सर्वत्र सम्मान है। अतः पद्मज! मैं भी एकमात्र उन्हीं परम प्रभु श्रीकृष्णके चरण-कमलोंका सानुराग चिन्तन करती हूँ।
ब्रह्माजीसे यों कहकर वे कमलमुखी देवी स्वाहा निरामय भगवान् श्रीकृष्णके उद्देश्यसे तपस्या करनेके लिये चल दीं। फिर एक पैरसे खड़ी होकर उन्होंने श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए बहुत वर्षोंतक तप किया। तब प्रकृतिसे परे निर्गुण परब्रह्म श्रीकृष्णके दर्शन उन्हें प्राप्त हुए। भगवान्के परम कमनीय सौन्दर्यको देखकर सुरूपिणी देवी स्वाहा मूर्च्छित-सी हो गयीं; क्योंकि वे उन कामेश्वर प्रभुको कान्तभावसे चाहने लगी थीं।